जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दलों की रणनीतियां और बयानबाजियां तेज हो रही हैं। इस माहौल में कांग्रेस और इसके प्रमुख चेहरे राहुल गांधी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। उन्होंने कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों का आरोप लगाया है। 1 घंटे 11 मिनट की प्रेस कांफ्रेंस में 22 पेज की ‘प्रेजेंटेशन’ के साथ उन्होंने ‘संदिग्ध मतदाताओं’ का जिक्र किया और इसे राष्ट्रीय विमर्श बनाने की पूरी कोशिश की।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और फर्जी या गैर-नागरिक मतदाताओं को हटाना है। यह लोकतंत्र की निष्पक्षता सुनिश्चित करने का आधार है। लेकिन यह तकनीकी कार्य भी अब एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। सवाल है कि जब कर्नाटक में कांग्रेस की अपनी सरकार है, तो क्या ये आरोप उनकी ही कार्यप्रणाली पर उंगली नहीं उठाते? चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से ठोस सबूत के साथ हलफनामा देने को कहा है, लेकिन वे इससे कन्नी काट रहे हैं। एक तरफ वे फर्जी मतदाताओं की शिकायत करते हैं, दूसरी तरफ एसआईआर का विरोध करते हैं। यह विरोधाभास जनता में भ्रम पैदा करता है। क्या यह रणनीति तथ्यों पर आधारित है या सिर्फ सियासी शोर मचाने की कोशिश?
राहुल गांधी के आरोपों को समझने के लिए इतिहास में झांकना जरूरी हो जाता है। कांग्रेस के युवराज को छोड़िए, दल के रूप में परिवारवाद और औपनिवेशिक दासता के सिंहासन से बंधी इस ‘पार्टी’ का बीज क्या है? इतिहास में कांग्रेस की भारत निष्ठा को उजागर करता वह दौर भी था, जब कांग्रेस के अधिवेशनों में नारे लगते थे, ‘जोर से बोलो, महारानी विक्टोरिया की जय!’ अधिवेशन की अध्यक्षता करते कांग्रेस नेता कहते थे-‘वह महारानी विक्टोरिया, जिनके जूते के फीते बांधने के भी हम लायक नहीं हैं।’ ऐसे में वह पार्टी जब अन्य की निष्ठा पर प्रश्न उठाती है तो इतिहास के प्रेत उसे प्रश्नों के बियाबान में ला पटकते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था से छल का कांग्रेसी स्वभाव किस हद तक गिरा हो सकता है, इसका संभवत: बहुतों को अंदाज भी नहीं होगा। 1952 के पहले आम चुनाव में डॉ. भीमराव आंबेडकर उत्तरी मुंबई से स्वतंत्र उम्मीदवार थे। नेहरू की कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलकर उन्हें हराने की रणनीति बनाई।
कांग्रेस ने नारायण काजरोलकर को उम्मीदवार बनाया और उस चुनाव में डॉ. आंबेडकर को ‘देशद्रोही’ बताकर दुष्प्रचार किया गया। और तो और, जिस चुनाव में बाबासाहेब को 14,000 मतों से हारा हुआ घोषित किया गया, उस चुनाव में 74,333 वोट रद्द किए गए थे। डॉ. आंबेडकर ने न्यायालय में धांधली का केस दायर किया। पत्नी सविता आंबेडकर के अनुसार, यह हार उन्हें मानसिक रूप से तोड़ गई। जयप्रकाश नारायण ने भी चुनाव की निष्पक्षता पर संदेह जताया था।
1954 भंडारा उपचुनाव में फिर हार के बाद बाबासाहब की सेहत बिगड़ती गई और 6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया। आज जब राहुल गांधी चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि इस संस्था पर पहला सबसे बड़ा संदेह उनकी पार्टी के शासनकाल में ही उभरा था।
लोकआस्था से खिलवाड़ का यह अकेला किस्सा कांग्रेस के गले की फांस हो सकता है। विडंबना यह कि मतदान प्रक्रिया को लेकर कांग्रेसी बेशर्मी का यह इकलौता उदाहरण नहीं है।
असम आंदोलन (1979–85): यहां कांग्रेस पर ही असंख्य विदेशी नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करने का आरोप था, जिससे राज्य में हिंसक आंदोलन हुआ और अंततः 1985 में असम समझौता हुआ।
