मंदिर में इस्लाम का प्रचार जुर्म नहीं: कर्नाटक HC के फैसले से संतों में आक्रोश, पूछा- हिंदू मस्जिद में ऐसा कर सकते हैं
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मंदिर में इस्लाम का प्रचार जुर्म नहीं: कर्नाटक HC के फैसले से संतों में आक्रोश, पूछा- हिंदू मस्जिद में ऐसा कर सकते हैं

स्वामी केशव स्वरूप का कहना है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले से हम सहमत नहीं हैं। अगर किसी मुस्लिम को अपने मजहब का प्रचार ही करना है तो मस्जिद में जाइये। हमारे धार्मिक स्थल मंदिर के बाहर प्रचार की क्या आवश्यकता है?

Written byLalit FularaLalit Fulara
Jul 25, 2025, 06:32 pm IST
in भारत
सांकेतिक तस्वीर, एआई जनरेटिड

सांकेतिक तस्वीर, एआई जनरेटिड

कर्नाटक हाईकोर्ट का एक अजीब फैसला चर्चाओं में है। इसे लेकर हिंदू समुदाय और हिंदू धर्मगुरुओं में आक्रोश है। कई धर्मगुरु पूछ रहे हैं कि क्या कर्नाटक उच्च न्यायालय ऐसा ही फैसला मस्जिद को लेकर भी देगा? मंदिर हिंदुओं का पवित्र धर्मस्थल है और उसके बाहर या अंदर कोई अन्य समुदाय का व्यक्ति अपने मजहब का प्रचार कैसे कर सकता है? उन्हें अपने पैगंबर का प्रचार ही करना है तो मस्जिद में जाइये। ऋषिकेश स्थित स्वामी माधवाश्रम के स्वामी केशव स्वरूप का कहना है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले से हम सहमत नहीं हैं। अगर किसी मुस्लिम को अपने मजहब का प्रचार ही करना है तो मस्जिद में जाइये। हमारे धार्मिक स्थल मंदिर के बाहर प्रचार की क्या आवश्यकता है?

यह बिल्कुल गलत है। अगर हम मस्जिद में जाकर या मस्जिद के बाहर हनुमान चालीसा या दुर्गा चालीसा पढ़ें तो मुस्लिम क्या हमारा स्वागत करेंगे? अगर किसी दूसरे मजहब के व्यक्तियों को हमारे मंदिरों के बाहर अपने धर्म के प्रचार की छूट है तो हमें भी उनके मस्जिदों के अंदर या बाहर अपने धर्म के प्रचार और अपने भगवानों की कथाओं की छूट होनी चाहिए। कल के दिन अगर हिंदू भी ऐसा ही करने लगे और हिंसा या कोई अप्रिय घटना घटेगी तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या कोर्ट इसकी जिम्मेदारी लेगा? हम मानते हैं कि कोर्ट ने संविधान के हिसाब से फैसला दिया होगा लेकिन इस फैसले से हमारी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।

स्वामी केशव स्वरूप

आइए जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और इस फैसले की आलोचना क्यों हो रही है?

क्या है पूरा मामला?

कर्नाटक हाइकोर्ट ने हाल ही में एक फैसला सुनाया है कि अगर लालच और जोर-जबरदस्ती नहीं है तो मंदिर में इस्लाम धर्म का प्रचार करना और पर्चे बांटना जुर्म नहीं है। कोर्ट ने जामखंडी स्थित रामतीर्थ मंदिर परिसर में इस्लाम का प्रचार करने, पर्चे बांटने और लोगों को इस्लाम के बारे में मौखिक रूप से बताने के आरोप में तीन मुस्लिम युवकों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ जानकारी देना या धर्म का प्रचार करना अपराध नहीं है। इस मामले के शिकायतकर्ताओं ने कहा था कि आरोपी मुस्लिम युवकों ने वहां मौजूद लोगों को इस्लाम धर्म अपनाने के बदले कार और दुबई में नौकरी का लालच भी दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब तक जबरन धर्म परिवर्तन या किसी तरह के प्रलोभन के स्पष्ट सबूत न हो, तब केवल जानकारी देना या किसी धर्म का प्रचार करना अपराध नहीं है।

सांकेतिक तस्वीर, एआई जनरेटिड

मंदिर के बाहर मुस्लिम युवकों ने बांटी थी इस्लाम की किताबें और पर्चे

यह पूरा मामला 4 मई 2025 का है। शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में कहा था कि वह जामखंडी स्थित रामतीर्थ मंदिर गया था। वहां तीन मुस्लिम युवक इस्लाम से जुड़ी किताबें और पर्चे बांट रहे थे। वे मंदिर में मौजूद लोगों को इस्लाम और पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं के बारे में जानकारी दे रहे थे। जब उनसे पूछा गया कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने हिंदू धर्म की आलोचना की, और सनातन धर्म को लेकर आपत्तिजनक बातें कही।

शिकायत का दावा था कि आरोपियों ने मंदिर में आये लोगों को इस्लाम धर्म अपनाने पर कार और दुबई में नौकरी देने का लालच दिया था। इसके बाद आरोपियों के खिलाफ थाने में शिकायत की गई थी। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 299, 351(2) और 3(5) के अलावा कर्नाटक धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2022 की धारा 5 के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।

जब यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा तो न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी की एकल पीठ ने पूरे मामले की सुनवाई की और प्राथमिकी रद्द करने का फैसला सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी धर्म का प्रचार करना या जानकारी देना तब तक अपराध नहीं है, जब तक कोई व्यक्ति किसी को बलपूर्वक, धोखे से या लालच देकर मतांतरण ऑकरने का प्रयास नहीं करता, तब तक उसे कन्वर्जन का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।  किसी को इस्लाम के बारे में बताना या पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं को साझा करना संवैधानिक अधिकारों के अंतर्गत आता है। अदालत ने यह भी कहा कि कन्वर्जन की शिकायत केवल वही व्यक्ति या उसके परिवार का कोई सदस्य दर्ज करा सकता है जिसने स्वयं मतांतरण किया हो। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं था, इसलिए शिकायत को वैध नहीं माना गया। अदालत ने सुनवाई के दौरान आरोपी को बरी कर दिया और एफआईआर रद्द कर दी।

Topics: anger over Karnataka High Court decisionMuslim youthangerHindu saintKarnataka High Court decision
Lalit Fulara
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास' में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 12 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय. करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से हुई और उसके बाद ज़ी न्यूज़, न्यूज़18, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और इंडियाडॉटकॉम होते हुए वर्तमान में पांचजन्य डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. पत्रकारिता में एम.ए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से किया है. [Read more]
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