जीवन में कई बार ऐसा अनुभव होता है कि हम कोई कार्य पूर्ण समर्पण और मेहनत से करते हैं, वह कार्य लगभग पूर्ण होने को होता है लेकिन अचानक रुक जाता है या असफल हो जाता है। यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है और व्यक्ति को हताशा में डाल देती है।
प्रेमानंद जी महाराज ने बताया शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि पूर्व जन्म के पाप हमें असफलता और दुख का अनुभव कराते हैं, जबकि पूर्व पुण्य कर्म सफलता और सुख का कारण बनते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में कार्य सिद्ध हों, मनोकामनाएं पूर्ण हों और हमें सुख-शांति प्राप्त हो, तो हमें अपने पाप कर्मों का क्षय करना होगा। इसका उपाय केवल एक है- तप, साधना, व्रत, भजन और तीर्थ यात्रा। भजन और तपस्या से ही पापों का नाश संभव है। जब पाप क्षीण होते हैं तो सफलता स्वतः प्राप्त होती है। यह ईश्वर का अटल नियम है। केवल इच्छा करने से या योजनाएं बनाने से कुछ नहीं होता। संसार में सब कोई इच्छा करता है, लेकिन सबकी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं। यदि पाप कर्म के साथ हम सुख की आशा करें तो वह व्यर्थ है। बिना आध्यात्मिक अभ्यास के केवल सांसारिक प्रयासों से सच्ची सफलता और आत्मशांति नहीं मिलती।
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जो व्यक्ति नियमित रूप से भजन करता है, व्रत रखता है, नियमपूर्वक साधना करता है, उसकी मनोकामनाएं स्वतः पूर्ण होती हैं। ईश्वर का नाम ही ऐसी चमत्कारी शक्ति है जो असंभव को संभव बना देता है। यदि आप न तो भजन करते हैं, न तपस्या, न व्रत, और न ही धर्म के मार्ग पर चलते हैं, फिर भी सफलता की अपेक्षा करते हैं, तो यह संभव नहीं। कामनाएं करते रहो, लेकिन जब तक अध्यात्म से नहीं जुड़ोगे, तब तक दुख, भय, चिंता और शोक तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। मृत्यु भी एक दिन इसी चिंता में डूबी हुई अवस्था में आएगी। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में धर्म और अध्यात्म को स्थान दें। संसारिक वस्तुएं- धन, पद, प्रतिष्ठा — क्षणिक हैं। वे आत्मा को स्थायी सुख नहीं दे सकतीं। आत्मशांति केवल भक्ति और भजन से मिलती है। एक गरीब व्यक्ति यदि धर्म से चलता है, तो वह प्रसन्न होता है। यह प्रसन्नता ही सच्चा सुख है। वहीं एक धनवान व्यक्ति, जो केवल वासना और भोग में डूबा है, वह सदैव अशांत और दुखी रहता है। अतः यदि आप अपने जीवन में स्थायी सफलता और सुख चाहते हैं, तो पापों के क्षय हेतु तप करो, नाम जपो, तीर्थ करो, साधना में मन लगाओ। अध्यात्म से जुड़ो। यही मार्ग है सच्ची सफलता और आत्मिक आनंद का।
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