राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : मानव वटवृक्ष और राष्ट्र सेवा का अद्वितीय उदाहरण
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : मानव वटवृक्ष और राष्ट्र सेवा का अद्वितीय उदाहरण

99 वर्षों से राष्ट्र सेवा में समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, एक वैश्विक मानव वटवृक्ष के रूप में समाज और राष्ट्र उत्थान की दिशा में अग्रसर...

Written byअरूण कुमार जैनअरूण कुमार जैन
Aug 7, 2025, 02:07 am IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100

भारत सहित पूरी दुनिया में समाज एवं राष्ट्र सेवा के लिए राजनीति की तरफ अग्रसर होने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए भारत सहित वैश्विक स्तर पर देखने को मिल रहा है कि राष्ट्र उत्थान एवं समाज सेवा का सबसे उपयुक्त माध्यम राजनीति ही लोगों को लग रही है।

इन्हीं परिस्थितियों में भारत सहित वैश्विक स्तर पर राष्ट्र की सेवा-साधना एवं समर्पण की बात की जाए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम मानव वटवृक्ष के रूप में सर्वोच्च स्थान पर आता है। निःस्वार्थ भाव से कार्य करने वाला यह स्वयंसेवी संगठन विगत 99 वर्षों से बिना किसी सरकारी सहायता के राष्ट्र उत्थान में लगा हुआ है।

समग्र दृष्टि से यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल्यांकन एवं विश्लेषण किया जाए तो कहा जा सकता है कि इस संगठन का उद्देश्य मात्र राष्ट्र उत्थान एवं व्यक्ति निर्माण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसे संक्षेप में आरएसएस के नाम से जाना जाता है। इस संगठन का स्पष्ट रूप से मानना है कि यदि समाज में श्रेष्ठ व्यक्तियों का निर्माण होगा तो समाज भी श्रेष्ठ बनेगा। जब समाज श्रेष्ठ होगा तो राष्ट्र अपने आप श्रेष्ठ बनता जाएगा।

राजनीति के माध्यम से तमाम लोग तो सेवा के लिए इस कदर बेचैन हैं कि उन्हें चाहे जितना भी दल बदलना पड़े, बदलते रहते हैं किंतु जन-प्रतिनिधि बनकर ही सेवा करेंगे। चाहे उनका यह उद्देश्य छद्म हो। आज समाज में एक प्रवृत्ति यह भी देखने को मिल रही है कि किसी क्षेत्र में यदि किसी ने सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लिया है तो उनमें से भी तमाम लोगों की इच्छा होती है कि यदि एक बार किसी तरह जन-प्रतिनिधि बनने का मौका मिल जाये तो उनकी सेवागिरी में और अधिक चार चांद लग जायेगा।

कहने का आशय यह है कि अधिकांश लोगों की नजर में सेवा का सबसे प्रभावी एवं उपयुक्त माध्यम राजनीति ही है। वैसे तो समाज में राजनीति के अतिरिक्त तमाम तरह की संस्थाएं एवं स्वयंसेवी संगठन कार्य कर रहे हैं किंतु इनमें से अधिकांश लोगों की इच्छा होती है कि उन्हें सेवा के बदले सरकारी स्तर से मदद भी मिले। देश में काफी संख्या में स्वयंसेवी संस्थाओं के रूप में एवं कुछ लोगों को व्यक्तिगत रूप से सरकारी सहायता एवं सुविधाएं प्राप्त भी हो रही हैं।

सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, भाषायी, जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक, पारिवारिक एवं अन्य तरह की समितियां समाज एवं राष्ट्र की सेवा में लगी हुई हैं किंतु इसके पीछे उनका क्या भाव है, इसका विश्लेषण किया जाये तो आम जन-मानस में तमाम तरह की प्रतिक्रियाएं उभर कर सामने आती हैं। कुछ संस्थाओं के बारे में तो समाज में चर्चा होती है तो कहा जाता है कि कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना यानी कहा कुछ और जा रहा है किंतु लक्ष्य कुछ और ही है। सीधे तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि सेवा के बदले मेवा प्राप्त करने की इच्छा मौजूद रहती है। तमाम अवसरों पर इस प्रकार का भाव साबित भी हो चुका है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश को पुनः विश्व गुरु एवं सोने की चिड़िया बनाने की तरफ अग्रसर है। संघ जो कुछ कहता है, व्यावहारिक धरातल पर उसे करके दिखाता भी है। संघ का स्वयंसेवक प्रचार-प्रसार से दूर रहकर सदैव राष्ट्र की सेवा-साधना में लगा रहता है। संघ के शीर्ष अधिकारियों का जीवन तो संन्यासियों जैसा ही है। न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ अधिकतम कार्य करना स्वयंसेवकों के आचरण एवं कार्यप्रणाली में शुमार है। स्वयंसेवकों का ध्येय वाक्य- ‘‘देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें‘‘ और ‘‘तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें या न रहें‘‘ प्रेरणा देता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक घंटे की शाखा अनुशासित, जांची-परखी, सत्यापित व विश्वसनीय व्यक्ति निर्माण की गारंटी है। 27 सितंबर 1925 को विजय दशमी के दिन मात्र कुछ स्वयंसेवकों के साथ डाॅक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार जी द्वारा की गई। इसकी स्थापना काल से लेकर आज तक स्वयंसेवक अपने उद्देश्यों के प्रति न सिर्फ संकल्पित एवं दृढ़ हैं बल्कि उसके प्रति समर्पण और अधिक बढ़ता जा रहा है। आज समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां संघ का कार्य न हो। संघ की दूदर्शिता व कार्यशैली का आज पूरी दुनिया लोहा मानती है तथा समय-समय पर अनुसंधान भी करती तथा करवाती रहती है।

राष्ट्र एवं समाज में जब भी जिस भी रूप में आवश्यकता पड़ी, उसी के अनुरूप संघ अपने अंतर्गत आनुसंगिक एवं वैचारिक संगठन बनाता गया। इसके साथ ही आवश्यकता के अनुरूप विभाग एवं प्रकल्प भी बनाये गए। कहने का आशय यह है कि बिना किसी सरकारी सहायता के संघ समग्र दृष्टि से समाज एवं राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने के लिए अनवरत लगा हुआ है।

भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद, सहकार भारती, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, राष्ट्र सेविका समिति, सेवा भारती, हिंदू स्वयंसेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच, सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, बजरंग दल, लघु उद्योग भारती, भारतीय विचार केंद्र, विश्व संवाद केंद्र, राष्ट्रीय सिख संगत, हिंदू जागरण मंच, विवेकानंद केंद्र, संस्कार भारती, जैसे प्रतिष्ठित संगठन प्रभावी रूप में निरंतरता के साथ चलने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आयाम हैं।

इसके अतिरिक्त तमाम विभाग एवं प्रकल्प हैं जो संघ के आनुसंगिक एवं वैचारिक आयाम के रूप में कार्य कर रहे हैं। इन सभी संगठनों का मात्र एक ही लक्ष्य है, राष्ट्र का उत्थान और पूरे विश्व में अपने देश को परम वैभव पर ले जाना।

आज के समय में जहां तमाम लोग पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री आदि बनने एवं अन्य सरकारी पदों को प्राप्त करने के लिए तमाम तरह के संगठन बनाकर अपनी मार्केटिंग करने में लगे हुए हैं वहीं संघ की महान खासियत यह है कि यह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, प्रशासनिक, न्यायाधीश, वैज्ञानिक इत्यादि एवं सरकारें बनाने का कार्य कर रहा है। यहां एक बात विशेष तौर पर उल्लेखनीय है कि ये सारे कार्य संघ मात्र राष्ट्र उत्थान के लिए कर रहा है।

