रील की सनक: वायरल होने की होड़ में जान से खेलते बच्चे और बड़े
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रील की सनक: वायरल होने की होड़ में जान से खेलते बच्चे और बड़े

रील्स की शुरुआत एक क्रिएटिव माध्यम के रूप में हुई थी, जिसमें लोग अपनी प्रतिभा, हास्य, कला या किसी संदेश को संक्षिप्त समय में प्रस्तुत करते थे लेकिन आज ये सीमाएं टूट चुकी हैं।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Jul 14, 2025, 12:04 pm IST
in भारत

आज के डिजिटल युग में फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब हमारी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बन गए हैं। इन प्लेटफॉर्म्स ने अभिव्यक्ति की आज़ादी का विस्तार किया है, लेकिन इसके साथ ही एक बेहद ख़तरनाक चलन भी जन्म ले चुका है, वो है रील्स का जुनून, जो न सिर्फ़ लोगों की मानसिकता को विकृत कर रहा है, बल्कि अब उनकी जान को भी ख़तरे में डाल रहा है। रील्स की शुरुआत एक क्रिएटिव माध्यम के रूप में हुई थी, जिसमें लोग अपनी प्रतिभा, हास्य, कला या किसी संदेश को संक्षिप्त समय में प्रस्तुत करते थे लेकिन आज ये सीमाएं टूट चुकी हैं। अब रील्स मनोरंजन के नाम पर सनक, सनसनी और सनकीपन का पर्याय बन चुकी हैं। युवा पीढ़ी से लेकर छोटे बच्चे और यहां तक कि उनके माता-पिता तक, हर कोई ‘वायरल’ होने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुका है, फिर चाहे इसके लिए खुद की जान क्यों न जोखिम में डालनी पड़े।

जीवन से बड़ी नहीं है ‘रील’

हाल ही में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जहां लोगों ने खतरनाक स्टंट करते हुए या जानलेवा स्थिति में रील बनाने का दुस्साहस किया और नतीजतन या तो खुद की जान गंवा दी या अपने बच्चों की। दिल्ली, मुंबई, पटना, जयपुर, लखनऊ जैसे शहरों से लेकर गांव-कस्बों तक रील्स की यह सनक फैलती जा रही है। कोई ट्रेन के सामने खड़े होकर रील बना रहा है, कोई चलती बाइक पर स्टंट करते हुए, कोई ऊंची इमारत या पुल की रेलिंग पर खड़ा होकर तो कोई उफनती नदी या समंदर में डूबते हुए बच्चों के साथ। यह न केवल कानूनी रूप से आपत्तिजनक है बल्कि नैतिकता और मानवीय संवेदना की भी घोर अवहेलना है।

बच्चों को बनाया जा रहा ‘रील का सामान’

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक महिला अपने तीन साल के मासूम बच्चे को ऊंची रेलिंग पर बैठाकर मोबाइल कैमरा लेकर रील बना रही थी। बच्चा डर के मारे कांप रहा था लेकिन ‘परफेक्ट शॉट’ के जुनून में मां को उसका डर नजर नहीं आया। एक अन्य घटना में एक गहरे कुएं की मुंडेर पर बैठी महिला कुएं के भीतर अपने पैर लटकाए रील बना रही है, रील बनाते समय उसके पैरों पर उसका नन्हा मासूम लटका हुआ है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि लोग अब संवेदनशून्य होते जा रहे हैं और ‘लाइक्स’, ‘फॉलोअर्स’ और ‘व्यूज’ के नशे में रिश्तों और जिम्मेदारियों को भी तिलांजलि दे रहे हैं। एक अन्य वीडियो में एक पिता ने अपने बच्चे को पालतू अजगर के सामने बैठा दिया ताकि ‘थ्रिलिंग रील’ बनाई जा सके। ऐसे माता-पिता बच्चों के जीवन को मनोरंजन का साधन बना रहे हैं। यह न केवल बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा है बल्कि उनके मानसिक विकास को भी प्रभावित करता है।

मौत का कारण बन रही रील बनाने की सनक

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्टों के अनुसार, 2023-24 के दौरान भारत में रील्स या सोशल मीडिया वीडियो बनाते हुए 150 से अधिक लोगों की मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकतर युवक और किशोरवय के थे, जो बाइक स्टंट, रेल की पटरियों पर वीडियो, ऊंची इमारतों से कूदने या खतरनाक जगहों पर सेल्फी/रील बनाने के प्रयास में अपनी जान गंवा बैठे। अहमदाबाद में एक युवा रेल की पटरियों पर ‘हीरो की एंट्री’ सीन शूट कर रहा था। ट्रेन की गति का अंदाजा न होने से वह मौके पर ही कट गया। चेन्नई में दो युवकों ने चलती ट्रेन की छत पर स्टंट करते हुए रील बनाने की कोशिश की और बिजली के झटके से उनकी मौत हो गई। ये घटनाएं केवल उदाहरण नहीं बल्कि चेतावनी हैं।

सोशल मीडिया का दबाव और मानसिक असंतुलन

आज की युवा पीढ़ी ‘डोपामिन हिट’ की आदी हो चुकी है। हर लाइक, कमेंट और शेयर उनके आत्मविश्वास को अस्थायी रूप से बढ़ाता है और फिर उन्हें ‘और अधिक’ की भूख लगती है। यह मानसिक असंतुलन का रूप ले चुका है, जहां एक रील वायरल न होने पर अवसाद, कुंठा और आत्महत्या तक की प्रवृत्ति देखी जा रही है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति बार-बार सोशल मीडिया पर प्रशंसा पाने का आदी हो जाता है तो उसका मस्तिष्क एक कृत्रिम दुनिया में जीने लगता है। वास्तविक जीवन में मिलने वाली अस्वीकृति, आलोचना या उपेक्षा उसे तोड़ने लगती है। इसलिए आज अधिकतर किशोर और युवा मानसिक तनाव, अकेलापन और आत्ममूल्यांकन की समस्याओं से जूझ रहे हैं।

