गुप्त नवरात्र विशेष : शत्रुओं पर विजय और काल परिवर्तन की अधिष्ठात्री देवी माँ काली
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गुप्त नवरात्र विशेष : शत्रुओं पर विजय और काल परिवर्तन की अधिष्ठात्री देवी माँ काली

दश महाविद्याओं में प्रथम देवी माँ काली का स्वरूप रौद्र होते हुए भी भक्तों के लिए अभयदायक है। जानिए उनका तांत्रिक महत्व, स्वरूप, कथा और साधना विधि...

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jun 27, 2025, 04:21 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
माँ काली का रौद्र स्वरूप खड्ग, नरमुंड और त्रिशूल के साथ

प्रथम महाविद्या माँ काली - रौद्रता में करुणा का प्रतीक

नवरात्र के संबंध में यह सर्वविदित है कि कि एक वर्ष में चार संधि काल होते हैं और इसलिए क्रमशः चार नवरात्र चैत्र, आषाढ़ अश्विन और माघ महीने में मनाए जाने की विधान है। भारत में 51 शक्तिपीठों का विशेष महत्व है और इनमें से कई शक्तिपीठ जनजातियों द्वारा पूजित संरक्षित किए गए हैं। चार संधि कालों में सत्व गुण तमोगुण और रजोगुण के मध्य उचित सामंजस्य स्थापित करना ही नवरात्र का मूल आधार है। तन मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के का अनुष्ठान ही नवरात्र है।

आषाढ़ और माघ में गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं के पूजन का विधान है। माता सती को जब भगवान् शिव ने दक्ष प्रजापति के यहाँ जाने से रोका तब कुपित होकर सती ने अपने दस स्वरूपों को प्रकट किया और शिवजी सती के सामने आ खड़े हुए। उन्होंने सती से पूछा- ‘कौन हैं ये?’ सती ने बताया,‘ये मेरे दस रूप हैं। आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं, आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं। पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोडषी हैं और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।’ यही दस महाविद्या अर्थात् दस शक्ति हैं। बाद में माँ दुर्गा ने अपनी इन्हीं शक्तियां का उपयोग दैत्यों और राक्षसों का वध करने के लिए किया।

माँ काली, दस महाविद्याओं में से प्रथम देवी हैं,तथा यह माँ सती का सर्वाधिक उग्र और विराट स्वरूप है। माँ काली को काल परिवर्तन की देवी माना जाता है। सृष्टि-निर्माण के पूर्व से ही उनका काल अथवा समय पर आधिपत्य रहा है। देवी काली को भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह श्मशान में निवास करती हैं तथा शस्त्र के रूप में खड्ग एवं त्रिशूल धारण करती है।

देवी माहात्म्य(दुर्गा सप्तशती )के अनुसार, रक्तबीज नामक दैत्य का संहार करने हेतु देवी दुर्गा ने प्रथम महाविद्या का आव्हान कर काली का रुप धारण किया था। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि, भूमि पर जिस ओर भी उसकी रक्त की बूँदे गिरेंगी, उसी ओर उसका एक अन्य रूप जीवित हो उठेगा। भीषण युद्ध में समस्त प्रयत्नों के पश्चात् जब रक्तबीज को परास्त करना असंभव प्रतीत होने लगा, तब देवी दुर्गा ने काली स्वरूप धारण किया तथा भूमि पर स्पर्श होने से पूर्व ही रक्तबीज के रक्त का पान करने लगीं। परिणामस्वरुप रक्तबीज का अन्त हो गया।

देवी काली को युद्धभूमि में खड़े, अपना एक पग चित अवस्था में लेटे भगवान शिव के वक्षस्थल पर रखे हुये दर्शाया जाता है। भगवान शिव के वक्षस्थल पर पग रखने के कारण देवी की जिह्वा को अचम्भित मुद्रा में बाहर की ओर निकला दर्शाया जाता है। वह श्याम वर्ण की हैं तथा उनके मुखमण्डल पर उग्र एवं निष्ठुर भाव हैं। उन्हें चतुर्भुज रूप में दर्शाया जाता है।

