सनातन धर्म के अप्रतिम हस्ताक्षर : महंत अवेद्यनाथ
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सनातन धर्म के अप्रतिम हस्ताक्षर : महंत अवेद्यनाथ

ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु और राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख स्तंभ, का जीवन प्रतिकूलताओं का पर्याय रहा। बचपन में अनाथ होने से लेकर राष्ट्र संत बनने तक की उनकी प्रेरणादायक यात्रा और सनातन धर्म व संस्कृति में उनका योगदान जानें।

Written byसुनील रायसुनील राय
May 27, 2025, 12:26 pm IST
in उत्तर प्रदेश
Yogi Avaidyanath

अपने गुरू अवेद्यनाथ के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

प्रतिकूलता भी ईश्वर की कृपा होती है। यह उसके द्वारा ली जाने वाली परीक्षा है। संभव है इस प्रतिकूलता के जरिये वह आपको बहुत कुछ ऐसा देने वाला हो जिसके बारे में आपने कभी सोचा भी न हो। यह भी संभव है कि प्रतिकूलता की यह ईश्वरीय कृपा जितनी बड़ी हो उसके बदले उनसे मिलने वाला रिटर्न भी उसी अनुरूप बहुत बड़ा हो। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरू ब्रह्मकालीन महंत अवेद्यनाथ भी इसी प्रतिकूलता के पर्याय थे। उनका जीवन सनातन धर्म के लिए समर्पित था।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ के पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ का शुरुआती जीवन और बाद में राष्ट्र संत और राम मंदिर आंदोलन के नायक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा प्रतिकूलता के इस ईश्वरीय विधान का प्रमाण है। उनका जन्म  28 मई 1921 को गढ़वाल (उत्तराखंड) जिले के कांडी गांव में हुआ था। वह राय सिंह विष्ट के इकलौते पुत्र थे। उनके बचपन का नाम कृपाल सिंह विष्ट था। नाथ परंपरा में दीक्षित होने के बाद वह अवेद्यनाथ के नाम से जाने गए।

कृपाल सिंह विष्ट के बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया। कुछ और बड़े हुए तो पाल्य दादी भी नहीं रहीं। परिजनों की मृत्यु से अनाथ हुए तो मन विरक्त हो गया। फिर तो उनको साधु, संतों का साथ अच्छा लगने लगा। इस क्रम में ऋषिकेश में सन्यासियों के सत्संग से हिंदू धर्म, दर्शन, संस्कृत और संस्कृति के प्रति रुचि जगी। फिर शांति की तलाश में उन्होंने केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और कैलाश मानसरोवर की यात्रा की। वहां वापसी में हैजा होने पर साथी उनको मृत समझ आगे बढ़ गए। वह ठीक हुए तो उनका मन और विरक्त हो उठा।

इस घटना के बाद शांति के तलाश की चाहत और बढ़ी। इसी दौरान ईश्वरीय कृपा से उस समय के नाथपंथ के जानकार योगी निवृत्तिनाथ, अक्षयकुमार बनर्जी और गोरक्षपीठ के सिद्ध महंत रहे गंभीरनाथ के शिष्य योगी शांतिनाथ से उनकी भेंट (1940) हुई।  निवृत्तनाथ ने ही उनकी तबके गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ से भेंट कराई। पहली मुलाकात में ही दिग्विजयनाथ ने उनको अपना शिष्य बनने का प्रस्ताव दिया, पर कृपाल सिंह विष्ट ने इसके प्रति अनिच्छा जताई। फिर वह करांची जाकर एक सेठ के यहां रहने लगे। उस सेठ की उपेक्षा से आहत होने के बाद वे फिर शांतिनाथ से मिले और उनकी ही सलाह पर गोरक्षपीठ में आकर नाथपंथ में दीक्षित हो गए।
यह सब यूं ही हो गया? शायद नहीं। यह सब इसलिए होता गया क्योंकि उनको हिंदू समाज का नाथ बनना था। अपने उस गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की मदद करनी थी।

उन्होंने चार बार (1969, 1989, 1991 और  1996) गोरखपुर सदर संसदीय सीट से यहां के लोगों का प्रतिनिधित्व किया। अंतिम लोकसभा चुनाव को छोड़ उन्होंने सभी चुनाव हिंदू महासभा के बैनर तले लड़ा। लोकसभा के अलावा उन्होंने पांच बार (1962, 1967, 1969,1974 और 1977) में मानीराम विधानसभा का भी प्रतिनिधित्व किया था।

अवेद्यनाथ जी श्रीराम मंदिर आंदोलन के शीर्षस्थ नेताओं में शुमार रहे। 1984 से श्रीरामजन्म भूमि यज्ञ समिति के अध्यक्ष और श्रीरामजन्म भूमि न्यास समिति के आजीवन सदस्य  रहे। योग व दर्शन के मर्मज्ञ महंतजी के राजनीति में आने का मकसद हिंदू समाज की कुरीतियों को दूर करना और राम मंदिर आंदोलन को गति देना रहा। बहुसंख्यक समाज को जोड़ने के लिए सहभोजों के क्रम में उन्होंने बनारस में संतों के साथ डोमराजा के घर सहभोज किया।

Topics: Mahant Avedyanathप्रतिकूलतागोरखनाथ मंदिरनाथ परंपराgorakhnath templeAdversityहिंदू धर्मNath TraditionHinduismयोगी आदित्यनाथYogi Adityanathमहंत अवेद्यनाथराम मंदिर आंदोलनRam Mandir movement
सुनील राय
सुनील राय
ब्यूरो चीफ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश [Read more]
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