आभासी पहचान का मोह और सामाजिक क्षरण

रील्स के जरिए बनाई गई आभासी पहचान वास्तविक जीवन से अधिक प्रभावी लगने लगी है। कई लोग अपने मूल स्वभाव और सामाजिक संबंधों से कटकर केवल सोशल मीडिया की दुनिया में जीने लगे हैं। सुबह उठते ही उनका पहला काम रील देखना या बनाना; खाना खाते समय भी रील शूट करना, बच्चों के साथ खेलते समय रील बनाना और यहां तक कि धार्मिक स्थलों और अंतिम संस्कार जैसी गंभीर जगहों पर भी रील बनाना, यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हम कहां जा रहे हैं। इस सनक ने लोगों को यथार्थ से काटकर एक आभासी स्वार्थ और प्रदर्शन की दुनिया में धकेल दिया है। रिश्ते, भावनाएं, संवेदनाएं, समाज और जिम्मेदारियां सब कुछ रील्स के पीछे छूट रहा है।

तकनीक का उपयोग या दुरुपयोग?

यह सत्य है कि सोशल मीडिया और रील्स ने कई प्रतिभाओं को मंच दिया है, कई लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नया आयाम दिया है परंतु जब यही तकनीक विवेकहीन हो जाती है तो उसका दुरुपयोग समाज के लिए विष समान बन जाता है। जब एक व्यक्ति जानबूझकर दुर्घटना की संभावना वाले स्थान पर रील बनाता है तो वह केवल अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी खतरा उत्पन्न करता है। उदाहरण के तौर पर, हाईवे पर बाइक स्टंट के दौरान किसी को टक्कर मार देना या किसी रेल यात्रा में बाधा उत्पन्न करना, एक गंभीर अपराध है। यह न केवल अपराध है बल्कि एक सामाजिक गैर-जिम्मेदारी भी है।

कानून और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की भूमिका

वर्तमान में कुछ राज्यों ने रील्स से जुड़ी खतरनाक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। उदाहरणतः उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में खतरनाक स्टंट या ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते हुए बनाए गए वीडियो पर दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है मगर अभी भी ऐसी घटनाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं हो पाया है। सोशल मीडिया कंपनियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे खतरनाक, हिंसात्मक या अविवेकपूर्ण कंटेंट को प्रमोट न करें। उन्हें ऑटोमेटिक एल्गोरिदम की बजाय मानवीय मूल्यांकन के आधार पर ऐसे कंटेंट को सीमित करना होगा। बच्चों और किशोरों में रील्स की सनक को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उनके अभिभावकों और शिक्षकों की है। उन्हें बच्चों को यह समझाना होगा कि जीवन में वास्तविक उपलब्धियां क्या होती हैं। रील्स और सोशल मीडिया पर मिलने वाली लोकप्रियता क्षणिक है, असली पहचान मेहनत, ज्ञान, और चरित्र से बनती है। शिक्षा संस्थानों में डिजिटल साक्षरता, साइबर एथिक्स और सोशल मीडिया के खतरों पर आधारित पाठ्यक्रम लागू किए जाने चाहिएं। साथ ही, परिवार में संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा ताकि बच्चा इंटरनेट में खोने की बजाय अपनों के साथ जुड़ा रहे।

समाधान की दिशा में कदम

सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिएं, जिनमें बताया जाए कि किस प्रकार रील्स की सनक जानलेवा हो सकती है। खतरनाक रील्स पर त्वरित कार्रवाई हो, चाहे वह वीडियो बनाने वाला किशोर हो या अभिभावक, यदि बच्चों की जान को जोखिम में डाल रहा है तो उसके विरुद्ध बाल सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई की जाए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त गाइडलाइंस बनाई जाएं ताकि खतरनाक, भ्रामक या आत्मघाती रील्स को न तो प्रमोट किया जाए और न ही इन्हें मोनेटाइज किया जाए। परामर्श और काउंसलिंग सेवाओं को स्कूलों और कॉलेजों में मजबूती से लागू किया जाए ताकि युवा पीढ़ी डिजिटल संतुलन को समझ सके। बच्चों के स्क्रीन टाइम की निगरानी और पैरेंटल कंट्रोल को गंभीरता से लागू किया जाए।

बहरहाल, रील्स का संसार भले ही चकाचौंध भरा हो परंतु यह वास्तविकता नहीं है। आज आवश्यकता है इस चकाचौंध से हटकर वास्तविक जीवन के मूल्यों की ओर लौटने की। एक वायरल रील किसी की जान से बड़ी नहीं हो सकती। किसी बच्चे की मुस्कान को सोशल मीडिया की चकाचौंध में नहीं खोने देना चाहिए। रील्स की सनक ने जिस प्रकार जिंदगी का संतुलन बिगाड़ा है, उससे बाहर निकलना एक जिम्मेदार नागरिक, अभिभावक, शिक्षक, और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता के रूप में अब हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। सोशल मीडिया को ‘माध्यम’ भले ही बनाए रखें परंतु ‘मकसद’ नहीं वरना यह सनक हमें एक ऐसी खाई में ले जाएगी, जहां से लौटना शायद संभव न हो।

Topics: सोशल मीडिया का दुरुपयोगरील्स का जुनूनरील्स बनाते समय मौतसोशल मीडिया एडिक्शनरील्स बनाते हुए हादसेObsession with reelsmisuse of social media
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