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होम भारत महाराष्ट्र

विकास हो, लेकिन किसान के हित प्रभावित न हों – भारतीय किसान संघ

भारतीय किसान संघ की नागपुर बैठक में गौ-कृषि वाणिज्यम् को बढ़ावा देने और किसान हितैषी भूमि अधिग्रहण कानून के लिए प्रस्ताव पारित। जहरमुक्त खाद्य और स्वस्थ भारत पर जोर।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 12, 2025, 12:49 pm IST
in महाराष्ट्र
Bhartiya kisan sangh

प्रतीकात्मक तस्वीर

नागपुर। रेशीमबाग स्थित स्मृति मंदिर परिसर के महर्षि व्यास सभागार में भारतीय किसान संघ की दो दिवसीय अखिल भारतीय प्रबंध समिति की बैठक संपन्न हुई। अखिल भारतीय महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने बताया कि देश भर के 37 प्रांतों से आए किसान संघ के पदाधिकारियों के साथ संगठनात्मक, आंदोलनात्मक व रचनात्मक एवं संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त विषयों के साथ ही संगठन के विस्तार की कार्य योजना पर चर्चा की गई। इसके साथ ही 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में “स्वस्थ भारत, पोषक भारत” के लिये “गौ-कृषि वाणिज्यम्” को आधार बनाकर अखिल भारतीय प्रबंध समिति बैठक में देश के आम जनमानस को स्वास्थ्यवर्धक, पोषणयुक्त और जहरमुक्त खाद्य उपलब्ध हो तथा देश के विकास की प्रक्रिया में कृषि व किसान हित प्रभावित न हों, इस दृष्टि से भूमि अधिग्रहण कानून किसान हितैषी बने। इन दो विषयों पर चर्चा उपरांत प्रस्ताव पास कर सरकार को सुझाव भेजे जा रहे हैं। प्रबंध समिति बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल जी का बौद्विक व समापन सत्र में किसान संघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी जी का मार्गदर्शन मिला।

खाद्यान्न के जहरयुक्त होने पर कार्यकारिणी ने चिंता व्यक्त की

किसान संघ की प्रबंध समिति बैठक में दो दिन तक चले मंथन के बाद घातक कीटनाशक, खरपतवार नाशक, जैव उत्तेजक और हॉर्मोन उत्पादों के कारण हमारे अधिकांश खाद्यान्न जहरयुक्त होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। विभिन्न शोध से प्राप्त जानकारी के अनुसार अल्जाइमर, कैंसर, चर्मरोग, स्तन कैंसर व श्वास से संबंधित बीमारियों का प्रमुख कारण रासायनिक खेती का प्रभाव है। हमारे प्रमुख खाद्यान्नों में पिछले 50 वर्षों में 45 प्रतिशत तक पोषण मूल्य की गिरावट दर्ज हुई है। साथ ही कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अनुसार किसानों की कृषि उत्पादन लागत आय के अनुपात में तेजी से बढ़ रही है। जिसके लिये वर्तमान में प्रचलित बाजार आदान आधारित कृषि पद्धति जिम्मेदार है। यह सब कृषि क्षेत्र व किसानी के लिये शुभ संकेत नहीं हैं।

स्वास्थ्यवर्धक, पोषणयुक्त और जहरमुक्त खाद्य प्रस्ताव में सुझाव

अखिल भारतीय महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने स्वास्थ्यवर्धक, पोषणयुक्त और जहरमुक्त खाद्य को लेकर पारित प्रस्ताव के संबंध में बताया कि भारतीय किसान संघ ने प्रस्ताव के माध्यम से देश के किसानों से आह्वान किया है कि गौ कृषि वाणिज्यम् पद्धति को व्यापक स्तर पर अपनाएं, जिससे देश के नागरिकों को रसायनमुक्त व जहरमुक्त कृषि उत्पाद उपलब्ध हो सकें। देश के नीति निर्धारक गौ कृषि वाणिज्यम् पद्धति को 5 वर्ष की समयावधि में केंद्र व राज्य सरकारों के लिये व्यापक, व्यावहारिक व सुदृढ़ व्यवस्था लागू करें।

प्रस्ताव की महत्वपूर्ण बातें

1. सभी कृषि खाद्यान्न और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में रसायन अवशेषों के मानक तय करें।
2. आयातित खाद्य पदार्थ व खाद्यान्न में गैर जीएम के साथ गुणवत्ता जांच को अनिवार्य कर इस हेतु जीएम खाद्यान्न मुक्त की सुनिश्चितता के लिये कठोर कानून बने।
3. गौ आधारित जैविक खाद्यान्न के लिये स्वतंत्र व अलग से उत्पाद खरीद, विपणन, भंडारण, वितरण, ब्रांडिंग और सरल प्रमाणिकरण की व्यवस्था स्थापित हो। गौ आधारित जैविक कृषि खाद्यान्नों में अधिकतम रसायन अवशेष के मानक तय किए जाएं। फलस्वरूप किसानों को कृषि उत्पाद को देश विदेश में उचित मूल्य पर विक्रय का रास्ता सुलभ हो सके तथा जैविक खाद्य की मुख्यधारा में रसायनयुक्त खाद्यान मिलावट करने वाले दोषियों को अपराधियों के रूप में कठोरतापूर्वक दंडित किया जा सके, ऐसा कानून बनाया जाए।

