योगेश्वर श्रीकृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व हमारे पुरा इतिहास का एक अमिट आलेख है। उन्होंने अपने सम्मोहक व्यक्तित्व व अनूठे न्यायप्रिय आचरण से समग्र क्रांति का बिगुल बजाया और पथभ्रष्ट समाज को नयी दिशा दी। गीतानायक कृष्ण के व्यक्तित्व में न्यायप्रियता, समदृष्टि, मानवता, मैत्रीभाव, उत्तम नीतिमत्ता, सदाचार, सत्यनिष्ठा, निर्भीकता, शालीनता, मातृ-पितृ व गुरुभक्ति तथा प्रेम का आदर्शतम रूप है। वे जन सामान्य से ऊँचे उठे, विराट बने, लोकोत्तर हुए और विश्व ब्रह्माण्ड में जगद्गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
श्रीकृष्ण की कोई एक उपाधि नहीं है। कृष्ण कहीं प्रेमी, कहीं योगी, कहीं योद्धा, कहीं रणछोड़, कहीं भोले-भाले ग्वाले तो कहीं गीतकार के रूप में विश्व के सर्वोत्तम तत्ववेत्ता। कहीं यशोदा नंदन के नटखट कान्हा तो कहीं गोपियों के मनमोहन, कहीं सुदामा के मित्र तो कहीं द्रोपदी के रक्षक; उनकी प्रत्येक मानवी लीला का मूल आधार लोकमंगल है। श्रीकृष्ण का जीवन दो छोरों में बंधा हुआ है। एक ओर बांसुरी है जिसमें सृजन का संगीत, आत्मिक आनंद का प्रेमामृत और रास है। तो दूसरी ओर अन्याय का प्रतिकार, युद्ध की वेदना और पीड़ा का गरल है।
असुरत्व के विनाश और देवत्व के संरक्षण को संकल्पित युगनायक श्रीकृष्ण अपने समय के सर्वोत्कृष्ट कूटनीतिज्ञ थे। इस महामानव का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विराट था कि उन्होंने द्वारका से लेकर मणिपुर तक समूचे राष्ट्र को एकसूत्र में आबद्ध करके ‘अखंड आर्यावर्त’ को अभेद्य बना दिया था।
सत्ता के केंद्रबिंदु थे श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण जिस युग में अवतरित हुए थे, उस समय सत्ता के दो प्रमुख केन्द्र थे- हस्तिनापुर और मथुरा। दोनों की ही सत्ता उनके पास नहीं थी फिर भी वे उन दोनों की सत्ता के केंद्रबिंदु थे। विश्वभर के सभी सत्ताधारी उनके इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे। श्रीकृष्ण ने अन्य लोगों को सत्ता सौंपी, स्वयं सत्ता से सदैव विरक्त रहे। वास्तव में श्रीकृष्ण राष्ट्रनायक इसीलिए बन सके क्योंकि उन्होंने समाज में अत्याचार करने वाली शक्तियों के विरुद्ध लोकशक्ति को संगठित करने में महती भूमिका निभायी। जो समूचे राष्ट्र को दिशा देता है, वही सच्चा राष्ट्रनायक होता है।
होमी जहांगीर भाभा श्रीकृष्ण को आदर्श मानते थे
16 कलाओं के पूर्णावतार योगेश्वर श्रीकृष्ण युगधर्म के मूर्तिमान स्वरूप माने जाते हैं। जीवन के विभिन्न आयामों को एक साथ अधिकारपूर्वक जीना उनकी अद्भुत विशिष्टता है। समूचे विश्व को ज्ञान, कर्म और भक्ति योग की दिव्य ज्योति दिखाने वाले लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का समूचा जीवन अपूर्व तेजस्विता और अन्याय के प्रतिकार का पर्याय है। देश में परमाणु योजना के जनक महानतम वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा योगेश्वर श्रीकृष्ण को अपना सर्वोच्च आदर्श मानते थे। उनकी मान्यता थी कि श्रीमद्भगवत गीता जैसी कालजयी कृति के सर्जक राष्ट्रनायक श्रीकृष्ण हर मोर्चे पर क्रांतिकारी विचारों के धनी हैं। इसीलिए युगों-युगों से लीलाधर कृष्ण के अलौकिक जीवन चरित्र का भारतीय जनमानस पर अद्भुत प्रभाव दिखायी देता है।
जन्माष्टमी की रात मोहरात्रि के रूप में जानी जाती है
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की महारात्रि में रोहिणी नक्षत्र की विशिष्ट ग्रहीय दशाओं में कारागार में माता देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाले इस महामानव के जन्म की तिथि जन्माष्टमी कई रूपों में अति विशिष्ट मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के आधार पर भगवान विष्णु ने 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में 8वें अवतार के रूप में अवतरण लिया था। ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था। हिन्दू कालगणना के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म 5126 वर्ष पूर्व माना जाता था। हमारे वेदों में चार रात्रियों का विशेष महात्म्य बताया गया है। दीपावली जिसे कालरात्रि कहते है, शिवरात्रि महारात्रि है, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मोहरात्रि और होली अहोरात्रि। भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण सृष्टि को मोह लेने वाला अवतार माना गया है और इसी कारण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है।
श्रीकृष्ण की हर बात में अनूठे जीवन-सूत्र
बालपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तक; श्रीकृष्ण की हर बात में अनूठे जीवन-सूत्र छिपे हैं। सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में वे सच्चे सारथी की भूमिका में खड़े दिखायी देते हैं। उनके विचार और व्यवहार राष्ट्र और समाज की दिशा तय करते हैं। वे एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन लिए हो, समस्याओं से जूझने की ललक लिए हो। गीता में वर्णित उनके सन्देश जीवन-रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं। कृष्ण से जुड़ी हर बात हमें जीवन के प्रति जागृत होने का सन्देश देती है। मानव-मन और जीवन के कुशल अध्येता कृष्ण अत्यंत सहजता से समझाते हैं कि जीवन जीना भी एक कला है। उनके चरित्र को जितना जानो उतना ही यह महसूस होता है कि इस धरा पर प्रेम का शाश्वत भाव वही हो सकता है, जो कृष्ण ने जिया है।

















