'हर तरफ तबाही, सूखे चावल बने सहारा' : फाल्गुनी ने बताया तेहरान का आंखों देखा हाल, जताया मोदी सरकार का आभार
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‘हर तरफ तबाही, सूखे चावल बने सहारा’ : फाल्गुनी ने बताया तेहरान का आंखों देखा हाल, जताया मोदी सरकार का आभार

तेहरान युद्ध के बीच फंसे बंगाल के पर्वतारोही फाल्गुनी देय की 'ऑपरेशन सिंधु' के जरिए भारत वापसी की साहसी कहानी, 3000 KM सड़क यात्रा के बाद मिली राहत

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 24, 2025, 09:00 pm IST
in भारत, पश्चिम बंगाल

कोलकाता (हि.स.) । तेहरान में युद्ध के हालात के बीच करीब 11 दिनों तक संघर्ष करने के बाद पश्चिम बंगाल के पर्वतारोही और कोलकाता के भूगोल प्रोफेसर फाल्गुनी देय आखिरकार कोलकाता लौट आए हैं। दिल्ली से एयर इंडिया की फ्लाइट जैसे ही सुबह लगभग आठ बजे नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरी, फाल्गुनी अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके। उनकी आंखों में राहत, डर और आभार के मिले-जुले भाव थे।

40 वर्षीय फाल्गुनी देय ने मंगलवार को इन 11 दिनों की त्रासदी को याद करते हुए बताया कि ईरान में अपने ठहराव के दौरान न केवल जान का जोखिम उठाया, बल्कि करीब तीन हजार किलोमीटर का सड़क का सफर भी तय किया। वे 13 जून को ईरान से भारत लौटने वाले थे, लेकिन तेहरान हवाई अड्डा युद्ध की वजह से बंद हो गया, जिससे वे वहीं फंस गए।

युद्ध के साए में बीता हर दिन बना चुनौती

फाल्गुनी 11 जून को तेहरान लौटे थे, जब उनका माउंट डेमावंद पर्वत की चढ़ाई का प्रयास असफल रहा। 13 जून को उनकी वापसी की फ्लाइट थी, लेकिन उसी रात तेहरान एयरपोर्ट बंद हो गया। इसके बाद उन्होंने 16 जून को सड़क मार्ग से तेहरान छोड़कर अलग-अलग सीमा चौकियों से ईरान से निकलने की कोशिश की। सबसे पहले वे 500 किलोमीटर की कठिन यात्रा कर अज़रबैजान की अस्तारा सीमा तक पहुंचे, लेकिन यहां बिना विशेष इमिग्रेशन कोड के उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं मिली।

पांच रातें उन्होंने वहीं सीमा टर्मिनल के प्रतीक्षालय में गुजारीं। होटल का खर्च वहन करने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने सड़क किनारे ढाबों में खाना खाया और कई बार सॉफ्ट ड्रिंक के साथ सूखा चावल भी खाया। बाद में उन्होंने अर्मेनिया का वीज़ा मांगा, लेकिन वह भी अस्वीकार हो गया।

आखिरकार 21 जून को उन्होंने 1600 किलोमीटर की एक और सड़क यात्रा की योजना बनाई और 20 घंटे की नॉनस्टॉप टैक्सी यात्रा के बाद माशहद शहर पहुंचे। लेकिन रास्ते में नेशाबूर नामक स्थान पर ईरानी पुलिस ने उन्हें रोक लिया। उनके सामान की तलाशी ली गई, डायरी की प्रविष्टियों का अनुवाद करवाया गया और मोबाइल ऐप्स तक की जांच की गई।

माशहद पहुंचने के बाद भारतीय दूतावास ने उन्हें होटल एहसान में ठहराया और उनके रहने-खाने का पूरा इंतजाम किया। भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए सरकार ने माशहद और आस-पास के कम-से-कम सात होटलों को बुक किया था।

‘ऑपरेशन सिंधु’ के जरिए सुरक्षित वापसी

23 जून को फाल्गुनी को दूतावास से फोन आया कि उन्हें उस रात दिल्ली के लिए रवाना किया जाएगा। लगभग आठ बजे माशहद हवाई अड्डे पर भारतीय नागरिकों को लेकर पांच बसें पहुंचीं। रात 11 बजे माहान एयर की फ्लाइट ने उड़ान भरी और अगले दिन सुबह चार बजे दिल्ली पहुंची।

दिल्ली हवाई अड्डे पर पश्चिम बंगाल सरकार के दो अधिकारी उन्हें लेने पहुंचे थे। इसके बाद वे एयर इंडिया की फ्लाइट से कोलकाता लौटे।

‘सरकार का आभार, पर पर्वतारोहण नहीं छोड़ूंगा

फाल्गुनी ने कहा, “ईरान में हर दिन मौत का साया था, लेकिन भारतीय दूतावास और सरकार की बदौलत मैं सुरक्षित घर लौट पाया। मैं इसके लिए जितना शुक्रिया कहूं, कम है।”

हालांकि इस भयानक अनुभव के बावजूद उनका पर्वतारोहण का जुनून कम नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि अक्टूबर में वे पापुआ न्यू गिनी के माउंट गिलूवे पर चढ़ाई की योजना बना रहे हैं और उसका इरादा अब भी कायम है।

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