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राजनीति : तुष्टीकरण के तराजू पर नारी सम्मान

अखिलेश यादव की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति उनके नैतिक साहस और नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर रही है। ‘यदुवंशी’ होने का दावा करने वाले अखिलेश सत्ता की लालसा में मूल सांस्कृतिक मूल्यों और पति धर्म से भटके

Written byनागार्जुननागार्जुन
Aug 6, 2025, 07:48 am IST
in विश्लेषण, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) और उसके नेता अखिलेश यादव लंबे समय से ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण को चुनावी सफलता की कुंजी मानते आए हैं। एक समय था, जब उनके दिवंगत पिता मुलायम सिंह यादव पूरे विश्वास से कहते थे, “जब तक मेरे पास मेरा ‘माई’ है, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” यह बात सपा की रणनीतिक मानसिकता को दर्शाती है। लेकिन अब समय बदल चुका है। मुलायम सिंह के दौर में हिंदू समाज एकजुट नहीं था। अब ऐसा नहीं है। यही कारण है कि 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में हार के बाद सपा प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर चली गई। बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह समीकरण अब सवालों के घेरे में है। विशेष रूप से तब, जब यह समीकरण नारी सम्मान, राजनीतिक नैतिकता और सांस्कृतिक परंपराओं से टकराने लगे।

‘सामंजस्य’ या ‘सियासी सौदा’?

21 जुलाई, 2025 को अखिलेश यादव और डिंपल यादव सपा सांसदों के साथ मोहिबुल्लाह नादवी के आमंत्रण पर संसद परिसर स्थित मस्जिद पहुंचे। मकसद था मुस्लिम समुदाय को यह संदेश देना कि सपा अब भी उनका ‘अपना घर’ है। डिंपल यादव ने इस अवसर पर पारंपरिक भारतीय साड़ी पहनी थी, जो पूरी तरह सम्मानजनक है। लेकिन मौलाना साजिद रशीदी की आपत्तिजनक टिप्पणी ‘उनकी पीठ नंगी है…’ ने न सिर्फ अखिलेश की राजनीतिक चाल को विवाद में ला खड़ा किया, बल्कि एक सांसद के सार्वजनिक जीवन और सम्मान का भी घोर अपमान किया।
साजिद रशीदी जैसे कट्टरपंथी सिर्फ सपा या किसी दल के नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक आत्मा के लिए भी खतरा हैं। यह टिप्पणी केवल डिंपल यादव के पहनावे पर नहीं थी, यह हर उस भारतीय महिला पर हमला था जो अपने आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय है। समाज के हर वर्ग को इस प्रकार की मजहबी ‘ठेकेदारी’ के विरुद्ध बोलना चाहिए था। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वामदलों जैसे विपक्षी खेमे में भी गहरी चुप्पी दिखाई दी। लेकिन जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है, वह यह कि अखिलेश यादव-एक पति, एक नेता, एक पूर्व मुख्यमंत्री ने अभी तक इस मुद्दे पर एक शब्द नहीं बोला है। शीर्ष नेतृत्व की इस चुप्पी ने पार्टी के भीतर और बाहर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।

डर या तुष्टीकरण!

मौलाना की टिप्पणी के बाद पूरा देश, संसद, महिला संगठन, यहां तक कि भाजपा की महिला सांसद भी डिंपल यादव के समर्थन में खड़ी हैं, तब अखिलेश यादव की खामोशी एक अलग ही सियासी संदेश दे रही है। ऐसे में भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज का प्रश्न बिल्कुल सटीक है। उन्होंने कहा कि क्या तुष्टीकरण की राजनीति एक महिला सांसद की गरिमा से ज्यादा महत्वपूर्ण है? क्या एक महिला सांसद के अपमान को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज किया जा रहा है, क्योंकि टिप्पणी करने वाला एक मौलाना है? भाजपा सांसद धर्मशीला गुप्ता ने तो यहां तक कह दिया कि अखिलेश अगर अपने घर की महिलाओं के लिए खड़े नहीं हो सकते, तो उन्हें राजनीति छोड़ देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश की महिला कल्याण मंत्री बेबी रानी मौर्य ने भी सही कहा, “लगता है उन्होंने सत्ता के लिए अपनी पत्नी का अपमान स्वीकार कर लिया है।”

वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश को डर है कि अगर वे मौलाना के खिलाफ कुछ बोलते हैं, तो मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग उनसे नाराज हो सकता है। यह वही वर्ग है, जिसे अखिलेश मस्जिद दौरे के जरिए लुभाने की कोशिश कर रहे थे। उनकी इस चुप्पी को वोट बैंक की लालसा के रूप में देखा जा रहा है, जो उनकी पत्नी के सम्मान पर भी भारी पड़ रही है।

