नागपंचमी: हिन्दू संस्कृति में नाग पूजा, कुंडलिनी जागरण और सनातन एकत्व का प्रतीक
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नागपंचमी: हिन्दू संस्कृति में नाग पूजा, कुंडलिनी जागरण और सनातन एकत्व का प्रतीक

नागपंचमी हिन्दू संस्कृति का एक पवित्र पर्व है, जो नाग पूजा, कुंडलिनी जागरण और सनातन एकत्व को दर्शाता है। जानें वासुकी, शेषनाग और कालसर्प दोष निवारण के वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व को।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jul 29, 2025, 10:05 am IST
in विश्लेषण
Nag Panchami

प्रतीकात्मक तस्वीर

हिन्दू धर्म, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के आलोक में पशु- पक्षी, पेड़ – पौधे सहित सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ता है। हमारे यहां गाय की माँ के स्वरुप में पूजा होती है। अनेक बहनें कोकिला-व्रत करती हैं। कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कान पर पड़े तब ही भोजन लेना, ऐसा यह व्रत है। हमारे यहाँ वृषभोत्सव के दिन वृषभ का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री जैसे व्रत में बरगद की पूजा होती है, परन्तु नाग पंचमी के दिन नागों का विशिष्ट पूजन हमारी संस्कृति का वैशिष्ट्य है।

जनजातियों में नाग पूजा का विशेष महत्व है और गढ़ा-कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य के संस्थापक नागवंशी ही थे। तात्पर्य यह है हिन्दू और जनजाति पृथक नहीं हैं, इनका अद्वैत है। सावन शुक्ल पंचमी की तिथि नागपंचमी को समर्पित है।आईये जानते हैं कि महादेव के प्रिय नाग एवं गण “वासुकी” के बारे में और उन्होंने विशुद्ध चक्र में वासुकी को क्यों रखा? इसके साथ ही कश्मीर में “अनंतनाग” (शेष नाग) भगवान् विष्णु के प्रिय नाग के राज्य का भी मुक्ति दिवस है।

नागों के ध्यान बिना कुंडलिनी जागरण असंभव

नागों और उनके महत्व के परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक तथ्य तो हैं ही और यह भी सत्य है कि नाग के ध्यान किये बिना कुण्डलिनी जागरण असंभव है। क्योंकि कुण्डली हमारे शरीर में नाग स्वरुप में ही विद्यमान है। वैज्ञानिक तथ्य है कि नाग “मदर नेचर” अर्थात् पृथ्वी पर लेटा हुआ सर्वाधिक स्पर्श करता है इसलिए अतिसंवेदनशील होता है। यह तथ्य भगवान् शिव ने जाना और कुण्डली जागरण कर विशुद्ध में जहर को रोक लिया।

क्या कहता है जीव विज्ञान

अब जीव विज्ञान कहता है कि प्राणियों के निर्माण में संयोजक कड़ी (कनेक्टिंग लिंक) है, वैंसे लेमार्क, नव लेमार्क वाद और उत्परिवर्तन वाद के सिद्धांत भी पुष्टि करते हैं। अर्थात् सर्प मानव होते थे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है और भारत में नागवंशियों के राज्य और नाम नागपुर नागदाह, अनंतनाग, शेषनाग, नागालैंड जैसे सैकड़ों नाम नाग पर ही हैं। इसलिए ये भी सत्य ही है कि हिम युग के समय कश्मीर बर्फ से आच्छादित और पिघल रहा था तभी ऋषि कश्यप ने सती के साथ मिलकर एक राक्षस को पराजित कर दिया था और कश्मीर पर कश्यप ने अपना राज्य आरंभ किया। उनकी दो पत्नियों क्रमशः कद्रु और वनिता में से कद्रु ने पुत्रों के रूप में हजारों पुत्रों का आशीर्वाद मांगा और फलीभूत हुआ वो सर्प मानव के रूप में थे। उनमें 8 प्रमुख थे जिनमें 5 सर्वप्रमुख थे अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोट्क (कश्मीर में कर्कोट वंश इन्ही का द्योतक है) पिंगला।

अनंत (शेष नाग) के अनंत सिर हैं और सृष्टि के विनाश के समय शिव के आशीर्वाद से वही शेष रहेगा इसलिए शेषनाग कहा जाता है, जब गरुड़ सभी नागों का वध कर रहे थे तब वासुकी ने शेषनाग को यह सलाह दी और वासुकी स्वयं महादेव की सेवा में चले गये। इन्हीं नागों ने ही सर्वप्रथम शिवलिंग पूजा आरंभ की थी।

वासुकि ही क्यों बने नागराज? 

