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मतदाता सूची : बवाल के पीछे असल सवाल

चुनाव आयोग ने जब मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का निर्णय लिया तो विपक्षी दलों पर जैसे वज्रपात सा हो गया। दरअसल मतदाताओं के अधिकार से अधिक चिंता उन्हें अपने वोट बैंक की है

Written byअखिलेश वाजपेईअखिलेश वाजपेई
Jul 7, 2025, 03:33 pm IST
in भारत, विश्लेषण
ममता बनर्जी  एवंं असदुद्दीन ओवैसी

ममता बनर्जी  एवंं असदुद्दीन ओवैसी

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का फैसला क्या लिया, विपक्षी दलों पर मानो वज्रपात हो गया है। बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक लगभग पूरा विपक्ष इसके विरोध में मैदान में उतर आया है। ममता हों या असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस के नेता हों या राजद अथवा आम आदमी पार्टी, सभी को चुनाव आयोग के इस फैसले पर आपत्ति है। ये सभी आयोग के इस फैसले को पिछले दरवाजे से एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) अर्थात् राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लागू करने की साजिश बता रहे हैं और आयोग के फैसले को ‘गरीबों और मुसलमानों का मताधिकार छीनने का षड्यंत्र’ बता रहे हैं।

अखिलेश वाजपेई

भले ही चुनाव आयोग लगातार यह सफाई दे रहा हो कि उसके फैसले का उद्देश्य देश के सभी वयस्क और वैध नागरिकों को मताधिकार प्रदान करना एवं मतदाता सूची को अधिक से अधिक त्रुटिहीन तथा शुद्ध बनाना है, पर विपक्ष आयोग का कोई तर्क सुनने और समझने को तैयार नहीं है, जबकि यही विपक्ष बीते कई चुनाव से मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों का आरोप लगाता आ रहा है।

क्यों है आपत्ति

प्रश्न यह है कि आयोग अगर मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए कोई अभियान चलाने जा रहा है तो इस पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। यह तो आयोग का अधिकार है जो संविधान ने उसे दिया है। फिर आयोग कोई पहली बार तो मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण करने जा नहीं रहा है। यह प्रक्रिया तो संविधान में की गई व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है और लगातार होती चली आ रही है। देश की प्रमुख और सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के शासनकाल में भी कई बार ऐसा पुनरीक्षण किया जा चुका है।

फिर सवाल यह है कि देश की मतदाता सूची को क्या दुरुस्त नहीं होना चाहिए। आखिर विपक्ष को इसमें क्या अनुचित दिखाई दे रहा है, जो कोहराम मचाए है? विपक्ष के नेता बिलबिला रहे हैं। वह भी तब जब यही विपक्ष अभी कुछ दिन पहले तक देश की मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का आरोप लगा रहा था। कांग्रेस तो महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा तक में हार की वजह मतदाता सूची को ही बता रही थी। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो मतदाता सूची को दुरुस्त करने की मांग करते हुए सिर्फ बयान ही नहीं दिए बल्कि लेख तक लिख डाला था। फिर अब जब आयोग ऐसा करने जा रहा है तो इतना विरोध क्यों? इसका एक ही कारण दिखता है कि विपक्ष को अपने राजनीतिक समीकरणों में बड़े उलटफेर की आशंका।

विवाद की वजह

चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करता रहता है। चुनाव चाहे पंचायत और स्थानीय निकाय स्तर का हो या विधानसभाओं अथवा लोकसभा का या फिर किसी और संस्था का। चुनाव से पूर्व मतदाता सूची को दुरुस्त करना नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है। कभी यह संक्षिप्त होता है तो कभी विशेष, कभी आंशिक और कभी गहन।

गहन पुनरीक्षण में आयोग की तरफ से मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए नियुक्त किए गए कर्मचारी घर-घर जाकर जांच करके इसे दुरुस्त करते हैं। इस पुनरीक्षण के ज़रिए एक तरह से नई मतदाता सूची ही तैयार हो जाती है। आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वहां की मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण कराने का फैसला किया है। साथ ही आने वाले दिनों में इस प्रक्रिया को पूरे देश में लागू कर 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची तैयार करने का फैसला किया है। इसके लिए 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाया गया है क्योंकि अब से पहले 2003 में ही मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण हुआ था।