देवी अपने ऊपर के एक हाथ में रक्तरंजित खड्ग लिये हुये हैं तथा उनके दूसरे हाथ में एक दैत्य का नरमुण्ड है। अन्य एक हाथ में खप्पर है, जिसमें राक्षस के मुण्ड से टपकता रक्त एकत्रित होता है। अन्तिम हाथ वरद मुद्रा में रहता है। उन्हें नग्नावस्था में गले में नरमुण्डों की माला धारण किये हुये चित्रित किया जाता है। वह कमर में कटी हुई, नर-भुजाओं की करधनी धारण करती हैं। प्रथम महाविद्या देवी काली के विविध स्वरूपों में उन्हें, ऊपरी एक हाथ को वरद मुद्रा तथा निचले एक हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये चित्रित किया गया है। उनकी रक्तवर्णी जीभ अत्यधिक लंबी है और उस से रक्त टपक रहा है।

शत्रुओं पर विजय प्राप्ति हेतु काली साधना की जाती है। काली साधना शत्रुओं को परास्त तथा उन्हें दुर्बल करने में सहायता करती है। रोग, दुष्टात्माओं, अशुभ ग्रहों, अकाल मृत्यु के भय आदि से मुक्ति तथा काव्य कलाओं में निपुणता हेतु भी काली साधना की जाती है।
प्रथम महाविद्या माँ काली मूल मन्त्र-

“ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिका,
क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥”

भगवान शिव की भांति प्रथम महाविद्या माँ काली की तीन आंखें हैं। यह स्वरुप भगवान शिव के समान ही है, ये भी भगवान शिव के समान शीघ्र प्रसन्न और क्रोधित हो जाती हैं। भगवान शिव के क्रोधित अवतार को रुद्र अवतार कहा जाता है, और मां काली भी रुद्र अवतार हैं। माँ काली का स्वभाव अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होने वाला और दुष्टों पर अविलम्ब कुपित होने वाला है।

काली महाविद्या को समय और परिवर्तन की देवी माना जाता है, मान्यता है कि ये समय से परे हैं। उनकी तीन आंखें भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमानकाल को दिखाती हैं। ब्रह्मांड में समय हमेशा गतिमान है, जिसका प्रतिनिधित्व माँ का यह रुप करता है।

प्रथम महाविद्या माँ काली का यह रौद्र स्वरुप दुष्टों, पापियों और अधर्मियों को अत्यधिक भयाक्रांत करने वाला है। इस स्वरुप से माँ का आशय है, कि जब अधर्म बहुत बढ़ जाएगा तो माँ चंडी का रुप धारण कर आततायियों का वध करेंगी।

प्रथम महाविद्या माँ काली का यह स्वरुप अपने भक्तों को अभय प्रदान करता है। माँ का एक हाथ अभय मुद्रा में है, वह अपने भक्तों के मन से भय को दूर करने और आत्म-विश्वास को बढ़ाने प्रतीक है।माँ का एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में है,इससे वह भक्तों के मन में यह विश्वास प्रकट करती हैं,कि उनका यह रौद्र रुप केवल पापियों और दुष्टों के लिए ऐंसा है, जबकि भक्तों के ऊपर उनका वरद हस्त सदैव बना रहेगा।

यह भी देखें-

Topics: प्रथम महाविद्यामहाकाली तंत्रकाली साधनाKali Mahavidyaदस महाविद्याएंMahavidya Kali Mantraकालिका मंत्रKali Worship in Navratriकाली का स्वरूपकाली देवी की पूजागुप्त नवरात्रकाली का महत्वरक्तबीज वधकाल परिवर्तनमां कालीकाली की शक्ति
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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