पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति काफी चिंताजनक होती जा रही है। एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन वायस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (VoPM) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल करीब 2,000 नाबालिग लड़कियों का अपहरण कर लिया जाता है। ये लड़कियाँ अधिकतर हिंदू और ईसाई समुदायों से होती हैं। इन लड़कियों को जबरदस्ती मुस्लिम पुरुषों से निकाह करने पर मजबूर किया जाता है और उन्हें इस्लाम मत अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चिंता- यह मामला अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा। संयुक्त राष्ट्र (UN) और यूरोपीय संघ (EU) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस पर चिंता जता चुके हैं। इन संस्थाओं ने पाकिस्तान सरकार से इस तरह के धार्मिक और लैंगिक अत्याचारों को रोकने के लिए कदम उठाने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र ने खासकर यह बात उठाई है कि पाकिस्तान में इस तरह के मामलों में अक्सर अपराधियों को सजा नहीं मिलती, जिससे वे और अधिक निडर होकर ऐसे जघन्य कृत्य करते हैं। जब किसी लड़की का परिवार मामला दर्ज कराता है, तो आरोपी यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि लड़की बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से शादी की है। इसके लिए वे जाली उम्र प्रमाण पत्र (fake age certificates) भी पेश करते हैं। कई बार इसमें मौलवियों की मदद ली जाती है, जो झूठे दस्तावेज बनवाने में सहायता करते हैं।
कन्वर्जन के बाद वापसी असंभव- सबसे गंभीर बात यह है कि जब एक लड़की इस्लाम मत स्वीकार कर लेती है, तो उसके लिए अपने मूल धर्म में लौटना लगभग असंभव हो जाता है।
निशाना बनती हैं गरीब और कमजोर लड़कियां- इस प्रकार की घटनाओं में अधिकतर गरीब और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियाँ ही निशाना बनती हैं। अपहरणकर्ता जानते हैं कि ऐसे परिवार ना तो मुकदमा लड़ सकते हैं और ना ही प्रशासन से न्याय की उम्मीद कर सकते हैं। यही कारण है कि यह समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

