संघ प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं मंत्री आदि से सिर्फ यही उम्मीद एवं अपेक्षा करता है कि ये लोग राष्ट्र एवं समाज की सेवा-साधना में अपने को समर्पित कर दें। इस दृष्टि से यदि संघ का मूल्यांकन किया जाए तो स्पष्ट रूप से बिना किसी लाग-लपेट के कहा जा सकता है कि इस प्रकार का संगठन भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोई दूसरा नहीं है।

वर्तमान में संघ का कार्य पूरे विश्व के 80 से अधिक देशों में है। संघ के 50 से अधिक संगठन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हैं। 200 से अधिक संगठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस अनवरत यात्रा के 99 वर्ष पूर्ण होने पर दुनिया इसे एक शताब्दी पुराने मानव वटवृक्ष की संज्ञा से संबोधन करने लगी है, जो कि राष्ट्रीय उत्थान के लिए समाज को आक्सीजन देने के साथ अपने अन्य सहयोगी संगठनों की जड़ों को भी सींचता रहता है और मूल में नियंत्रित भी करता रहता है

तमाम लोग इस बात को जानने के लिए लालायित रहते हैं कि आखिर संघ कार्य करता कैसे है..? आखिर राष्ट्र के प्रति समर्पित एवं दृढ़ स्वयंसेवकों का निर्माण कैसे होता है..? इसके लिए संघ के वरिष्ठ अधिकारी अकसर कहा करते हैं कि यदि संघ को समझना है तो शाखा में आना पड़ेगा। एक घंटे की शाखा में योग, व्यायाम, अनुशासन, चिंतन, राष्ट्र प्रेम, नैतिक मूल्य, परिश्रम, ईमानदारी एवं उत्तम चरित्र सहित सर्वगुणों के विकास हेतु प्रशिक्षण मिलता रहता है।

वक्त एवं परिस्थितियों के मुताबिक संघ कार्यों की गुणवत्ता में और निखार आता जा रहा है। समय की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए प्रभात शाखा, संध्या शाखा, रात्रि शाखा, मिलन एवं संघ मंडली का संचालन होता है। इस प्रकार की शाखाओं के माध्यम से ही आज राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यक्ति निर्माण का कार्य अनवरत चल रहा है। स्वयंसेवकों को और अधिक प्रशिक्षित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है।

दीपावली वर्ग, शीत शिविर, निवासी वर्ग, बौद्धिक वर्ग, शारीरिक वर्ग, संघ शिक्षा वर्ग प्रमुख रूप से प्रशिक्षण वर्ग हैं। संघ शिक्षा वर्ग के अंतर्गत प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष- कुल चार प्रकार का संघ शिक्षा वर्ग होता है। प्राथमिक वर्ग एक सप्ताह का होता है। इस वर्ग का आयोजन सामान्यतः जिला करता है। प्रथम और द्वितीय 20-20 दिन के होते हैं। इस वर्ग का आयोजन सामान्यतः प्रांत करता है। द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन सामान्यतः क्षेत्र करता है। तृतीय संघ शिक्षा वर्ग 25 दिनों का होता है। इसका आयोजन प्रतिवर्ष नागपुर में होता है। यहां एक बात का उल्लेख करना जरूरी है कि ये सभी वर्ग बिना किसी सरकारी सहायता के स्वयंसेवकों के सहयोग से संपन्न होते हैं।

स्वयंसेवकों के समर्पण की बात की जाए तो जब भी देश में कोई प्राकृतिक आपदा आई हो, कोरोनाकाल आया हो, युद्ध या युद्ध जैसी परिस्थितियां रही हों, चाहे वह कोई भी विनाशकारी बाढ़, भयानक भूकंप (भुज), भूस्खलन (केदारनाथ और केरल) हो, महामारी हो एवं अन्य तरह की प्राकृतिक आपदा रही हो, वहां स्वयंसेवकों ने अपना सर्वस्व झोंक दिया है।

