अमेरिका और चीन के शीर्ष नेताओं के बीच व्यापार को लेकर जल्दी ही वार्ता होने के कयासों के बीच भूराजनीतिक स्तर पर अमेरिका की ओर से एक ऐसा निर्णय लिया गया है जिसकी दूर दूर तक उम्मीद नहीं थी। हुआ यूं है कि ताइवान के राष्ट्रपति लातीनी अमेरिका के पराग्वे, ग्वाटेमाला और बेलिज देशों के दौरे पर जाने वाले थे। अमेरिका ने ताइवानी राष्ट्रपति के न्यूयॉर्क में रुकने के कार्यक्रम को मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद ताइवान की ओर से राष्ट्रपति की यात्रा रद्द कर दी गई। कूटनीति के विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि अमेरिका के उक्त निर्णय के बाद ताइवान के राष्ट्रपति दौरा रद्द करने के फैसले से चीन को एक बड़ी कूटनीतिक जीत मिली है। लेकिन दूसरे वर्ग का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्या व्यापार वार्ता को लेकर चीन के इतने मोह में आ गए हैं कि संप्रभु राष्ट्र ताइवान के विरुद्ध फैसला लेने लगे हैं!
ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते की प्रस्तावित लातीनी अमेरिका की यात्रा, जिसमें पराग्वे, ग्वाटेमाला और बेलिज शामिल थे, अचानक रद्द करने की घोषणा की गई है। इस यात्रा का उद्देश्य ताइवान के उन कुछ शेष राजनयिक सहयोगियों के साथ संबंधों को मजबूत करना था, जो अब भी ताइवान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देते हैं। लेकिन अमेरिका द्वारा न्यूयॉर्क में उनके कुछ देर रुकने के कार्यक्रम को अस्वीकार करने के बाद यह यात्रा रद्द कर दी गई। इस परिस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताइवान हाल ही में आए चक्रवाती तूफान ‘डानास’ से प्रभावित हुआ था, जिससे देश के पश्चिमी हिस्सों में भारी नुकसान हुआ है। यात्रा रद्द करने के कारण गिनते हुए सरकार ने कहा है कि राहत कार्यों को प्राथमिकता देने की दृष्टि से राष्ट्रपति लाई की यात्रा स्थगित की गई है। लेकिन कुछ रिपोर्ट बताती हैं कि अमेरिका ने लाई की यात्रा के क्रम में न्यूयॉर्क में कुछ देर ठहरने की अनुमति नहीं दी, जिसके पीछे संभवतः चीन का ताइवान को लेकर विरोध है। बेशक, यह स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती, क्योंकि पहले हर बार ताइवानी नेताओं को यात्रा के दौरान अमेरिका में रुकने की अनुमति मिलती रही है।

जैसा पहले बताया, अमेरिका और चीन के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं की वजह से संभवत: अमेरिका ने ताइवान के राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर सतर्क रहते हुए यह निर्णय लिया है। सवाल है कि क्या यह चीन की कूटनीतिक जीत है? विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि ताइवानी राष्ट्रपति की यात्रा रद्द होना चीन की एक बड़ी कूटनीतिक जीत की तरह देखा जाएगा। इससे चीन को यह संकेत गया कि अमेरिका ताइवान के मुद्दे पर नरम रुख अपना सकता है। यह कोई छुपी बात नहीं है कि ताइवान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पहले से ही चुनौतीपूर्ण है। इस यात्रा के रद्द होने से ताइवान की स्वतंत्र विदेश नीति पर सवाल उठ सकते हैं।
चीन दुनियाभर में यह कहता रहा है कि ‘ताइवान उसकी मुख्य भूमि का हिस्सा मानता है और एक दिन उसे मुख्य भूमि से जोड़ा जाना शेष है।’ चीन किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर ताइवान की एक स्वतंत्र देश के नाते भागीदारी का विरोध करता आया है। इसलिए बहुत हद तक, माना यही जा रहा है कि अमेरिका का यह कदम चीन के दबाव में लिया गया है।
पहले की बात करें तो अमेरिका ने ताइवान के नेताओं को हर बार उनकी यात्राओं के दौरान अपने यहां ठहरने की अनुमति दी है, लेकिन इस बार की यह अनुरोध ठुकराया जाना कुछ विश्लेषकों को ‘चीन के दबाव में झुकना’ लगा है। अमेरिकी प्रशासन के इस निर्णय की डेमोक्रेट्स सांसदों और पूर्व अधिकारियों ने आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि यह चीन के साथ व्यापार समझौते के लिए ताइवान के हितों की अनदेखी करना ही है।
इन परिस्थितियों में ताइवान को अपनी विदेश नीति को और अधिक रणनीतिक रूप से मजबूती देनी होगी। उधर अमेरिका को स्पष्ट करना होगा कि वह ताइवान के साथ अपने संबंधों को किस हद तक बनाए रखना चाहता है। चीन इस घटना को अपने पक्ष में प्रचारित कर सकता है। इससे ताइवान के अन्य सहयोगी देशों पर दबाव बढ़ सकता है। ताइवान के राष्ट्रपति की यात्रा का रद्द होना केवल एक राजनयिक घटना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हल्के से बदलाव का संकेत माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि ताइवान की विदेश नीति कितनी संवेदनशील है और कैसे अमेरिका-चीन संबंधों का उस पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

