1987 जम्मू-कश्मीर चुनाव : यहां भी भारी धांधली के आरोप लगे, जिसमें नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में आया। कहा गया कि मतदान नहीं, चयन (इलेक्शन नहीं, सिलेक्शन) हुआ था। बाद में यही उग्र आंदोलन और अलगाववाद का बीज बना।
अब जम्मू-कश्मीर का वह समय याद कीजिए, जब सरपंच से लेकर विधानसभा चुनावों तक मतदान महज 6-8 प्रतिशत पर सिमट जाता था। तब चुनावी दिन का मतलब था-पत्थरबाज़ी, डर का माहौल और जनता की आवाज पर बंदूक का साया। लेकिन 2020 के जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनावों में कश्मीर ने 51 प्रतिशत मतदान कर एक नया और सकारात्मक संदेश दिया। यह बदलाव दिखाता है कि हालात किस तरह बदले हैं।
बीते दौर में दिल्ली में बैठे कांग्रेस और अलगाववादी नेताओं के आपसी रिश्ते गहरे थे, मगर वे नेता, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली माने जाते थे, अपने ही इलाके में जनता से वोट मांगने से कतराते थे। आज राहुल गांधी की कार्यशैली अनजाने में उन्हीं पुरानी राजनीति की परतें खोल रही है, जिसका असर कांग्रेस को भारी राजनीतिक नुकसान के रूप में झेलना पड़ सकता है।
राहुल गांधी की रणनीति में बार-बार चुनाव प्रक्रियाओं चाहे वह ईवीएम हो, चुनाव आयोग हो या मतदाता सूची, पर सवाल उठाना शामिल रहा है। लेकिन यह रणनीति अब तक कांग्रेस पर ही पलटवार करने वाली साबित हुई है। कांग्रेस के सहयोगी दल-तमिलनाडु में डीएमके, बंगाल में टीएमसी, बिहार में राजद भी इस रणनीति से असहज हैं। ममता बनर्जी जैसे नेताओं पर पहले से ही मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों और हिंसा के आरोप हैं। राहुल के बयान उनके सहयोगियों के लिए अलग आफत के समीकरण बुन रहे हैं।
जब देश की सबसे पुरानी पार्टी और विपक्षी गठबंधन का प्रमुख चेहरा यह कहता है कि चुनाव आयोग ‘वोट चोरी’ में शामिल है, तो यह पूरी चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास पैदा करता है। प्रश्न है कि कांग्रेस और सहयोगी दलों ने खुद ऐसे ही चुनावों में जीत भी हासिल की है। अगर व्यवस्था ही भ्रष्ट थी, तो ममता बनर्जी, स्टालिन, भूपेश बघेल जैसे नेताओं की जीत का क्या मूल्य है?
बंगाल में टीएमसी बनाम भाजपा की लड़ाई में कांग्रेस बार-बार टीएमसी को समर्थन देती रही है, किंतु पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा मतदाता सूची विवाद और बूथ लूटने के आरोप लगे हैं। बिहार में राजद-कांग्रेस गठबंधन बार-बार जाति आधारित वोट जोड़ता रहा है। अब यदि मतदाता सूची फर्जी है, तो उनका वह समीकरण ही अवैध घोषित हो जाएगा।
2019 में महाराष्ट्र में कांग्रेस और राकांपा ने भाजपा के विरुद्ध गठबंधन कर सरकार बनाई- उसी चुनाव आयोग की निगरानी में। 2018 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत भी इसी चुनाव प्रक्रिया में हुई। क्या वह वैध थी? जब विपक्ष सत्ता में होता है, तो व्यवस्था ‘वैध’ होती है, लेकिन हार के बाद वह ‘चोरी’ हो जाती है। यह तर्क तटस्थ मतदाता को भी भ्रमित करता है और विपक्षी नैतिकता पर आघात करता है।
वास्तव में, मतदाता सूची की समस्याएं दशकों पुरानी हैं, जिनका शीघ्रता से सुधार राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए भी बहुत आवश्यक है। कांग्रेस सत्ता में 55 वर्षों तक रही, लेकिन इस बीच देशव्यापी मतदाता सूची एकीकरण या बायोमेट्रिक लिंकिंग जैसी पहल को लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई।
आज चुनाव आयोग मतदाता सूचियों को शुद्ध करने के लिए सक्रिय हुआ है तो राहुल गांधी इसके विरोध में सबसे मुखर हो रहे हैं। ऐसे में यह ‘सचाई की लड़ाई’ की बजाय ‘सचाई से लड़ाई’ और दशकों की ‘पारिवारिक निष्क्रियता’ के ‘पाप’ की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति जैसा प्रतीत होता है।
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