नेतृत्व पर सवाल

अखिलेश यादव की चुप्पी उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण की रणनीति की नाकामी को ही उजागर नहीं करती, बल्कि इससे उनकी नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह घटना दर्शाती है कि तुष्टीकरण की राजनीति की अपनी सीमाएं हैं और जब यह रणनीति उल्टी पड़ती है, तो उसका नुकसान पार्टी और नेतृत्व, दोनों को उठाना पड़ता है। अखिलेश यादव अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा में चुप्पी साधकर न केवल अपनी, बल्कि अपनी पार्टी की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर रहे हैं। क्या एक नेता वोट बैंक की राजनीति में इतना उलझ सकता है कि अपनी पत्नी के सम्मान पर भी चुप्पी साध ले? सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर आज यही सवाल खड़े हो रहे हैं।
बहरहाल, टीवी पर चर्चा के दौरान डिंपल यादव के पहनावे पर मौलाना के आपत्तिजनक बयान पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। राजग के सांसदों ने संसद में इस पर विरोध दर्ज कराया, एफआईआर दर्ज हुई और एक टीवी बहस में मौलाना को थप्पड़ भी पड़ा। यहां तक कि सपा सांसद इकरा हसन ने भी बयान की निंदा करते हुए साफ शब्दों में कहा, “ये कोई मौलाना नहीं है और न ही मजहबी नेता। ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।”

यह मुद्दा सिर्फ अखिलेश यादव की चुप्पी तक सीमित नहीं है। कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा, जो कहती हैं- ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’, ने भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। विपक्ष की सामूहिक चुप्पी यह संकेत देती है कि जब मुद्दा ‘साफ-साफ बोलने’ का होता है, तो तुष्टीकरण की राजनीति सब पर भारी पड़ जाती है। डिंपल यादव से जब मौलाना की टिप्पणी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बात को घुमाते हुए कहा, “बेहतर होता अगर वे (राजग के सांसद) मणिपुर की महिलाओं के साथ खड़े होते।” यह प्रतिक्रिया भी कई लोगों को असहज कर गई। इस रुख को डिंपल और अखिलेश की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वे मुस्लिम वोट बैंक को नाराज करने से बचना चाहते हैं। डिंपल ने मणिपुर की महिलाओं की बात की, भाजपा नेताओं पर टिप्पणी की, लेकिन खुद के हुए अपमान पर एक शब्द नहीं कहा। क्या यह डर था? या राजनीतिक दबाव? या फिर पार्टी लाइन?

सपा के लिए चेतावनी

जिस श्रीकृष्ण ने अपने नाम से स्त्री-सम्मान की परंपरा को जन्म दिया, उस परंपरा का दावा करने वाले नेता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपनी पत्नी के अपमान पर चुप बैठा रहे। क्या उनके लिए सत्ता की कुर्सी अखिलेश यादव को इतनी प्यारी हो गई कि पत्नी का अपमान भी उन्हें स्वीकार है, बशर्ते मुस्लिम वोट न खिसके? अखिलेश के मौन को सिर्फ एक राजनीतिक भूल भी नहीं कहा जा सकता। यह एक नारी के सम्मान पर राजनैतिक सौदेबाजी का उदाहरण बन चुका है। मुस्लिम तुष्टीकरण के फेर में ‘यदुवंशी’ अखिलेश वह मूल आधार खो चुके हैं, जिस पर राजनीति टिकी होती

है, जो है नैतिक साहस। प्रश्न है जब कोई नेता पत्नी के अपमान पर चुप रह जाए, तो जनता उससे अपने सम्मान की रक्षा की उम्मीद कैसे करे? अखिलेश की चुप्पी न सिर्फ उनके व्यक्तिगत चरित्र पर सवाल उठाती है, बल्कि उनकी राजनीति के दोहरे मापदंडों को भी उजागर करती है। उनकी चुप्पी यह भी बताती है कि तुष्टीकरण की नीति अब राजनीतिक पूंजी नहीं, राजनीतिक बोझ बनती जा रही है। मौलाना रशीदी जैसे कट्टरपंथी तत्वों के साथ समझौता करके सपा अपना जनाधार खो रही है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषscales of appeasementMuslim-Yadavradical elementsमुस्लिम तुष्टीकरण नीतितुष्टीकरण के तराजूAkhilesh Yadavमुस्लिम-यादवअखिलेश यादवकट्टरपंथी तत्वसमाजवादी पार्टीSamajwadi PartyMuslim appeasement policy
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