राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बिहार की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति रहा है, जिसकी स्थापना लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए की थी। इस पार्टी की विचारधारा शुरू से ही सवर्णों के खिलाफ एक आक्रामक रुख अपनाने की रही है, लेकिन सनातन परंपराओं के प्रति इसका रवैया हमेशा संतुलित रहा है। लालू प्रसाद यादव की छवि एक ऐसे नेता की रही है, जो छठ पूजा में सिर पर दउरा रखकर चलते थे और मुख्यमंत्री आवास में होली व छठ जैसे त्योहारों को धूमधाम से मनाते थे। उनकी माता के निधन के बाद ब्राह्मणों को सम्मान के साथ बिठाकर भोजन कराने की परंपरा भी इस बात का प्रमाण थी कि राजद, सवर्णों के खिलाफ अपने राजनीतिक रुख के बावजूद, सनातन परंपराओं का विरोधी नहीं था। लेकिन हाल के वर्षों में, खासकर तेजस्वी यादव की रशेल गोडिन्हो से शादी के बाद, पार्टी की विचारधारा और दिशा में बदलाव की बात सामने आ रही है, जिसने तेज प्रताप यादव जैसे सनातन परंपराओं में विश्वास रखने वाले नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है।
तेजस्वी और तेज प्रताप: दो धाराओं का टकराव
लालू प्रसाद यादव के दो बेटों, तेजस्वी और तेज प्रताप, के बीच का अंतर केवल व्यक्तिगत स्वभाव का ही नहीं, बल्कि विचारधारा और राजनीतिक दृष्टिकोण का भी है। तेज प्रताप, जो बड़े भाई हैं, अपनी सादगी और सनातन परंपराओं के प्रति गहरी आस्था के लिए जाने जाते हैं। दूसरी ओर, तेजस्वी यादव, जिन्हें लालू ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुना, ने पार्टी को एक नई दिशा दी है। तेजस्वी की शादी रशेल गोडिन्हो से होने के बाद राजद की विचारधारा में बदलाव की चर्चा तेज हुई। कुछ लोग मानते हैं कि इस शादी ने पार्टी को दो धाराओं में बांट दिया: एक जो सनातन परंपराओं का सम्मान करती है, और दूसरी जो कथित रूप से सनातन विरोधी तत्वों को बढ़ावा दे रही है।
सनातन विरोधी नेताओं का पार्टी में बढ़ा वर्चस्व
तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी में भाई वीरेन्द्र और चन्द्रशेखर यादव जैसे नेताओं का प्रभाव बढ़ा है, जिन्हें सनातन परंपराओं के खिलाफ विवादास्पद बयान देने के लिए जाना जाता है। खासकर चन्द्रशेखर यादव के शिक्षा मंत्री रहते हुए दिए गए बयानों ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया, लेकिन उन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं हुआ। यह इस बात का संकेत है कि तेजस्वी के नेतृत्व में राजद का रुख अब सनातन परंपराओं से हटकर एक नई दिशा में जा रहा है। इसके विपरीत, तेज प्रताप की सनातनी छवि और उनकी सादगी उन्हें पार्टी के पारंपरिक समर्थकों के बीच लोकप्रिय बनाती थी, लेकिन उन्हें पार्टी में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।
तेज प्रताप का हाशिए पर जाना
तेज प्रताप को पार्टी से निकाले जाने की खबर ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी। यह निर्णय न केवल अप्रत्याशित था, बल्कि इसे सोशल मीडिया पर एक ट्वीट के माध्यम से सार्वजनिक करना भी कई सवाल खड़े करता है। लालू प्रसाद यादव, जो अब तेजस्वी की निगरानी में हैं और जिनका ट्विटर अकाउंट कथित तौर पर तेजस्वी की टीम द्वारा संचालित होता है, ने इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की। यह बात और भी हैरान करती है कि लालू, जो जेल में रहते हुए भी अपने ट्विटर अकाउंट के जरिए सक्रिय रहे, अपने बड़े बेटे के पार्टी से निकाले जाने पर चुप्पी साधे रहे।
तेज प्रताप के एक ट्वीट में उनके कथित रिश्ते की बात सामने आई, जिसमें उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनका प्रेम संबंध उनकी शादी से पहले का था। इस ट्वीट ने यह सवाल उठाया कि क्या लालू परिवार ने तेजस्वी को क्रिश्चियन परिवार में शादी करने की अनुमति दी, लेकिन तेज प्रताप को यादव परिवार में शादी करने की आजादी भी नहीं दे पाया? यह असमानता तब और गंभीर हो जाती है, जब यह देखा जाता है कि तेज प्रताप, बड़े भाई होने के बावजूद, परिवार और पार्टी में उपेक्षित रहे। क्या यह उपेक्षा इसलिए थी कि तेज प्रताप सनातन परंपराओं में विश्वास रखते थे, जबकि तेजस्वी और उनके समर्थक एक अलग विचारधारा को बढ़ावा दे रहे थे?
