खेती-किसानी : आयातक नहीं निर्यातक हैं हम
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10 हजार साल पुराना है भारत का कृषि का ज्ञान-विज्ञान, कपड़ों का निर्यातक भी था

भारत में कृषि का ज्ञान-विज्ञान लगभग 10,000 वर्ष से अधिक पुराना है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, भारत न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर था, बल्कि विभिन्न कृषि उत्पादों और कपड़ों का निर्यातक भी था। उस समय भारत की 25 प्रतिशत आबादी उद्योग-धंधों में लगी थी खेती-किसानी-3

Written byनरेश सिरोहीनरेश सिरोही
Jul 22, 2025, 08:31 pm IST
inभारत, विश्लेषण

भारत में कृषि का इतिहास लगभग उतना ही प्राचीन है, जितना भारत। रॉयल कमिशन ऑन एग्रीकल्चर 1936 के अनुसार, भारत में कृषि का ज्ञान-विज्ञान लगभग 10,000 वर्ष से अधिक पुराना है। आदिकालीन और मध्यकालीन भारत में चावल, गेहूं, मोटे अनाज और दलहनों की खेती के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि भारत न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर था, बल्कि विभिन्न कृषि उत्पादों, जैसे-मसाले, चावल, कपास और रेशमी कपड़ों का निर्यातक भी था, जिससे वह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक शक्ति बना। उस समय भारत की 25 प्रतिशत आबादी उद्योग-धंधों में लगी थी।

नरेश सिरोही
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा

विभिन्न इतिहासकारों की मानें तो भारत घनी आबादी वाला देश था, लेकिन पर्याप्त जल, वर्षा, सिंचाई के पर्याप्त साधनों, अनुकूल कृषि जलवायु स्थितियों और मिट्टी की उर्वरता के कारण वर्ष में दो बार फसल उगाना संभव हुआ। इससे खाद्यान्न के व्यापक उत्पादन में सहायता मिली। भारत के किसान सदा से ही कुशल, परिश्रमी, स्वतंत्र और स्वाभिमानी रहे हैं। उनकी समृद्धि के कारण ही भारतीय गांव उद्योग-धंधों से संपन्न रहे। किसानों की समृद्धि को मध्यकाल, विशेषरूप से अकबर के शासनकाल के बाद ग्रहण लगना शुरू हुआ।

मुगलों ने खेती को बर्बाद किया, जिससे खाद्यान्न की उपलब्धता कम हुई। यह समस्या अंग्रेजों के आने के बाद और बढ़ गई। कारण, अंग्रेज चाय, कॉफी, नील, चरस, पटसन/जूट, रेशा और गन्ने जैसी वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन पर ज्यादा जोर देते थे। इस तरह खाद्यान्न फसलों का उत्पादन कमजोर कर दिया गया। उदाहरण के लिए, 1901 से 1947 तक खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट आई, जबकि आबादी 38 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन खेती योग्य क्षेत्रफल में केवल 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में कृषि कठिन दौर से गुजर रही थी। घरेलू मांग की पूर्ति करने हेतु खाद्यान्न का आयात काफी तेजी से बढ़ा। 1946 में खाद्यान्न आयात 1.5 मिलियन टन था, जो 1950 में बढ़कर 4.8 मिलियन टन तथा 1966 में 10.4 मिलियन टन के सर्वोच्च स्तर पर था।

गत 75 वर्ष में भारत के आयातक से निर्यातक देश बनने तथा कृषि क्षेत्र में अभी तक हुए सुधारों को सात काल खंडों में बांटकर विश्लेषण की आवश्यकता है।

पहला कालखंड : आजादी के बाद पहला दौर 1947 से 1968 तक का है, जिसमें बुआई क्षेत्र का विस्तार, सिंचाई के संसाधनों में वृद्धि और भूमि सुधार कानूनों की मुख्य भूमिका रही है।

दूसरा कालखंड : 1968 से 1980 तक अधिक उत्पादन देने वाली बौनी किस्मों, उर्वरकों, कीटनाशकों एवं नवीन तकनीक का प्रयोग हुआ, जिसे हरित क्रांति का प्रादुर्भाव काल कहा जाता है।

