सावन माह की शुरुआत 11 जुलाई से होने वाली है और इस दिन से कांवड़ यात्रा का भी आरंभ हो जाएगा। सावन का महीना भगवान शिव का प्रिय महीना होता है और इस दौरान शिवभक्त अपने श्रद्धा और आस्था के साथ कांवड़ यात्रा पर जाते हैं। कांवड़ यात्रा में लोग गंगा नदी का पवित्र जल लेकर उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। इसे शिव की पूजा का विशेष तरीका माना जाता है।
सावन माह में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है, क्योंकि इसे भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान विशेष रूप से 23 जुलाई को शिवरात्रि के दिन, शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है। कांवड़ यात्रा में भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि जब भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हुए विष का पान किया था, तो उनका गला नीला हो गया था। उस समय उनके कंठ के प्रभाव को कम करने के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाया गया। यही कारण है कि आज भी कांवड़ यात्रा में गंगा के पवित्र जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।
कांवड़ यात्रा कई प्रकार की होती है, आइए जानते हैं-
सामान्य कांवड़ यात्रा सबसे सामान्य प्रकार की होती है, जिसमें भक्त आराम से यात्रा करते हैं। इस यात्रा में लोग अपने रथ को लेकर चलते हैं और बीच-बीच में आराम करते हुए चलते हैं। इस यात्रा में कांवड़ को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता है।
डाक कांवड़ यात्रा में भक्त बिना रुके यात्रा करते हैं, इस यात्रा में एक बार जल लेने के बाद, भक्त चलते रहते हैं और न रुकते हुए शिवलिंग तक जल अर्पित करने जाते हैं। यह यात्रा अधिक कठिन होती है, क्योंकि इसमें चलते समय कोई भी विश्राम का अवसर नहीं मिलता है।
खड़ी कांवड़ यात्रा में भक्त खड़ी कांवड़ लेकर चलते हैं। इस यात्रा में एक सहायक व्यक्ति भी भक्त के साथ होता है, जो कांवड़ को सहयोग करता है। खड़ी कांवड़ यात्रा में भक्त को विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि इसमें कांवड़ का वजन और उसे ले जाने का तरीका चुनौतीपूर्ण होता है।
दांडी कांवड़ यात्रा सबसे कठिन मानी जाती है। इसमें भक्त दंड बैठक करते हुए यात्रा करते हैं। यह यात्रा समय लेने वाली होती है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को दंड बैठक की अवस्था में लगातार लंबी दूरी तय करनी होती है। कांवड़ यात्रा में शिवभक्त अपनी आस्था और समर्पण के साथ कठिन यात्रा करते हैं और इस दौरान वे न सिर्फ भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं बल्कि अपनी साधना और तप को भी सिद्ध करते हैं।
