सड़क पर उतरकर जब कभी ट्रैफिक व्यवस्था संभालने की बात आई हो तो वहां भी स्वयंसेवक हमेशा अग्रणी भूमिका में रहे। चाहे वह 1962 में चीन के साथ युद्ध रहा हो, श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के आह्वान पर योगदान, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध का समय रहा हो। और तो और, माना जाता है कि 1971 की लड़ाई से पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस समय के संघ प्रमुख जी से यह आश्वासन लिया था कि ‘आप युद्ध की स्थिति में देश संभालेंगे और मैं पाकिस्तान को सबक सिखा दूंगी।’

इस आश्वासन के उपरांत ही पाकिस्तान के दो टुकड़ों के साथ-साथ ऐतिहासिक 95 हजार हथियारबंद पाकिस्तानी सैनिकों का आत्म समर्पण संभव हो सका। संघ के सेवा और समर्पण की मिसाल आज पूरी दुनिया में दी जाती है।

भारत के कई वरिष्ठ महानुभावों ने भी संघ के सेवा कार्यों की तारीफ की है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगड़ी, नानाजी देशमुख, शांता कुमार, रामनाईक, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, अटल बिहारी वाजपेयी, डाॅक्टर मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी, रामनाथ कोविंद, एकनाथ रानाडे, नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी सहित अनगिनत स्वयंसेवक हैं जिनका एक मात्र उद्देश्य रहा है, भारत को पूरी दुनिया में शिखर पर ले जाना।

काली टोपी, सफेद कमीज, दंड, बेल्ट, पैंट (पूर्व में निक्कर), मोजे और जूते को मिलाकर गणवेश तैयार होता है जिसे देखकर लोग जान जाते हैं कि कोई राष्ट्र प्रेमी स्वयंसेवक आ रहा है।

संघ की लोकप्रियता एवं आम जन-मानस में पहुंच-पकड़ को देखकर विपक्षी दलों को बहुत परेशानी होती है।

संघ को दबाने की मानसिकता से कई बार संघ पर प्रतिबंध के असफल प्रयास भी किये गये व संघ पर प्रतिबंध लगाये भी गये किंतु संघ बार-बार प्रतिबंधों के बावजूद और मुखर एवं मजबूत होकर उभरा है। जनता में व्यापक रूप से स्वीकार्यता का ही यह परिणाम है कि पूर्व में श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में और अब 2014 से अब तक देश में एक स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई में केंद्र में एनडीए की सरकार कार्य कर रही है।

परम पूज्य डाॅक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार जी, माधव सदाशिवराव गोलवरकर जी (गुरुजी), मधुकर दत्तात्रय देवरस (बालासाहेब देवरस), प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) एवं कुप्पाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन जी जैसे राष्ट्र ऋषि संघ का नेतृत्व कर चुके हैं। वर्तमान में परम पूज्य डाॅक्टर मोहनराव मधुकरराव भागवत जी का नेतृत्व 2009 से संघ को प्राप्त हो रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी 99 वर्षों की यात्र पूरी करके शताब्दी वर्ष यानी सौवें वर्ष में प्रवेश करने वाला है। शताब्दी वर्ष में पूरे वर्ष भर राष्ट्र एवं समाज निर्माण को और अधिक गति देने के लिए जन-जागरण का कार्य चलेगा। शताब्दी वर्ष में लक्ष्य है कि स्वयंसेवक एक-एक देशवासी के पास जाकर राष्ट्र के उत्थान हेतु कार्य करने का आह्वान करेंगे। शताब्दी वर्ष में संघ आम लोगों के बीच पांच प्रकार के व्रत जन-जागरण हेतु लेकर जाने वाला है, जो निम्न प्रकार से हैं।

  • पहला है व्यक्ति स्तर पर ‘स्व’ का बोध।
  • दूसरा है पारिवारिक स्तर पर कुटुंब प्रबोधन।
  • तीसरा है राष्ट्र के स्तर पर नागरिक कर्तव्यों का पालन।
  • चौथा है सामाजिक स्तर पर सामाजिक समरसता।
  • पांचवां है वैश्विक स्तर पर पर्यावरण अनुकूल जीवन।

