भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का सफल परीक्षण : वह प्रयोग जिससे भारतीय रेलवे ने रच दिया इतिहास!
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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का सफल परीक्षण : वह प्रयोग जिससे भारतीय रेलवे ने रच दिया इतिहास!

भारतीय रेलवे ने चेन्नई ICF में भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का सफल परीक्षण किया। यह हरित ऊर्जा की दिशा में एक ऐतिहासिक और तकनीकी उपलब्धि है। जानिए इसका सम्पूर्ण विश्लेषण...

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jul 26, 2025, 10:46 pm IST
inभारत, विश्लेषण

भारतीय रेलवे, जो न केवल देश की जीवनरेखा है बल्कि विश्व की सबसे बड़ी रेलवे प्रणालियों में से एक भी है, अब एक नई दिशा में अग्रसर हो रही है, हरित ऊर्जा और सतत विकास की ओर। हाल ही में, चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में भारत की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का सफल परीक्षण कर इतिहास रच दिया गया है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के ‘नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन’ के लक्ष्य की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

इसे देखकर कहना होगा कि आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, भारतीय रेलवे का यह कदम न केवल राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक पटल पर एक मजबूत संदेश देता है कि भारत न केवल विकास कर रहा है, बल्कि वह पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को निभाते हुए कर रहा है। हाइड्रोजन ट्रेन सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के आत्मनिर्भर, स्वच्छ और टिकाऊ भविष्य की गूंज है।

हाइड्रोजन ट्रेन : भविष्य की रेल सेवा

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्वयं सोशल मीडिया के माध्यम से यह जानकारी साझा की कि चेन्नई की आईसीएफ फैक्ट्री में ड्राइविंग पावर कार (Hydrogen Powered Coach) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है। इस ट्रेन में प्रयुक्त हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक एक क्रांतिकारी समाधान है, जो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की प्रतिक्रिया से बिजली उत्पन्न करती है और केवल जलवाष्प (Water Vapour) को उप-उत्पाद के रूप में उत्सर्जित करती है। यह पर्यावरण के अनुकूल समाधान है। कोई धुआं या CO₂ उत्सर्जन नहीं। इसके साथ ही यह प्रयोग पारंपरिक डीजल ट्रेनों की तुलना में अधिक स्वच्छ है। शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण घटाने में सहायक है।

दरअसल, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) हैंडल पर पोस्ट करते हुए लिखा, “चेन्नई स्थित आईसीएफ में पहले हाइड्रोजन चालित कोच (ड्राइविंग पावर कार) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।भारत 1,200 एचपी हाइड्रोजन ट्रेन विकसित कर रहा है। इससे भारत हाइड्रोजन चालित ट्रेन तकनीक में अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा।”

First Hydrogen powered coach (Driving Power Car) successfully tested at ICF, Chennai.

India is developing 1,200 HP Hydrogen train. This will place India among the leaders in Hydrogen powered train technology. pic.twitter.com/2tDClkGBx0

— Ashwini Vaishnaw (@AshwiniVaishnaw) July 25, 2025

आर्थिक और तकनीकी दृष्टिकोण

उत्तर रेलवे में पायलट प्रोजेक्ट के लिए ₹111.83 करोड़ स्वीकृत किए हैं, हर ट्रेन की अनुमानित लागत: ₹80 करोड़ आएगी। तकनीकि वैज्ञानिकों का कहना है कि हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआती लागत ज़रूर अधिक है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह सस्ती, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा का स्रोत बन सकती है।

