राज्यसभा में मंगलवार को माहौल उस समय गरमा गया जब विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने सदन के वेल में CISF की तैनाती का मुद्दा उठाया।
खरगे ने उठाया CISF तैनाती का मुद्दा
उन्होंने उपसभापति हरिवंश को लिखे पत्र में कहा— “हम स्तब्ध हैं कि विरोध दर्ज करा रहे सांसदों के बीच CISF जवान लाए गए। यह बेहद आपत्तिजनक है और संसद की गरिमा को गिराने वाला कदम है।”
रिजिजू ने कहा विपक्ष फैला रहा झूठ
वहीं संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि खरगे ने सदन को गुमराह किया और गलत जानकारी फैलाई।
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रिजिजू ने स्पष्ट किया— “उस दिन सदन में केवल मार्शल मौजूद थे, किसी भी बाहरी पुलिस या CISF की तैनाती नहीं थी। जब विपक्ष का नेता सभापति को ही गलत पत्र लिखता है, तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।”
विधायी कार्य में बाधा पर नाराजगी
रिजिजू ने आगे कहा कि विपक्ष मीडिया के जरिए झूठ फैला रहा है और सदन की गरिमा को ठेस पहुँचा रहा है। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि सत्र को शुरू हुए तीन हफ्ते हो गए हैं, लेकिन विपक्ष की हंगामेबाजी के कारण अब तक एक भी विधेयक पारित नहीं हो सका।
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उन्होंने बताया कि शिपिंग से जुड़ा विधेयक राज्यसभा से पास होकर लोकसभा में जा चुका है, वहीं राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव आज राज्यसभा में पारित किया जाएगा। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि वे विधायी कार्यों में अड़चन न डालें।
उपसभापति ने जताई गंभीर चिंता
उपसभापति ने सदन में लगातार गतिरोध को चिंताजनक बताया और कहा कि 28 जुलाई को वाईएसआर कांग्रेस के सदस्य के बोलते समय कुछ सदस्यों ने अपनी सीट से उठकर माइक पर जाकर व्यवधान उत्पन्न किया। क्या यह सदस्य के विशेषाधिकार का हनन नहीं था।
31 जुलाई को जब एक मंत्री स्वतः बयान दे रहे हैं, उनके बयान में भी बाधा डाली गई। कई और सदस्यों के बोलते समय भी माइक के पास जाकर नारेबाजी की गई। वेल में जाकर नारे लगाना अनुचित है। यह सदन की गरिमा गिराने वाली है।
इस सदन में महत्वपूर्ण बिल की कॉपी छिनकर फाड़ी गई, उन्हें उछाला गया। इस सदन में सुरक्षाकर्मियों का उपस्थित रहना नई बात नहीं है। ये सुरक्षाकर्मी सदन की गरिमा का ध्यान रखकर काम करते हैं।
सदन की गरिमा पर बहस
उपसभापति ने कहा- जहां तक सदस्यों के लोकतांत्रिक अधिकारों की बात है, वह उनका अधिकार है लेकिन सदन की गरिमा के अनुरूप ही। विपक्ष के नेता का लंबा संसदीय अनुभव है। वह विचार करें कि क्या सदन न चलने देना उचित है। 230वें सेशन में एक सदस्य जब वेल में घुसकर सदन की कार्यवाही बाधित कर रहे थे, तब उपसभापति ने इसको लेकर क्या कहा?
उपसभापति ने उसका भी जिक्र किया और कहा कि प्रश्नकाल और शून्य काल महत्वपूर्ण समय होता है। हम हंगामे के कारण कार्यवाही के 41 घंटे से अधिक समय गंवा चुके हैं। पक्ष-विपक्ष, सबकी जिम्मेदारी है सदन चलने देना। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी कोट करते हुए अपनी बात पूरी की।














