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तीक्ष्ण सोच और स्वत: स्फूर्त शासक थीं अहिल्याबाई : तावड़े

देहरादून में रानी अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती पर संगोष्ठी आयोजित, सीएम धामी, विनोद तावड़े और वरिष्ठ नेताओं ने किया स्मरण व योगदान पर प्रकाश।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो
May 31, 2025, 07:42 pm IST
in उत्तराखंड

देहरादून । पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर की जन्म त्रिशताब्दी वर्ष स्मृति अभियान के अंतर्गत आयोजित संगोष्ठी में मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी राष्ट्रीय महामंत्री  विनोद तावड़े प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद  महेंद्र भट्ट एवं प्रदेश महामंत्री (संगठन)  अजेय कुमार ने भाग लेते हुए उनका स्मरण किया।

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री  विनोद तावड़े ने महारानी अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती पर देहरादून के मुख्य सेवक सदन में आयोजित कार्यक्रम में पुण्यश्लोक महारानी अहिल्याबाई के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महारानी अहिल्याबाई प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थी।

अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थी। उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था। फिर भी उन्होंने जो कुछ किया, उससे आश्चर्य होता है। उनका जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के छौंड़ी गाँव में हुआ। उस समय महिलाये स्कूल नहीं जाती थीं, लेकिन अहिल्याबाई के पिता ने उन्हें लिखने -पढ़ने के लिए प्रेरित कर पढ़ाया।

महासचिव विनोद तावड़े ने अपने संबोधन में कहा कि अहिल्याबाई के पति खांडेराव होलकर 1754 के कुम्भेर युद्ध में शहीद हुए थे। 12 साल बाद उनके ससुर मल्हार राव होलकर की भी मृत्यु हो गयी। इसके एक साल बाद ही उन्हें मालवा साम्राज्य की महारानी का ताज पहनाया गया। वह हमेशा से ही अपने साम्राज्य को मुस्लिम आक्रमणकारियो से बचाने की कोशिश करती रहीं, बल्कि युद्ध के दौरान वह खुद अपनी सेना में शामिल होकर युद्ध करती थीं। रानी अहिल्याबाई ने अपने साम्राज्य महेश्वर और इंदौर में काफी मंदिरों का निर्माण भी किया था।

उन्होंने लोगों के रहने के लिए बहुत सी धर्मशालाएं भी बनवाईं। ये सभी धर्मशालाएं उन्होंने मुख्य तीर्थस्थान जैसे गुजरात के द्वारका, काशी विश्वनाथ, वाराणसी का गंगा घाट, उज्जैन, नाशिक, विष्णुपद मंदिर और बैजनाथ के आस-पास ही बनवाई। मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा तोड़े हुए मंदिरों को देखकर ही उन्होंने सोमनाथ में शिवजी का मंदिर बनवाया। जो आज भी हिन्दुओं द्वारा पूजा जाता है।