4. नीति निर्माण में कृषि-पोषण-स्वास्थ्य तंत्र को एकजुट किया जाए और इसके लिए समर्पित शोध व संसाधन सुनिश्चित कराने की व्यवस्था भी की जाए। जिससे गौ आधारित जैविक खेती का समग्र दृष्टिकोण पर आधारित वैज्ञानिक तकनीक पद्धति विकसित हो सके और किसान उसे सुगमता, विश्वासपूर्वक और व्यावहारिकता से अपना सकें।

5. वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने हेतु ‘स्वस्थ भारत, पोषित भारत’ के लिए ‘गौ-कृषि वाणिज्यम्’ पर आधारित ठोस रणनीति अपनानी होगी।

6. बाजार में बिक रहे घातक, प्रतिबंधित व घटिया गुणवत्ता वाले कीटनाशक, खरपतवारनाशक व रासायनिक उर्वरकों को बेचने वाली कम्पनियों पर भी कठोर कानून लागू करना ही होगा। बाजार में किसान की ठगबाजी बंद हो सके।

भूमि अधिग्रहण कानून किसान हितैषी बनाने पर पारित प्रस्ताव

भारत में अंग्रेजों ने अपनी भूमि की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की मंशा से भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में बनाया था, जिसमें किसानों का केवल शोषण होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यही कानून प्रचलित था। वर्ष 1962 एवं 1984 में इसमें संशोधन हुए, वर्ष 2013 में नया भू अर्जन, पुनर्वास व पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 बना, जो 1 जनवरी 2014 से प्रभावी हुआ। भारतीय किसान संघ ने एक देशव्यापी सर्वे किया, जिससे विभिन्न प्रदेशों में व्याप्त किसानों की समस्याएं उजागर हुईं।
समस्याएं –

1. सरकार द्वारा कई जगह कृषि भूमि का वास्तविक कब्जा लेने के बाद भी किसानों को मुआवजा राशि नहीं मिली। जहां मुआवजा राशि मिली भी, वहां कृषि भूमि के बाजार भाव से भी कम दाम दिए गए, वह भी समय पर नहीं मिले।
2. किसानों को रोजगार, प्लॉट, नौकरी आदि की व्यवस्था करने का आश्वासन दिया गया। जो पूर्ण नहीं किया गया।
3. कुछ जगहों पर भूमि के बदले विकसित प्लॉट देने की बात कही गई है, जिसके लिए कानून भी बनाए गए हैं, लेकिन यह कानून भ्रामक प्रतीत होते हैं। जैसे – मध्यप्रदेश में अभी हाल में म.प्र. नगर तथा ग्राम निवेश (संशोधन) विधेयक 2025 में धारा 66 (क) जोड़ी गई है। जिसमें विकसित प्लॉट की कोई परिभाषा नहीं है, कितनी भूमि देय होगी, किस जगह भूमि देय होगी, यह भी तय नहीं है, कब दी जाएगी इसकी अवधि कितनी होगी, यह तय नहीं है। किसान यदि मुआवजा चाहे तो ऐसा विकल्प भी नहीं है। विकसित प्लॉट आवंटन में किसान की प्राथमिकता तय नहीं है। सर्वे में यह भी पाया गया कि जहां भी कृषि भूमि अधिग्रहित की गई है, वहां किसान एवं अन्य ग्रामवासी प्रभावित हुए। जीवन यापन की कोई व्यवस्था नहीं है। जैसे – मध्यप्रदेश के महेश्वर बांध परियोजना जो वर्ष 1993 में शुरू हुई, जिसमें डूब क्षेत्र में 61 गांव के 10 हजार परिवारों का अभी तक पुनर्वास नहीं हुआ।

4. कहीं-कहीं अधिग्रहित होने के बाद बची हुई भूमि भी नई परिस्थिति के कारण, पानी में डूबी है या खेती लायक नहीं बची या पहुंच पाना अत्यंत कठिन हो गया है, अतः ऐसी परिस्थिति में उक्त भूमि पर खेती करना संभव नहीं रहा। ऐसी भूमि का अधिग्रहण न होने से किसान को मुआवजा भी नहीं मिला।

प्रस्ताव पारित कर केन्द्र व राज्य सरकार को भेजे सुझाव

भूमि अधिग्रहण कानून किसान हितैषी बनाने के लिए किसान संघ ने प्रबंध समिति में प्रस्ताव पास कर केंद्र व राज्य सरकार को भेजे सुझाव में कहा कि कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के पहले देश में उपलब्ध ‘ऊसर’ भूमि का सर्वे हो। भूमि ऊसर होने से उस पर पेड़-पौधे या कृषि करना संभव नहीं है। अतः ऐसी भूमि का अन्य विकास कार्यों में उपयोग किया जा सकता है तथा देश की बहुमूल्य कृषि योग्य भूमि बचाने के लिये अति आवश्यक होने पर संबंधित कानूनों में संशोधन करने का सुझाव दिया।

