ऐतिहासिक रूप से कभी भारत का हिस्सा रही शक्सगाम घाटी में विस्तारवादी चीन की ताजा शैतानी हरकत सामने आई है। सैटेलाइट चित्रों ने खुलासा किया है कि भारत से 1947 में हथियाया यह इलाका जिन्ना के देश ने 1963 में अवैध रूप से चीन को दिया था। लेकिन अब इस विवादित क्षेत्र में चीन की यह गतिविधि सामने आने से भारत की सुरक्षा एजेंसियों को अब और सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील इस घाटी में चीन द्वारा किए गए सड़क निर्माण ने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी है। यह घटना न केवल क्षेत्रीय भू-राजनीति को प्रभावित करती है, बल्कि भारत की सुरक्षा, रणनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि से भी चिंताजनक है।
लद्दाख के उत्तर में स्थित शक्सगाम घाटी सियाचिन ग्लेशियर के पास है। यह क्षेत्र मूलतः भारत का हिस्सा था, लेकिन 1947 के बाद जिन्ना के देश ने इस पर अवैध कब्जा कर लिया। आगे चलकर मार्च, 1963 में पाकिस्तान ने चीन के साथ एक सीमा समझौते के तहत इस घाटी को चीन को सौंप दिया। यहां यह ध्यान रहे कि भारत ने इस समझौते को कभी मान्यता नहीं दी और इसे सदा अवैध बताया है।
अब ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस ने सैटेलाइट चित्रों के माध्यम से खुलासा किया है कि चीन ने जी 219 राजमार्ग से ‘अघिल दर्रा’ होते हुए शक्सगाम घाटी में सड़क बनाई है। यह सड़क सियाचिन से मात्र 30 मील की दूरी पर है, जिससे भारत की सामरिक स्थिति के लिए चिंता पैदा हो सकती है। चीन ने इस क्षेत्र में दो चौकियां भी स्थापित की हैं।

शक्सगाम घाटी चीन के सिंक्यांग प्रांत और पाकिस्तान के गैर कानूनी कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को जोड़ती है। यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को ग्वादर पोर्ट तक जोड़ने का रास्ता बन सकता है। भारत के लिए यह क्षेत्र सियाचिन की सुरक्षा और लद्दाख में सैन्य संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन और पाकिस्तान की संयुक्त रणनीति भारत को चारों ओर से घेरने की रही है।

भारत ने कई मौकों पर साफ तौर पर कहा है कि शक्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 2024 में भी दोहराया था कि भारत ने 1963 के चीन-पाकिस्तान समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया है। भारत ने चीन की गतिविधियों को ‘जमीनी स्थिति बदलने का प्रयास’ बताया और विरोध दर्ज कराया है।
जिन्ना के इस्लामी देश द्वारा भारत के क्षेत्र को चीन को सौंपना अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के अंतर्गत आता है। यह भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला करने जैसा है। चीन का यह कदम उसकी विस्तारवादी नीति का हिस्सा है, जो दक्षिण चीन सागर से लेकर हिमालय तक स्पष्ट रूप से दिखती है।
इसमें संदेह नहीं है कि भारत को इस क्षेत्र में अपनी सैन्य और कूटनीतिक उपस्थिति को और मजबूत करना होगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाना होगा और चीन तथा पाकिस्तान की शैतानी मिलीभगत को उजागर करना होगा। भारत सियाचिन और लद्दाख में इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ कर चीन की घुसपैठ को रोकने के उपाय कर ही रहा है। भारत को अपनी विदेश नीति में हमेशा की तरह स्पष्टता और दृढ़ता बनाए रखते हुए इस चुनौती का सामना करना होगा।

















