India Pakistan Partition : विभाजन के समय मैं सात साल का था। उन दिनों मेरा परिवार गुजरांवाला में रहता था। मेरे पिताजी चीनी के थोक विक्रेता थे। मैं अक्सर खाना पहुंचाने दुकान पर जाया करता था। जुलाई, 1947 में हिंसा शुरू हुई। उस समय भी मेरे पिताजी को यह आभास नहीं था कि भारत का विभाजन होगा।
उनके मन में था कि 15 अगस्त, 1947 के बाद स्थिति ठीक हो जाएगी। इसी मानसिकता के साथ पिताजी हम सभी को लेकर 2 अगस्त, 1947 को घर से निकले और रेलगाड़ी से मोगा आ गए। 15 अगस्त तक मोगा में रहे। 15 अगस्त के बाद पिताजी हम सबको लेकर दिल्ली आ गए।
बाराटूटी, सदर बाजार में पिताजी के एक मित्र थे। उनका एक कमरे का घर था। उसी एक कमरे में लंबे समय तक हम कुल 14 लोग रहे। गुजारा करने के लिए पिताजी ने सदर बाजार में पटरी पर कपड़े बेचने का काम शुरू किया। मेरे बड़े भाई तांगा चलाने लगे और पिताजी ने मुझे एक जौहरी के यहां रखवा दिया। वहां मैं गहने धोने का काम करता था।
विभाजन के वक्त हम लोगों ने वह कष्ट सहा है, जिसकी कल्पना भी आज की नई पीढ़ी नहीं कर सकती। हम लोगों के उस कष्ट को बांटा था संघ के स्वयंसेवकों ने। स्वयंसेवकों ने जान की बाजी लगाकर हिंदुओं की रक्षा की, उनके खाने—पीने का इंतजाम किया था। जब कोई बच्चा अपनी मां से कुछ खाने की मांग करता, तो उसकी मां कहती थी, ‘निक्कर—वालों से बोलो कुछ ले आएंगे।’
ऐसे ही कोई बच्चा कॉपी—किताब मांगता था, तो उसके घर वाले कहते थे, ‘निक्कर वालों से बोलो।’ उस समय आम लोगों को यह नहीं पता था कि ये निक्कर वाले किस संगठन से हैं, लेकिन निक्कर वाले ही हर परिवार के तारणहार बने। निक्कर वाले समूह में आया करते थे और हर परिवार से मिलते थे। जो भी कुछ मांगता था, उसे वे लोग देते थे।
यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि विस्थापित हिंदुओं को फिर से स्थापित करने में इन्हीं निक्कर वालों का सबसे अधिक योगदान रहा। बाद में पता चला कि ये निक्कर वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। वे बेसहारों का सहारा बने थे। उनकी सेवा भावना को देखते हुए मैं भी संघ का स्वयंसेवक बना।
—हीरा लाल चावला, मूल स्थान — गुजरांवाला, पाकिस्तान
















