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PM मोदी के भाषण में संघ के 100 वर्ष पूरे होने का उल्लेख ऐतिहासिक

15 अगस्त, 2025 का यह भाषण एक परंपरागत औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाले दो दशकों के लिए राष्ट्रीय कार्य-सूची है। इसमें सुरक्षा से लेकर सामाजिक संतुलन, तकनीकी आत्मनिर्भरता से लेकर सांस्कृतिक जागरण और आर्थिक सशक्तिकरण से लेकर प्रशासनिक सुधार तक, सब कुछ एक ही सूत्र में पिरोया गया है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 18, 2025, 11:13 am IST
inभारत, सम्पादकीय, संघ @100
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण इस बार केवल एक परंपरागत राष्ट्रीय संदेश नहीं था, बल्कि इसमें भविष्य के भारत का सप्तरंगी इंद्रधनुषी खाका था। इसमें संकल्प भी थे, सपनों का आकाश भी, समृद्धि की रूपरेखा भी और सुरक्षा की ठोस गारंटी भी। इसमें समय-सीमाओं की स्पष्टता थी, शासन के साथ सरोकार का भाव था और सबसे गहरे स्तर पर स्वदेशी का मंत्र था। वही स्वदेशी, जिसे महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम का प्राण बनाया था और जिसे आज ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्थानीय को प्राथमिकता’ के रूप में नए युग का विस्तार दिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य की नींव राष्ट्रीय सुरक्षा पर रखी। ‘ऑपरेशन सिंदूर’, ‘परमाणु धमकी अस्वीकार्य’ और सिंधु जल संधि पर सख्त रुख केवल तत्कालीन चुनौतियों का उत्तर नहीं हैं, बल्कि यह संकेत हैं कि आने वाले वर्षों में भारत अपने हितों की रक्षा के लिए निर्णायक और आत्मविश्वासी रहेगा। वर्ष 2035 तक देशव्यापी सुरक्षा-कवच का विस्तार और ‘सुदर्शन चक्र अभियान’ जैसी योजनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि रक्षा केवल सीमाओं पर तैनात जवान की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक, हर नगर, हर महत्वपूर्ण ढांचे के चारों ओर अदृश्य कवच की स्थापना का राष्ट्रीय संकल्प है।

लेकिन सुरक्षा केवल बाहरी खतरों के विरुद्ध ढाल नहीं होती; यह समाज के भीतर संतुलन से भी बनती है। भाषण में महिलाओं और जनजातीय समुदाय के सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्धता थी, किंतु साथ ही जनसंख्या असंतुलन के मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की जनांकिकी यानी आबादी की बनावट पर मिशन-स्तर पर काम होगा। इससे देश के वास्तविक नागरिकों-युवाओं की ऊर्जा और कौशल को देश के विकास में लगाने पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा और राष्ट्रीय संसाधनों का पूरा लाभ समाज को मिलेगा।

घुसपैठियों द्वारा देश के संसाधनों और अधिकारों पर कब्जा करने की प्रवृत्ति पर कड़ा संदेश बताता है कि आर्थिक दृष्टि से उत्पादक उम्र की आबादी का पूरा उपयोग कर रोजगार और उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बढ़ाने के लिए भारत संकल्पित हो रहा है। सामाजिक रूप से योजनाओं का लाभ सही हकदारों तक पहुंचाना, जनकल्याण की योजनाओं को पारदर्शी और लक्षित बनाना, साथ ही रणनीतिक स्तर पर सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा और निगरानी को और मजबूत करने का संकेत बताता है कि भारत अब आंतरिक सुरक्षा और जनसंख्या नीति के बीच तालमेल बैठाने के चिर प्रतीक्षित, परंतु अकारण उपेक्षित मुद्दे पर दृढ़ता से काम करेगा। यह संदेश साफ है कि जनांकिकी को संभालना देश की सुरक्षा और विकास, दोनों के लिए अहम है।

भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने का उल्लेख अपने आप में ऐतिहासिक था। यह केवल संगठन की तिथि का जिक्र नहीं, बल्कि उस सामाजिक-सांस्कृतिक धारा की स्वीकृति थी, जिसने गांधीजी के बाद स्वदेशी की अलख को सबसे व्यापक और संगठित रूप में जगाया। आपदा राहत, शिक्षा, ग्राम विकास और सांस्कृतिक जागरण तक, संघ का योगदान एक सदी में राष्ट्र-निर्माण की मौन परंतु प्रभावशाली धारा रहा है। इस मान्यता का संदेश स्पष्ट है-राष्ट्र-निर्माण में राजनीति से परे भी ऐसे स्तंभ हैं, जो देश की आत्मा को गढ़ते हैं।

 

यह भाषण पिछले दशक के अन्य परिवर्तनकारी क्षणों की श्रेणी में आता है। साल 2014 में स्वच्छ भारत का आह्वान, जिसने स्वच्छता को जन-अभियान बना दिया। 2019 में जल जीवन मिशन, जिसने ग्रामीण भारत के घर-घर में नल-जल पहुंचाने का संकल्प लिया और 2020 में राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य अभियान, जिसने स्वास्थ्य सेवा में डिजिटल एकीकरण की नींव रखी। 2025 में इन सबके बीच प्रधानमंत्री ने बहु-पक्षीय कार्यक्रम रखा-राष्ट्रीय सुरक्षा की नई परिभाषा, महत्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता, समयबद्ध लक्ष्यों के साथ देशी चिप निर्माण, परमाणु ऊर्जा में निजी भागीदारी और ‘सुदर्शन चक्र अभियान’। यह केवल घोषणाओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक संगठित कार्य-योजना है।

भाषण का भावनात्मक शिखर वह था, जब प्रधानमंत्री ने विकसित भारत 2047 के लिए सामूहिक परिश्रम का आह्वान किया। यह आह्वान केवल सरकारी योजनाओं का प्रचार नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय भावना का निर्माण है जहां किसान, वैज्ञानिक, श्रमिक, उद्यमी और विद्यार्थी, सभी अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठतम योगदान दें। उन्होंने उपनिवेशी मानसिकता और पुराने, अप्रासंगिक कानूनों से मुक्ति को मानसिक स्वतंत्रता का हिस्सा बताया और साथ ही हमारी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने का आग्रह किया।

‘विविधता का उत्सव’ उनके शब्दों में एकता का मंत्र बनकर उभरा-राजनीतिक मतभेदों और भाषाई-सांस्कृतिक भिन्नताओं को राष्ट्रहित की छतरी में लाने का आग्रह। अंत में उन्होंने युवाओं, महिलाओं और उद्यमियों को अग्रिम पंक्ति में आकर राष्ट्र-निर्माण का दायित्व उठाने के लिए बुलाया।

15 अगस्त, 2025 का यह भाषण एक परंपरागत औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाले दो दशकों के लिए राष्ट्रीय कार्य-सूची है। इसमें सुरक्षा से लेकर सामाजिक संतुलन, तकनीकी आत्मनिर्भरता से लेकर सांस्कृतिक जागरण और आर्थिक सशक्तिकरण से लेकर प्रशासनिक सुधार तक, सब कुछ एक ही सूत्र में पिरोया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भविष्य का भारत केवल कल्पना में नहीं, बल्कि ठोस समय-सीमाओं, लक्ष्यों और स्वदेशी की गहरी जड़ों में दिखाई देता है। यही कारण है कि यह भाषण ऐतिहासिक भी है और प्रेरणादायक भी, क्योंकि इसमें दृष्टि है, दिशा है और उस दिशा तक पहुंचाने का ठोस मार्ग भी।

X@hiteshshankar

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