तीसरा कालखंड : 1981 से 1991 तक कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति, सुनिश्चित सरकारी खरीद और भंडारण एवं वितरण की राष्ट्रव्यापी व्यवस्था हुई।

चौथा कालखंड : 1991 से 1998 तक उदारीकरण, वैश्वीकरण का दौर रहा, जिसमें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की स्थापना हुई तथा औद्योगिक, सेवा क्षेत्र, बौद्धिक संपदा के नियम-कायदों के साथ-साथ कृषि क्षेत्र को विश्व व्यापार में शामिल कर बड़े बदलावों की शुरुआत हुई।

पांचवां कालखंड : 1999 से 2004 के दौरान परंपरागत जैविक खेती को बढ़ावा, ग्रामीण आधारभूत ढांचा निर्माण जैसे- सड़क, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा आदि के विकास तथा कृषि क्षेत्र में आई विसंगतियों को दूर करने के लिए नवंबर, 2004 में प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट 4 अक्तूबर, 2006 को सरकार को सौंपी।

छठा कालखंड : 2014 से, मोदी सरकार द्वारा उत्पादन के साथ-साथ किसानों की आय को दोगुनी करने के संकल्प को पूरा करने की दृष्टि से मृदा स्वास्थ्य कार्ड, बूंद-बूंद सिंचाई, नई फसल बीमा योजना सहित अनेक योजनाओं के साथ-साथ वैल्यू एडिशन और किसानों को सीधे मार्केटिंग से जोड़ने की बातें कही गई थीं।

सातवां कालखंड : 2020 में कोविड-19 महामारी संकट से उपजी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आत्मनिर्भर गांवों का निर्माण कर आत्मनिर्भर भारत बनाने के संकल्प को पूरा करने के लिए कार्य योजना का विस्तार हुआ।

स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन सरकारों द्वारा हरित क्रांति सहित शुरुआती तीन कालखंडों के प्रभावी कृषि सुधारों के परिणामस्वरूप इस बात का उल्लेख करना तर्कसंगत है कि 1950-51 के दौरान भारत में खाद्यान्न उत्पादन 50.8 मिलियन टन, सब्जी-फल 25 मिलियन टन, दूध 17 मिलियन टन, अंडे 1.8 बिलियन और मछली उत्पादन 0.75 मिलियन टन था। 2023-24 में खाद्यान्न उत्पादन 332.29 मिलियन टन, सब्जी-फल 353.19 मिलियन टन, दूध 239.3 मिलियन टन, अंडे 138.38 अरब और मछली उत्पादन 22 मिलियन टन हुआ। इस तरह, 1950-51 के मुकाबले खाद्यान्न उत्पादन 6.5 गुना, सब्जी-फल-दूध उत्पादन 14 गुना से अधिक, अंडे 77 गुना और मछली उत्पादन लगभग 29 गुना बढ़ा।

आज भारत विश्व का सबसे बड़ा कृषि और खाद्य उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 11.6 प्रतिशत है। एक समय अमेरिका से लाल गेहूं आयात करने वाला भारत आज उसी अमेरिका को सबसे अधिक कृषि उत्पाद निर्यात कर रहा है। यह स्थिति तब है, जब हमारे देश में फसलों की उत्पादकता कई देशों की तुलना में बहुत कम है। इसमें अभी और सुधार की जरूरत है। इसके लिए वर्तमान परिस्थितियों का वास्तविक आकलन, विश्लेषण, अतीत की भूल को सुधारते हुए हमें अपनी सामर्थ्य अनुसार योजना बनाकर आगे बढ़ना होगा।

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इस खबर भी पढ़ें- खेती किसानी : खेती-किसानी अब बिना परेशानी

Topics: आजादी के बाद पहला दौर‘आत्मनिर्भर भारत’Self-reliant IndiaFarmingखेती-किसानीपाञ्चजन्य विशेषKnowledge of agriculture in IndiaFirst phase after independenceभारत में कृषि का ज्ञान
नरेश सिरोही
नरेश सिरोही
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा [Read more]
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