इन पांचों व्रतों का संक्षिप्त रूप से विश्लेषण किया जाए तो ‘स्व’ जागरण का भाव केवल सैद्धांतिक अवधारणा के लिए नहीं अपितु जीवन में व्यावहारिक रूप में उतारना आवश्यक है। अपनी जीवनचर्या में स्वदेशी का भाव विकसित करने के लिए विचार व्यवस्था, वस्तु और वृत्ति, इन सभी का स्वदेशीकरण आवश्यक है। व्यक्ति चेतना पर पड़े हुए औपनिवेशिक गुलामी के अभाव को स्वदेशी आवरण से ही दूर किया जा सकता है।

‘पारिवारिक’ स्तर पर चेतना के महत्व की दृष्टि से कुटुंब प्रबंधन एक आवश्यक सोपान है। कुटुंब या परिवार व्यक्ति और समाज के बीच की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी है। समाज का लघुत्तम स्वरूप हम परिवार में अनुभव करते हैं। यह संस्कारों की पहली पाठशाला है जिसके आचार्य एवं शिक्षक-प्रशिक्षक, माता-पिता और परिवार के बड़े लोग होते हैं। व्यक्ति के समाजगत आचार-विचार-व्यवहार का प्रशिक्षण और प्रबोधन परिवार के ही माध्यम से होता है। बाल्यकाल से ही अनुकूल संस्कारों के अधीन और प्रतिकूल संस्कारों के विसर्जन में परिवार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः समाज उपयोगी मूल्य की शिक्षा के लिए परिवार संस्था को साधारण बनाए रखना सामाजिक प्रबंधन का दूसरा महत्वपूर्ण सोपान है।

कर्तव्यों का पालन नागरिकों का तीसरा सोपान है। मानवीय चेतना का तीसरा घेरा भौगोलिक परिधि में आबद्ध किसी राष्ट्रीय अथवा राज्य का होता है जो देश के विधि-विधान के अनुसार मनुष्य के सामुदायिक कर्तव्य और आचार-व्यवहारों को निर्धारित करता है। एक अनुशासित और सभ्य समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करे। यही राष्ट्रीय चेतना का मूल हेतु है। अपने-अपने कर्तव्य के पालन में ही दूसरों के अधिकार संरक्षित होते हैं। राष्ट्र में सद्भावना, शांति और समृद्धि का यही मूल मंत्र है। कर्तव्य पालन से विमुख जन-समुदाय कितना देशप्रेमी क्यों न हो, सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का कारक नहीं बन सकता।
‘सामाजिक समरसता’ संघ चिंतन का चैथा सोपान है।

सामाजिक समरसता का अर्थ है- अपने वर्ग, जाति और समुदाय से भिन्न लोगों के प्रति सहज सम्मानजनक और भेदभाव रहित व्यवहार। ‘‘अन्य‘‘ के प्रति प्रेम और आत्मीयता एवं पूर्ण व्यवहार ही सामाजिक समरसता की कसौटी है। सामाजिक चेतना के जागरण के लिए संपूर्ण समाज का अविभक्त और परस्पर प्रेम पूर्ण होना आवश्यक है। इसका प्रमुख हेतु है सामाजिक समरसता का भाव। ‘पर्यावरण’ संरक्षण पांचवां सोपान है। मनुष्य की चेतना का पांचवां सोपान वैश्विक स्तर पर व्याप्त होता है। हम इस चराचर जगत का अविभाज्य अंश हैं। हमारा अस्तित्व धरती से लेकर अंतरिक्ष तक संपूर्ण सृष्टि से संबद्ध और उस पर आधारित है। अतः पर्यावरण को बचाना संपूर्ण चराचर जगत को बचाना है। अंततः स्वयं को बचाना है।