मिशनरी प्रभाव और राजद की नई दिशा
तेजस्वी की शादी के बाद राजद के तमिलनाडु की मिशनरी समर्थक सरकार और उनके मुख्यमंत्री के साथ बढ़ते रिश्तों ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। एक उदाहरण यह है कि जब बिहार में एक यूट्यूबर तेजस्वी के लिए परेशानी का सबब बना, तो उसकी गिरफ्तारी तमिलनाडु में बेहद कठोर धाराओं के तहत हुई। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि तेजस्वी के नेतृत्व में राजद अब उन ताकतों के साथ जुड़ रहा है, जो सनातन परंपराओं के खिलाफ मानी जाती हैं। इस बीच, तेज प्रताप जैसे नेताओं को न केवल हाशिए पर धकेला गया, बल्कि उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
सामाजिक न्याय की बात करने वाले लालू ने अपने ही बेटे से किया अन्याय
लालू प्रसाद यादव, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में हमेशा कथित तौर पर सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के हितों की बात की, क्या अपने बड़े बेटे के साथ ऐसा अन्याय कर सकते हैं? यह सवाल बिहार के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में गूंज रहा है। तेज प्रताप की सनातनी छवि और उनकी सादगी उन्हें पार्टी के पारंपरिक समर्थकों के बीच लोकप्रिय बनाती थी, लेकिन तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी का रुख अब बदलता दिख रहा है। भाई वीरेन्द्र और चन्द्रशेखर जैसे नेताओं को उनकी आपत्तिजनक टिप्पणियों के बावजूद पार्टी में बनाए रखा गया, जबकि तेज प्रताप को बाहर का रास्ता दिखाया गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या राजद अब पूरी तरह से सनातन विरोधी पार्टी बन चुकी है?
राजद की विचारधारा में आए इस बदलाव ने न केवल पार्टी के भीतर, बल्कि बिहार के समाज में भी एक बहस छेड़ दी है। तेज प्रताप का पार्टी से बाहर होना और तेजस्वी का पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण इस बात का संकेत है कि राजद अब लालू प्रसाद यादव के मूल सिद्धांतों से भटक रही है। सनातन परंपराओं के प्रति लालू का सम्मान और उनकी सादगी भरी छवि अब धूमिल होती दिख रही है। तेज प्रताप जैसे नेताओं का हाशिए पर जाना और सनातन विरोधी तत्वों का पार्टी में बढ़ता प्रभाव इस बात का प्रमाण है कि राजद अब एक नई दिशा में बढ़ रही है, जो शायद उसके पारंपरिक समर्थकों के लिए स्वीकार करना मुश्किल होगा। यह सवाल आज नहीं तो कल समाज के सामने आएगा ही कि क्या तेजस्वी के नेतृत्व में राजद पूरी तरह से सनातन द्रोही बन चुकी है, और क्या यह बदलाव लालू प्रसाद यादव के मूल सपनों का अंत है?

