अब प्रश्न यह है कि वासुकी ही नागराज क्यों बने? और शिव के विशुद्ध में कैसे आए? ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इन प्रश्नों उत्तर इस तरह से हैं कि समुद्र मंथन के समय वासुकी ने रस्सी की जगह स्वयं रखा और घर्षण के कारण घायल हुए उसके उपरांत महादेव ने जब जहर ग्रहण किया तब वासुकी ने अपने सभी नागों के साथ महाकाल के साथ जहर का अल्पांश ग्रहण किया इसलिए शिव के प्रिय हो गये। शरीर में 114 चक्र होते हैं जिनमें 7 प्रमुख हैं शिव ने वासुकी के सहयोग से 114 चक्र जाग्रत किये। नागराज वासुकी ने शिव के विशुद्ध में स्थित जहर के प्रभाव कम करने के लिए गले में धारण करने के लिए आग्रह किया। महादेव ने अनुमति दे दी। महादेव वासुकी से अति प्रसन्न रहते हैं, यहाँ तक कि जब महादेव विवाह करने जा रहे थे तो अपने श्रृंगार की जिम्मेदारी वासुकी को दी थी और अंत में वासुकी श्रृंगार को बढ़ाने के लिए स्वयं तैयार होकर शिव के गले में लिपट गये।

वासुकि बने पिनाक की डोरी

एक युद्ध में शिव के धनुष पिनाक की डोरी टूटने पर डोरी के रुप में वासुकी ने भूमिका अदा की। वहीं वासुकी ने तक्षक को भी बचाया। तक्षक ने राजा परीक्षित को मार डाला था, क्योंकि शमीक ऋषि के कारण ऋंगी ने शाप दिया था परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने तक्षक नागों के वध के लिए “नागदाह” यज्ञ करवाया। तब एक ही तक्षक बचा जिसे भी वासुकी ने अपनी बुद्धि के प्रयोग से आस्तीक नामक ब्राम्हण की सहायता से बचा लिया।

यह वृतांत इस प्रकार है कि आज के दिन भगवान् ब्रम्हा ने नागों को वरदान दिया कि जब परीक्षित का पुत्र जन्मेजय – नागदाह यज्ञ करेगा – तब आस्तिक ऋषि वासुकी की सहायता से नागों की रक्षा करेंगे, इसलिए यह पंचमी नागों को अतिप्रिय है अतः इस दिन नागों के 12 कुलों या 8कुलों या 5 कुलों (विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर) पूजा करने पर नागदंश का भय समाप्त हो जाता है। मूलतः कालसर्प दोष 12 प्रकार के होते हैं – सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दिन – कालसर्प दोष समाप्त हो जाता है। यदि यह पूजा माँ नर्मदा के किनारे की जाती है तो सर्वाधिक श्रेयस्कर है।

नर्मदा को बहन मानते हैं नाग

नागों ने महादेव की पुत्री नर्मदा को अपनी सर्वप्रिय बहिन माना है, इसलिए नर्मदा जी का यह मंत्र पढ़ने से सर्प विष से भी बचा जा सकता है “नर्मदाय नम: प्रातः, नर्मदाय नम:निशि,नमोस्तु नर्मदे नम:, त्राहिमाम् विषसर्पत:”। नर्मदा जयंती को तो आप चाँदी के नाग – नागिन प्रवाहित कर दें तो कालसर्प योग से मुक्ति हो जाती है, मंत्र है -” ॐ कुरुकुल्य हुं फट स्वाहा” कालसर्प का संबंध राहू – केतु से है। नागराज वासुकी कुल के नाग माँ नर्मदा के पास ही रहते हैं।

भगवान कृष्ण ने किया था कालिया मर्दन

यह भी सर्वश्रुत है कि भगवान कृष्ण ने कालिया नाग को हराया था। जब उसे प्रतीत हुआ कि वह कोई साधारण बालक नहीं है, तो उसने कृष्ण से दया की भीख मांगी। श्री कृष्ण ने उसे जीवन दान देते हुए उससे वचन लिया कि वह अब गोकुल के निवासियों को कोई कष्ट नहीं पहुँचाएगा। नाग पंचमी का दिन भगवान कृष्ण की कालिया नाग पर विजय का प्रतीक है और इसी विजय के उपलक्ष्य में भारत में मल्ल युद्ध खेल का भी शुभारंभ हुआ।

गोंडवाना साम्राज्य के संस्थापक थे नागवंशी

महान् गोंडवाना साम्राज्य के संस्थापक जादोराय (यदु राय) नागवंशी ही थे। यह प्रचलित है कि गढ़ा – कटंगा में सकतू गोंड नाम के योद्धा रहते थे । जिनके पुत्र धारूशाह थे । इन्हीं धारूशाह के पौत्र जादोराय थे, जिन्होंने गढ़ा में गोंड राज्य की नींव रखी थी। उनका विवाह नागदेव की कन्या रत्नावली से हुआ था। दमोह के सिलापरी में उनके वंशजों के पास जो वंशावली है उसमें जादोराय ही वंश का मूल पुरुष माना गया है। बालाघाट में भी नागवंशियों का साम्राज्य था। प्राचीन काल में और गोंड शासन में नागवंशियों को विशेष महत्व दिया जाता था। क्योंकि युद्ध के समय यही नागवंशी सर्प युक्त तीरों को उपलब्ध कराते थे जो दुश्मनों पर हमला करने के काम आते थे।

भारतवर्ष कृषि प्रधान देश है और नाग खेतों का रक्षण करते हैं, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके नाग हमारे खेतों की फसलों की रक्षा करते हैं।  नाग हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रेय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली। वस्तुतः सनातन में नागपंचमी हिंदुत्व के एकत्व का प्रतीक है।

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के स्वयं के विचार हैं। आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे सहमत हो)

Topics: शेषनागSheshnagनाग पूजाकुंडलिनी जागरणवासुकीसनातन धर्मकालसर्प दोषहिन्दू संस्कृतिsnake worshipHindu CultureKundalini awakeningनागपंचमीVasukiNagpanchamiKalsarp DoshSanatan Dharma
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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