राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री माणक चंद माहेश्वरी का 30 जुलाई को जयपुर में निधन हो गया। वे इतने व्यवहार-कुशल थे कि स्वयंसेवक उन्हें माणक भाईसाहब ही कहते थे। अधिकांश स्वयंसेवकों को तो उनका पूरा नाम भी पता नहीं होता था। उनका जन्म 2 नवंबर, 1942 को नागौर जिले के कसारी बड़ा गांव में हुआ था।
प्रारंभिक शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद उन्होंने जयपुर के महाराजा महाविद्यालय से विज्ञान विषय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। 1954 में वे अपने भाई श्री दुर्गा प्रसाद के साथ शाखा जाने लगे। बाद में वे शाखा के पर्याय हो गए। उन्होंने गटनायक, मुख्य शिक्षक और कार्यवाह का दायित्व निभाया। फिर विस्तारक बने और अंत में प्रचारक निकले। यह बात जुलाई, 1961 की है।
उन्होंने बापू राव मोघे की प्रेरणा से देश-सेवा का संकल्प लिया। इस संकल्प को उन्होंने अंतिम सांस तक निभाया। प्रचारक के नाते सर्वप्रथम टोंक में नगर प्रचारक, तहसील प्रचारक और जिला प्रचारक का कार्य करने का अवसर मिला। आपातकाल में वे टोंक में 16 महीने कारावास में रहे। उसके बाद 2 महीने जयपुर में भी कारावास में रहे।
आपातकाल के बाद वे चूरू में 1977 से 1986 तक और 1986 से 1989 तक बांसवाड़ा में जिला प्रचारक रहे। जुलाई, 1989 में उन्हें ‘पाथेय कण’ पत्रिका के प्रबंधन और प्रचार-प्रसार का दायित्व सौपा गया। इसके बाद उन्हें पत्रिका के प्रकाशक और संरक्षक का दायित्व मिला। ‘पाथेय कण’ के पाठकों से उनका व्यक्तिगत जुड़ाव रहा।
उनके मार्गदर्शन में एक समय ‘पाथेय कण’ की प्रसार संख्या लगभग 2 लाख हो गई थी। अब भी यह पत्रिका राजस्थान में काफी लोकप्रिय है और इसकी पहुंच गांव-गांव तक है। पाञ्चजन्य स्व माणक जी के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

