उल्‍लेखनीय है कि जिस कोच का परीक्षण किया गया, उसे ‘ड्राइविंग पावर कार’ के नाम से जाना जाता है। रेल मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि यह कदम हरित ऊर्जा (Green Energy) और भविष्य के लिए तैयार परिवहन समाधानों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा को इस बारे में वर्ष 2023 में, सूचित किया था कि भारतीय रेलवे “विरासत के लिए हाइड्रोजन” पहल के तहत 35 हाइड्रोजन-संचालित ट्रेनें चलाने की योजना बना रहा है। इस दौरान संसद में उन्होंने यह भी बताया था कि उत्तर रेलवे के जींद-सोनीपत खंड पर चलने वाली एक डीज़ल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट को हाइड्रोजन ईंधन के साथ पुनर्निर्मित करने के लिए एक पायलट परियोजना पर काम कर रहा है। हालांकि, हाइड्रोजन ट्रेनों की शुरुआती परिचालन लागत अधिक हो सकती है, लेकिन समय के साथ इसमें कमी आने की उम्मीद है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य हरित परिवहन को बढ़ावा देना और स्वच्छ हाइड्रोजन ऊर्जा के ज़रिए भारत के शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों का समर्थन करना है।

गौर करें कि पिछले कुछ सालों में रेलवे ने कई बड़े प्रोजेक्‍ट सफलता से पूरे किए हैं, जिसमें कि ऊँचाई और इंजीनियरिंग के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे पुल भारत में जम्मू-कश्मीर का चिनाब रेल पुल है। यह दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे आर्च ब्रिज है, जिसकी ऊँचाई चिनाब नदी पर 359 मीटर है, जो एफिल टॉवर और कुतुब मीनार से भी ऊँचा है। इसे भीषण भूकंपीय गतिविधियों और 260-266 किमी/घंटा की तेज़ हवाओं को झेलने के लिए डिज़ाइन किया गया है। चिनाब पुल, उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (USBRL) परियोजना का एक महत्वपूर्ण घटक है, जो कश्मीर को रेलमार्ग से शेष भारत से जोड़ता है। इसमें दोहरी रेल पटरियों के लिए जगह है और यह 100 किमी/घंटा तक की गति वाली ट्रेनों को संभाल सकता है।

इसी तरह से अन्य उल्लेखनीय प्रयोग और नवाचारों में वंदे भारत एक्सप्रेस: आत्मनिर्भर भारत की तेज़ रफ्तार और पहचान बन चुकी है। यह पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से निर्मित, अधिकतम गति: 160 किमी/घंटा और आधुनिक सुविधाएं जैसे जीपीएस आधारित सूचना प्रणाली, स्वचालित दरवाजे, बायो-वैक्यूम शौचालय से पूर्ण है।

इसके अलावा सौर ऊर्जा से चलने वाले कोच भी रेलवे ने तैयार किए हैं। भारतीय रेलवे ने कुछ रूट्स पर सोलर पैनल से युक्त कोच आज चलाना भी प्रारंभ कर दिया है। इससे डीज़ल खपत में भारी कमी और कार्बन उत्सर्जन में स्पष्ट गिरावट देखी गई है

रेलवे ने इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर तेज़ी से कदम उठाए हैं। वर्ष 2030 तक पूरे नेटवर्क को शत-प्रतिशत विद्युतीकृत करने का लक्ष्य रखा गया है। कहना होगा कि इसके पूरा होते ही भारतीय रेलवे विश्‍व की सबसे बड़ी ग्रीन रेलवे बन जाएगा। वहीं, डिजिटल इंडिया की दिशा में रेलवे में स्मार्ट टिकिटिंग और ट्रैकिंग का काम शुरू हो गया है। रेलवे स्टेशनों पर एआई आधारित निगरानी, फेस रेकग्निशन का काम आरंभ है। रेल मदद ऐप और एनटीईएस से यात्री अनुभव को नई ऊंचाइयों पर ले जाया गया है। देखा जाए तो भारतीय रेलवे का यह परिवर्तनशील रूप सिर्फ तकनीकी नवाचार नहीं है, यह भारत के भविष्य की प्रभावी कल्पना है। एक ऐसा भविष्य जहां प्रदूषण रहित, तेज़, सुरक्षित और किफायती यात्रा आम नागरिक का अधिकार होगी। हाइड्रोजन ट्रेन इस दिशा में एक नई आशा का प्रतीक है।

Topics: Eco Friendly TransportRailway InnovationIndian RailwaysAshwini VaishnawGreen EnergyHydrogen Train IndiaNet Zero EmissionICF ChennaiHydrogen Fuel Cell
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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