India Pakistan Partition : अप्रैल, 1947 में मेरा जन्म डेरा गाजी खान में हुआ यानी जब भारत का बंटवारा हुआ तब मैं केवल तीन—चार महीने की थी। जब कुछ समझने लायक हुई तो मेरी मां अक्सर बताती थीं कि किन परिस्थितियों में हम लोगों की जान बची। अचानक माहौल इस तरह बदल गया कि कुछ ही दिनों में डेरा गाजी खान में अनेक हिंदुओं को मार दिया गया।
मेरे आसपास के हिंदू घर—द्वार छोड़कर भारत के लिए निकल पड़े। ऐसे में मेरे माता—पिता भी हम भाई—बहनों को गोद में लेकर पैदल ही निकल पड़े। सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचे। रेलगाड़ी बिल्कुल खचाखच भरी हुई थी। लोग एक—दूसरे पर लद रहे थे। जिनके पास बच्चे थे, उनके सामने बड़ा संकट था। इसके बावजूद बहुत लोग अपने बच्चों को गोद में लेकर या कंधे पर रखकर घंटों तक गाड़ी में खड़े रहे।
मेरे माता—पिता भी हम तीनों भाई—बहन को गोद में बिठाए गाड़ी में धक्के खाते रहे। मेरी मां जब भी ये बातें बताती थीं तो मैं कुछ देर के लिए एक अलग मन:स्थिति में चली जाती थी। मैं अपनी मां की एक बात कभी भूल नहीं पाती हूं। उन्होंने बताया कि रेल गाड़ी में इतनी भीड़ थी कि मैं मां की गोद में ही दबते—दबते कई बार बची।
ऐसे में मेरी मां मेरी नाक के नीचे रुई रखकर पता करती थीं कि मेरी सांस चल रही है या नहींं। उन्होंने मुझे कई बार बताया था कि यदि मैं मर जाती तो गाड़ी से ही फेंक देती, क्योंकि स्थिति ऐसी ही थी। लोग खुद की जान नहीं बचा पा रहे थे। ऐसे में किसी मरे को कब तक ढोया जाता।
खैर, किसी तरह हम लोग रेवाड़ी पहुंचे और एक खाली मस्जिद में शरण ली। वहां कई दिन रहे। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता भोजन दे जाते थे। इसलिए खाने की समस्या नहीं रही। कुछ दिन बाद पिताजी ने रहने का ठिकाना ढूंढा। चूंकि पिताजी डेरा गाजी खान में प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे इसलिए उन्हें रेवाड़ी में भी नौकरी मिल गई।
इस कारण हम लोग जल्दी संभल गए। रेवाड़ी में ही हम भाई—बहन पढ़ने लगे। विवाह के बाद मैं दिल्ली आ गई। यहां एक शिक्षिका के रूप में कार्य किया और अपने परिवार को संभाला। विभाजन के घाव को कभी सूखने नहीं देना चाहिए। यह घाव हिंदुओं को सजग रखेगा। ऐसा होने पर ही भारत का दुबारा बंटवारा नहीं होगा।
—सावित्री चावला, मूल स्थान — डेरा गाजी खान, पाकिस्तान


