पुनरीक्षण के लिए आयोग ने यह तय किया है कि जो लोग 2003 के बाद मतदाता बने हैं, उन्हें अपना जन्म प्रमाण पत्र देना होगा। जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं होगा उन्हें यह बताना पड़ेगा कि उनके पिता का नाम 2003 या उससे पहले की मतदाता सूचियों में था। अगर उनके पिता का नाम 2003 या उससे पहले बनी मतदाता सूची में होगा तो उनका नाम मतदाता सूची में शामिल कर लिया जाएगा। पर, किसी के पिता का नाम पहले की मतदान सूची में नहीं होगा तो उसे मतदाता नहीं बनाया जाएगा। यही नहीं, अगर किसी का नाम मतदाता सूची में होगा भी लेकिन आयोग को आशंका हुई तो वह अलग से भी जांच कराएगा।

अगर जांच में कोई नागरिक अपनी नागरिकता का प्रमाण नहीं दे पाता तो उसके खिलाफ पुलिस भी जांच करेगी। अपनी नागरिकता साबित न कर पाने वालों के भारतीय नागरिकता वाले सारे दस्तावेजों को रद्द कर दिया जाएगा। साथ ही उनके देश का पता लगाकर उन्हें वापस उनके देश भेज दिया जाएगा। आयोग के इसी आदेश से विपक्ष में कोहराम मचा है। उन्हें इससे अपना सारा राजनीतिक गणित उलटफेर होता दिख रहा है।

घुसपैठ बनी बड़ा संकट

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश में बड़े पैमाने पर बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान के नागरिक घुसपैठ करके भारत में आ चुके हैं जो देश के वास्तविक नागरिकों के अधिकारों और उनके हिस्से के संसाधनों में सेंधमारी कर रहे हैं। साथ ही देश की आर्थिक व्यवस्था पर भी बोझ डाल रहे हैं। इनकी संख्या को लेकर कोई सटीक अधिकृत आंकड़ा तो नहीं मिलता लेकिन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या लगभग 6 करोड़ से ऊपर बताई जाती है।

अनुमान लगाया जा सकता है कि इसमें अगर म्यांमार से आए घुसपैठियों, रोहिंग्याओं तथा पाकिस्तान से पासपोर्ट और वीजा पर आने के बाद भारत में गुम होकर अलग-अलग राज्यों में आ बसे लोगों की संख्या जोड़ लें तो यह आंकड़ा काफी ज़्यादा बैठेगा। ऐसी शिकायतें आम हैं कि इन घुसपैठियों ने अलग-अलग राज्यों में सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत और कई राज्यों में वहां की स्थानीय सरकारों की कृपा से आधार एवं वोटर आईडी कार्ड तक बनवा लिए हैं। इनके कारण, देश के कई राज्यों और कई जिलों में बड़े पैमाने पर जनसांख्यिक उलटफेर हो गया है। हिंदू अल्पमत हो गया है और मुस्लिमों की आबादी अप्रत्याशित तरीके से बढ़ गई है, जिसके कारण कई जिलों का चरित्र ही बदल गया है।

वैसे तो कमोबेश पूरा देश ही इन घुसपैठियों के कारण या जनसांख्यिक बदलाव अथवा असंतुलन के खतरे से जूझ रहा है लेकिन पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, असम, पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों की स्थिति काफी विकट हो गई है। उत्तर प्रदेश के भी कई जिले घुसपैठियों से प्रभावित हो रहे हैं। बीते कुछ महीनों के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में इसकी पुष्टि करती हुई कई घटनाएं सामने आईं जिनमें लोग डंके की चोट पर दूसरे देश का नागरिक होने की घोषणा करते हुए भारत का मतदाता होने का दावा करते ही नजर नहीं आए बल्कि उन्होंने यह भी कहा कि वे कई चुनाव में वोट दे चुके हैं और भविष्य में देते रहेंगे।

यह स्वीकारोक्ति भी सार्वजनिक होती दिखी कि पाकिस्तान और बांग्लादेश का नागरिक होते हुए भी उनका भारत छोड़कर वापस लौटने का कोई इरादा नहीं है तो खतरे की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है। किसी दूसरे देश का नागरिक भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बने, यह बात सुनने में ही अजीब लगती है। ऐसे में यदि आयोग के किसी फैसले से इन घुसपैठियों पर अंकुश लग रहा है तो विपक्ष का उसकी तारीफ करने के बजाय विरोध करे तो कान खड़े होना और ये आशंका होना भी स्वाभाविक है कि विपक्ष कहीं वोट के लिए तो ऐसा नहीं कर रहा है।

