आईआईटी गुवाहाटी की क्रांतिकारी तकनीक: 20 रुपये में 1000 लीटर फ्लोराइड मुक्त पानी
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आईआईटी गुवाहाटी की क्रांतिकारी तकनीक: 20 रुपये में 1000 लीटर फ्लोराइड मुक्त पानी

आईआईटी गुवाहाटी ने केवल 20 रुपये में 1000 लीटर फ्लोराइड और आर्सेनिक मुक्त पानी उपलब्ध कराने वाली तकनीक विकसित की है। 15 साल की जीवन अवधि और कम रखरखाव के साथ यह तकनीक ग्रामीण भारत में स्वच्छ पेयजल की समस्या का समाधान कर सकती है।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Jun 20, 2025, 08:08 am IST
inअसम
IIT Guwahati Fluoride free water

प्रतीकात्मक तस्वीर

गुवाहाटी, 19 जून (हि.स.)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने 20 रुपये में 1000 लीटर फ्लोराइड मुक्त पानी उपलब्ध कराने वाली तकनीक विकसित की है। इस तकनीक में, 1000 लीटर पानी को शुद्ध करने की लागत केवल 20 रुपये है। इस तकनीक को बहुत कम निगरानी की आवश्यकता होती है और इसका अनुमानित जीवनकाल 15 वर्ष है।

आईआईटी द्वारा यह तकनीक विशेष रूप से असम के ग्रामीण क्षेत्रों में आर्सेनिक और फ्लोराइड मुक्त पेयजल उपलब्ध कराने के लिए विकसित की गई है। यह तकनीक भारत सरकार को देश के कई अन्य राज्यों में ग्रामीण आबादी को दूषित पानी से बचाने में मदद करेगी।

फ्लोरोसिस से मिलेगा छुटकारा

चार-चरणीय उपचार प्रणाली लाखों भारतीयों को प्रभावित करने वाले गंभीर स्वास्थ्य संकट का निदान करती है, विशेष रूप से असम, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में, जहां भूजल में अत्यधिक फ्लोराइड के कारण कंकाल फ्लोरोसिस होता है। यह एक दुर्बल करने वाली स्थिति होती है, जो हड्डियों को सख्त और जोड़ों को अकड़ा देती है।

केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मिहिर कुमार पुरकाइत ने शोध दल का नेतृत्व किया, जिसने वास्तविक दुनिया की परिस्थितियों में प्रणाली का परीक्षण करने में 12 सप्ताह का समय लगाया। प्रतिष्ठित एसीएस ईएसएंडटी वाटर जर्नल में प्रकाशित उनके निष्कर्ष, दूषित पानी से 94 प्रतिशत आयरन और 89 प्रतिशत फ्लोराइड को हटाने की तकनीक की क्षमता को प्रदर्शित करता है, जिससे पानी का स्तर भारतीय सुरक्षा मानकों के भीतर आ जाता है।

शोधन प्रक्रिया वातन (हवा को किसी तरल या ठोस पदार्थ में मिलाना) से शुरू होती है, जहां एक विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया एरेटर घुले हुए आयरन को हटाने के लिए ऑक्सीजन जोड़ता है। फिर पानी एक इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन यूनिट से होकर गुजरता है, जहां एक हल्का विद्युत प्रवाह एल्युमिनियम इलेक्ट्रोड से होकर बहता है, जो दूषित पदार्थों से बंधे हुए आवेशित धातु कणों को छोड़ता है।

प्रोफेसर पुरकाइत ने बताया कि एक ताकतवर धातु एनोड, आमतौर पर एल्युमिनियम या आयरन को घोलने के लिए एक विद्युत क्षमता लागू की जाती है, जिससे घोल में सीधे कोएगुलेंट प्रजातियां उत्पन्न होती हैं। ये कोएगुलेंट निलंबित ठोस पदार्थों को एकत्र करने और घुले हुए दूषित पदार्थों को सोखने या अवक्षेपित करने में मदद करते हैं। तीसरे चरण, फ्लोक्यूलेशन और सेटलमेंट के दौरान, बंधे हुए दूषित पदार्थ बड़े गुच्छे बनाते हैं, जो एक विशेष कक्ष में बस जाते हैं। अंत में, पानी शेष अशुद्धियों को हटाने के लिए कोयला, रेत और पत्थर युक्त एक बहु परत फिल्टर से होकर गुजरता है।

15 साल तक काम करेगा ये सिस्टम

सिस्टम की वहनीयता इसकी ऊर्जा-कुशल डिजाइन और न्यूनतम रखरखाव आवश्यकताओं से उपजी है। अनुमानित 15 साल की जीवन अवधि और हर छह महीने में इलेक्ट्रोड प्रतिस्थापन की आवश्यकता के साथ, इस तकनीक को लगातार परिणाम देते हुए न्यूनतम पर्यवेक्षण की आवश्यकता होती है। राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग और काकती इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से चांगसारी, असम में एक पायलट इंस्टॉलेशन पहले ही पूरा हो चुका है, जो सिस्टम की व्यावहारिक व्यवहार्यता को प्रदर्शित करता है।

ऐसे में शोध दल सिस्टम को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने के लिए अक्षय ऊर्जा एकीकरण की खोज कर रहा है। प्रोफेसर पुरकाइत ने कहा, “हम यूनिट को संचालित करने और इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न हाइड्रोजन गैस का उपयोग करने के लिए सौर या पवन ऊर्जा के उपयोग की भी खोज कर रहे हैं।”

टीम ने मैनुअल हस्तक्षेप को और कम करने के लिए रीयल-टाइम सेंसर और स्वचालित नियंत्रण सहित स्मार्ट तकनीकों को शामिल करने की योजना बनाई है, जिससे सिस्टम दूरस्थ और कम सेवा वाले समुदायों के लिए आदर्श बन जाएगा। उनका लक्ष्य इस तकनीक को अन्य जल उपचार विधियों के साथ जोड़कर एक व्यापक विकेन्द्रीकृत जल उपचार समाधान बनाना है।

ऐसे क्षेत्रों में जहां फ्लोराइड की समस्या लंबे समय से सुरक्षित पेयजल तक पहुंच में बाधा बना हुआ है, यह सफलता उन समुदायों के लिए आशा की किरण है, जो महंगे और जटिल उपचार विकल्पों से जूझ रहे हैं। प्रभावशीलता, सामर्थ्य और सरलता के संयोजन वाली यह तकनीक भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक के संभावित समाधान के रूप में स्थापित करती है।

इस शोध में पोस्ट-डॉक्टरल एसोसिएट्स डॉ. अन्वेषन और डॉ. पियाल मंडल के साथ-साथ रिसर्च स्कॉलर मुकेश भारती शामिल थे। ये सभी आईआईटी गुवाहाटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग से हैं।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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