यह कार्य समुदाय, लिंग, जाति, पंथ, राष्ट्र आदि सभी सीमाओं से ऊपर उठकर मानव मात्र का धर्म है। यह कोई सेवा या प्रसिद्धि का कार्य नहीं है वरन उसी तरह मौलिक उत्तरदायित्व है जिस प्रकार मनुष्य का अपनी संतानों और आश्रितों का पालन करना है। अतः मानव मात्र या प्राणी मात्र के प्रति ही नहीं अपितु संपूर्ण प्रकृतिक पर्यावरण के प्रति आत्मीय दृष्टि किसी श्रेष्ठ और उन्नत समाज की पहचान होती है। आज संसार भर में परस्पर संघर्ष और प्रतिशोध की लपटें उठ रही हैं। पर्यावरण के अनुकूल जीवन जिया जाए, इस सोपान का यही उद्देश्य है।

इस प्रकार देखा जाए तो बिना किसी लाग-लपेट के कहा जा सकता है कि जिन पवित्र उद्देश्यों को लेकर संघ की स्थापना हुई थी। 99 वर्षों के बाद भी कमोबेश संघ उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। संघ के इस पावन कार्य में हम सभी को अपनी आहुति देनी चाहिए। वैसे भी आज पूरे विश्व में संघ जैसा कोई दूसरा स्वयंसेवी संगठन नहीं है। अतः, कहा जा सकता है कि राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने में संघ के द्वारा दीक्षित व शिक्षित स्वयंसेवकों (मानवों) के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। संघ द्वारा किए गए एवं किये जा रहे कार्यों के प्रति राष्ट्र को कृतज्ञ होना चाहिए और राष्ट्र की सेवा-साधना में संघ के साथ तन-मन-धन से खड़ा होना चाहिए, ऐसा करना समय की आवश्यकता एवं कर्तव्य भी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसीलिए ही वैश्विक, अद्वितीय समाजसेवी संस्था व ‘मानव वटवृक्ष’ के रूप में स्वीकारा जाने लगा है जो न ही तो गलत है और न ही अतिशयोक्ति, अपितु एक सत्यापित एवं स्थापित सत्य है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस ‘मानव वटवृक्ष’ की नई शाखायें, आयाम एवं प्रकल्प आगामी दशकों में तेजी से और अधिक स्फुटित-अंकुरित होंगी।

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गुवाहाटी: प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय पहुंचे सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, शिक्षा, संस्कृति व मूल्यों पर दिया जोर

ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक जीत: दिल्ली डिक्लेरेशन में पहलगाम हमले की निंदा

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में दिल्ली घोषणापत्र जारी : UNSC सुधार, स्थानीय मुद्रा और आतंकवाद पर कड़ा प्रहार

ब्रिक्स समूह के सदस्यों ने साफ कहा कि आतंकवाद बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

पाकिस्तान को कड़ा संदेश : ब्रिक्स देशों ने पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की, कहा- आतंकवाद बर्दाश्त नहीं

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पौधरोपण करते ब्रिक्स समूह के सदस्य।

नई दिल्ली घोषणापत्र पर मुहर: ब्रिक्स नेताओं ने खिंचवाई ‘फैमिली फोटो’, फिर एक खास पौधे से दिया दुनिया को बड़ा संदेश

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (बाएं)।

प्रधानमंत्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक, सीमा सहित कई मुद्दों पर हुई बात

kisan sangh free uniforms notebooks and bags distributed to 7000 flood affected students

असम: शिवसागर में भारतीय किसान संघ की मानवीय पहल, बाढ़ प्रभावित 7,000 छात्रों को दी जा रही नि:शुल्क सहायता!

dr manmohan vaidya addresses-shikshak and taruni samvad in kashi bhu

विविधता का उत्सव मनाना ही भारतीय संस्कृति है: काशी में बोले मनमोहन वैद्य जी- भारत रूपी बगीचे के हम माली नहीं, पौधे हैं

gorakhpur rss centenary youth conference suryakund-prant pracharak ramesh address

“शाखा गंगा की तरह पवित्र और व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है”: गोरखपुर में RSS शताब्दी वर्ष पर भव्य युवा सम्मेलन

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

BRICS Summit: PM मोदी का वैश्विक सुधारों पर जोर, कहा- विशेषाधिकार के पिरामिड को साझेदारी में बदलना होगा

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