विपक्ष में बिलबिलाहट

दरअसल देश का संविधान और कानून किसी दूसरे देश के नागरिक को भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली के अभिन्न अंग चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं देता। तो अगर ऐसे लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने और देश के वैध नागरिकों को इसमें अपना नाम शामिल करने का मौका देकर इसे दुरुस्त करने की प्रक्रिया शुरू हो रही है तो इसमें आपत्तिजनक क्या है? किसी विदेशी को देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में हस्तक्षेप का अधिकार क्यों होना चाहिए।

इन सवालों का उत्तर तलाशने के लिए राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी चुनावों के आंकड़े और देश के राजनीतिक परिदृश्य के विश्लेषण की जरूरत बताते हैं। वे कहते हैं कि देश में ज्यादातर विपक्षी दलों ने दुर्भाग्य से इन घुसपैठियों को अपनी राजनीतिक ताकत का आधार बना लिया है। आज़ाद भारत में पहली सरकार बनाने वाली कांग्रेस ने अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण का जो खेल शुरू किया था, उसे आज सिर्फ कांग्रेस ने ही नहीं बल्कि ममता बनर्जी, लालू यादव, उनके पुत्र तेजस्वी, हेमंत सोरेन, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल सहित कई अन्य राजनेताओं एवं इनकी पार्टियों ने घुसपैठियों को संरक्षण तक देकर विस्तार दे दिया है।

फर्जी तरीके से वोटर आईडी और आधार कार्ड की बदौलत ये सब भाजपा विरोधी दलों के लिए वोट जुटाने और जीत हासिल करने का आसरा बन गए हैं। विपक्ष को भय है कि आयोग ने अगर मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए इनके दस्तावेजों की बारीकी से पड़ताल की तो इनके नाम मतदाता सूची से कट जाएंगे। अगर इनके नाम कट गए तो इन्हें वोट का जबरदस्त नुकसान होगा क्योंकि तुष्टीकरण की नीति से सत्ता की मलाई खाने के आदी इन सभी को पता है कि देश में बह रही राष्ट्रवाद की बयार में भाजपा का मुकाबला करना इनके लिए आसान नहीं होगा। इनका राजनीतिक आधार कमजोर हो जाएगा।

पारदर्शी प्रक्रिया, फिर भी परेशानी

आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को भरसक पारदर्शी रखने का प्रयास किया है। उसने यह तय किया है कि इस पुनरीक्षण के लिए आयोग की तरफ से नियुक्त बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) प्रत्येक मतदाता के घर तीन बार जाएगा। तीन बार न मिलने पर ही किसी का नाम मतदाता सूची से काटा जाएगा। लोगों को मतदाता सूची में ऑनलाइन भी नाम शामिल करने का विकल्प दिया गया है। आयोग ने यह भी घोषणा की है कि काटे गए नामों और नई तैयार की गई सूची की प्रतिलिपि न सिर्फ सभी राजनीतिक दलों को दी जाएगी बल्कि उनकी आपत्तियों पर भी विस्तार से चर्चा करने के बाद ही अंतिम मतदाता सूची तैयार की जाएगी।

बावजूद इसके विपक्ष को आयोग के फैसले से कई नागरिकों का नाम मतदाता सूची से बाहर हो जाने का खतरा दिख रहा है तो प्रो. तिवारी का निष्कर्ष ही सही लगता है कि विपक्ष की बिलबिलाहट की असली वजह घुसपैठियों के मतदाता सूची से बाहर हो जाने का खतरा है। कारण, देश के मूल नागरिकों में तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके पिता का नाम 2003 या उससे पहले की मतदाता सूची में न हो।

सिवाय उनके जो 2003 के बाद अवैध तरीके से घुसपैठ कर भारत में आए हैं। ऐसे में जब पिछले कुछ चुनावों के नतीजों के यह निष्कर्ष ध्यान में आते हैं, जो भाजपा की जीत को रोकने वाले मुस्लिम प्रत्याशी को संबंधित स्थान से लगातार जीत रहे गैर मुस्लिम जनप्रतिनिधि पर वरीयता मिलने की कहानी कह रहे हों, तो यह आसानी से समझ में आने लगता है कि आयोग के फैसले से विपक्ष की परेशानी की असली वजह गरीब और पिछड़े नहीं बल्कि घुसपैठ कर देश की दिशा व दशा को प्रभावित करने का षड्यंत्र रच रहे घुसपैठियों पर कसने वाला कानून का शिकंजा है।

Topics: गैर मुस्लिम जनप्रतिनिधिराहुल गांधीरोहिंग्याघुसपैठियाचुनाव आयोगमतदाता सूचीपाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर
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