विनोद तावड़े ने कहा कि यह आयोजन भारत की विरासत की स्मृति का उत्सव मनाने तथा भारत की सांस्कृतिक एवं सामाजिक नींव को आकार देने वाले महान दूरदर्शी लोगों को याद करने और उन्हें सम्मानित करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा प्रयासों का एक हिस्सा है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में कहा कि एक बुद्धिमान, तीक्ष्ण सोच और स्वस्फूर्त शासक के तौर पर अहिल्याबाई को याद किया जाता है। हर दिन वह अपनी प्रजा से बात करती थी। उनकी समस्याएं सुनती थी। उनके कालखंड (1767-1795) में रानी अहिल्याबाई ने ऐसे कई काम किए कि लोग आज भी उनका नाम लेते हैं। अपने साम्राज्य को उन्होंने समृद्ध बनाया। उन्होंने सरकारी पैसा बेहद बुद्धिमानी से कई किले, विश्राम गृह, कुएं और सड़कें बनवाने पर खर्च किया। वह लोगों के साथ त्योहार मनाती और हिंदू मंदिरों को दान देतीं। अहिल्याबाई का मानना था कि धन, प्रजा व ईश्वर की दी हुई वह धरोहर स्वरूप निधि है, जिसकी वह मालिक नहीं बल्कि उसके प्रजाहित में उपयोग की जिम्मेदार संरक्षक हैं। उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में अहिल्याबाई ने प्रजा को दत्तक लेने का व स्वाभिमान पूर्वक जीने का अधिकार दिया। प्रजा के सुख दुख की जानकारी वे स्वयं प्रत्यक्ष रूप प्रजा से मिलकर लेतीं तथा न्याय-पूर्वक निर्णय देती थी। उनके राज्य में जाति भेद को कोई मान्यता नहीं थी व सारी प्रजा समान रूप से आदर की हकदार थीं।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा की उत्तराखंड में हमारी सरकार जनता के हितों को केंद्र में रखते हुए सभी कार्यों को कर रही है इसमें प्रमुख रूप से विद्यार्थियों के लिए नकल विरोधी कानून बनाना, उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए भू कानून बनाना, समान नागरिक सहिंता जैसे कानून बनाना, लैंड जिहाद और धर्मांतरण जैसे कानून बनाना, इसके साथ-साथ महिला सशक्तिकरण के लिए सहायता समूह में उनको सशक्त करने की दिशा में आगे बढ़ना, सरकारी नौकरियों में महिलाओं को क्षैतिज आरक्षण देना यह सब राज्य और यहां की जनता के हित में लिए गए वह निर्णय है जो आज अन्य प्रदेशों में भी सार्थक चर्चा के विषय बने हुए हैं।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने अपने संबोधन में कहा कि महारानी अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बंधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया, मार्ग बनवाए-सुधरवाए, भूखों के लिए अन्नक्षेत्र खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बनाये , मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की। उनका उत्तराखंड से भी बड़ा गहरा रिश्ता है उन्होंने अपने शासनकाल में केदारनाथ बद्रीनाथ और उत्तराखंड के तमाम विभाग में धर्मशालाएं बनाने का काम किया और गोचर जैसी नैसर्गिक सुंदर स्थल को गोचर नाम भी उन्होंने ही दिया। अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। उन्होंने कलकत्ता से बनारस तक की सड़क, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर , गया में विष्णु मन्दिर बनवाये हैं। उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और धर्म शालाएं खुलवाईं। साथ ही इंदौर को एक छोटे-से गांव से खूबसूरत शहर बनाया। मालवा में कई किले और सड़कें बनवाईं।

महेंद्र भट्ट ने कहा कि पुण्यश्लोक अहिल्याबाई भारत के लोकतंत्र, संस्कृति और नारी शक्ति की प्रतीक थीं। महिलाओं के सशक्तिकरण, कुशल प्रशासन, धर्म और न्याय की स्थापना तथा विरासतों के संरक्षण के लिए उन्होंने महती कार्य किए। मराठा साम्राज्य के मालवा प्रांत की शासिका के रूप में, उन्होंने एक ऐसे शासन की नींव रखी, जो न्याय, समृद्धि और धर्म से परिपूर्ण था।

भाजपा महामंत्री (संगठन) अजेय कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि अगर हम दुनिया के प्रमुख और प्राचीन देशों के इतिहास पर नजर डालेंगे तो हमें दिखेगा कि ऐसी बहुत कम महिलाएं हैं, जिनका उस देश के इतिहास और जनमानस पर प्रभाव रहा हो, लेकिन यह बात भारत के बारे में कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि भारत में ऐसी कई महिलाएं थीं जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर के अपनी अमिट छाप समाज पर छोड़ी है। ऐसी महिलाओं में से एक है महेश्वर (आज के मध्यप्रदेश) की महारानी पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर, जिन्हें इतिहास की किताबों में नजरअंदाज किया गया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हमने उनको अब तक वह स्थान नहीं दिया है जिनकी वे हकदार हैं। उस वक्त महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था, लेकिन मल्हारराव एक दूरदर्शी सेनानी थे, उन्होंने और उनकी पत्नी गौतमाबाई ने अहिल्याबाई पर ऐसा कोई भी बंधन नहीं लगाते हुए उनको पढ़ाया, लिखाया और एक योद्धा के रूप में उनको दुनिया के सामने लाए। इसके फलस्वरूप उन्होंने अपने पति खंडेराव का युद्धों में साथ दिया। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर को उनकी जन-केंद्रित नीतियों, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता, विशेष रूप से महिलाओं के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों के लिए याद किया जाता है। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और स्थानीय समुदाय के सामाजिक और धार्मिक जीवन में उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित किया।

अजेय कुमार जी ने कहा कि लोक कल्याण के लिए समर्पित लोकमाता का जीवन और विचार सभी के लिए चिर प्रेरणा का स्रोत हैं।
इस अवसर पर प्रदेश उपाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक  शैलेन्द्र सिंह बिष्ट गढ़वाली  , महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महासचिव  दीप्ति रावत भारद्वाज सहित समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले समाजसेवी , दायित्वधारी सहित भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारीगण एवं बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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