सुझाव –

1. अधिग्रहित भूमि का मुआवजा उक्त क्षेत्र के जिस दिन भुगतान हो, उसी दिन के अधिकतम बाजार भाव से न्यूनतम 4 गुना हो, जिसका पूरा मुआवजा मिलने के बाद ही उक्त किसान को उस भूमि से बेदखल किया जाए। इन शर्तों के पूर्ण होने के पूर्व यदि किसान को बेदखल किया गया हो तो इसे क्रिमिनल अपराध की श्रेणी में माना जाए, साथ ही उक्त किसान को तय मुआवजे पर 100 प्रतिशत पेनल्टी के रूप में देय हो। जैसे पीपीएफ में यह नियम लागू है।
2. किसान को प्राप्त होने वाली राशि सभी प्रकार के टैक्सों से मुक्त हो, साथ ही इस राशि को जहां भी निवेश किया जाए। वहां भी रजिस्ट्री स्टाम्प आदि ड्यूटी से मुक्त हो।
3. भूमि अधिग्रहण में दिये गए सभी आश्वासनों का पूर्ण पालन अनिवार्य रूप से हो, जैसे नौकरी, विकसित प्लॉट, भूमि आदि का पूर्ण पालन हो।
4. किसानों को यह विकल्प भी हो कि विकसित प्लॉट या अन्य के बदले यदि किसान चाहे तो उसे एकमुश्त रकम विकल्प के रूप में प्राप्त हो। विकसित प्लॉट आवंटन में किसान की पसंद को प्राथमिकता मिले।
5. अधिग्रहित की जाने वाली भूमि के बाद भी यदि किसान के पास कृषि भूमि शेष रहती है जो कृषि उपयोगी न होने के कारण, जिसे किसान स्वेच्छा से सरकार को देना चाहे तो उक्त भूमि भी उसी दर से अधिग्रहित करना अनिवार्य हो।
6. सड़क, रेल लाइन आदि के कारण भूमि की ऊँचाई बढ़ने पर प्रति 2 कि.मी. पर नीचे से ‘बाईपास’ बनाए जाएं ताकि किसान अपने खेती की देखभाल कर सके।
7. कृषि भूमि को औद्योगिक विकास के लिये लेने की परिस्थिति में वहां स्थापित होने वाले उद्योगों के शेयर, उन किसानों को अधिग्रहित भूमि के अनुपात में अंकित मूल्य पर प्रमोटर कोटे में देय हों।
8. बाँध आदि बड़ी योजना पूर्ण होने के बाद सरकार के पास अधिग्रहित की गई अतिरिक्त भूमि शेष बचने पर वह भूमि उसी किसान को वापिस की जाए।
9. किसी योजना के प्रयोजन से, अधिग्रहित की गई कृषि भूमि, भविष्य में प्रयोजन उद्देश्य बदलने की स्थिति में अधिगृहण रद्द मानकर जमीन उसी किसान को या उसके वंशजों को लौटा दी जाए।
10. ऐसा देखने में आया है कि किसान किसानी के अतिरिक्त व्यापार दुकान आदि अन्य कोई कार्य करने का अनुभव न होने से मुआवजे में प्राप्त राशि कुछ समय में समाप्त होने पर किसान कंगाल हो जाता है। अतः विकल्प के रूप में सुझाव है कि यदि किसान चाहे तो उसकी इच्छा से, उसे मुआवजे की एकमुश्त राशि के बदले प्रतिवर्ष प्रति एकड़ के अनुपात में सिकमी (वार्षिक लीज रेंट) की राशि वहां प्रचलित दर से प्रति एकड़ के अनुपात में देय हो तथा जब कभी किसान उक्त भूमि का मुआवजा चाहे, उस समय के बाजार भाव से 4 गुना राशि देकर एक मुश्त मुआवजा किसान प्राप्त कर सके, यह विकल्प भी हो। इससे सरकार को एक साथ एक मुश्त राशि की जरूरत नहीं पड़ेगी, किसान को भी प्रतिवर्ष राशि मिलती रहेगी। {आंध्र प्रदेश में वार्षिक किराया 40 हजार रूपये प्रति एकड़ की दर से दिया जा रहा है।

11. अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुर्नवसन पर एक निर्णय प्रकाशित हुआ है, यदि इससे किसान पुर्नवसन के अधिकार से वंचित हो रहे हों तो, सरकार से निवेदन है कि इस पर रिव्यू पीटिशन दायर करें।

12. वर्ष 2013 के कानून में राज्यों ने अपनी सुविधानुसार बदल कर उसके मूल तत्व को समाप्त कर दिया है। इस मूल भावना को ध्यान में रखकर केन्द्र सरकार भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में आवश्यक संशोधन कर संवैधानिक रूप से संपूर्ण देश में इसे समान रूप से लागू करे।

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