मुर्शिदाबाद हिंसा: हिंदू शरणार्थियों पर पुलिस बर्बरता, ममता सरकार पर आरोप
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मुर्शिदाबाद से मालदा तक यातना की डगर: दंगाइयों से जान बचाकर भागे तो पुलिस ने… लगे बड़े आरोप

मुर्शिदाबाद में दंगाई मुस्लिम भीड़ से जान बचाकर मालदा पहुंचे सैकड़ों हिंदू परिवारों की दर्दनाक कहानी। ममता सरकार और पुलिस पर शरणार्थियों को कैद करने, धमकाने और अमानवीय व्यवहार के गंभीर आरोप।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 20, 2025, 11:32 am IST
inपश्चिम बंगाल
दंगा पीड़ितों के हाल जानने पहुंचे राज्यपाल

दंगा पीड़ितों के हाल जानने पहुंचे राज्यपाल

कोलकाता, 20 अप्रैल (हि.स.)। मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज, धुलियान और सूती से दंगाई कट्टरपंथी इस्लामी हमलावरों से भागकर जान बचाने वाले सैकड़ों हिंदू परिवारों की कहानी सिर्फ हिंसा की नहीं, बल्कि उस दोहरी यातना की है, जो उन्होंने पहले दंगाई मुस्लिम भीड़ और फिर ममता सरकार की पुलिस से झेली। ये कहानी बंगाल के उस कड़वे सच की है, जहां शरण की तलाश में मालदा पहुंचे सैकड़ों मासूमों को एक मुस्लिम अधिकारी की निगरानी में दोबारा उन्हीं ज़ख्मों से गुजरना पड़ा, जिनसे वे जान बचाकर भागे थे।

शरण नहीं, बंधन मिला

11 अप्रैल को जुमे की नमाज के बाद वक्फ अधिनियम में संशोधन के खिलाफ प्रदर्शन की आड़ में जिस तरह मुस्लिम भीड़ ने पूरे इलाके में हमले किए, वह किसी पूर्व नियोजित हिंसा से कम नहीं था। दो दिन तक चली इस बर्बरता में घर जलाए गए, दुकानों को लूटा गया, महिलाओं को पीटा गया और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। जो जान बचाकर भागे, उन्होंने भागीरथी नदी पार की और मालदा पहुंचे। यहां परलालपुर हाई स्कूल के दरवाज़े उनके लिए स्थानीय लोगों ने खोले थे, लेकिन जल्द ही इस दरवाज़े को पुलिस ने बंद कर दिया—शाब्दिक नहीं, बल्कि मानवीय रूप से।

शिविर नहीं, डिटेंशन कैंप

जिस स्कूल को शरण स्थल माना गया, वह कुछ ही घंटों में पुलिस की कैदगाह बन गया। आरोप है कि कालियाचक के एसडीपीओ और आईपीएस अधिकारी फैसल रज़ा की निगरानी के नाम पर वहां रह रहे सैकड़ों लोगों को उनके परिवारजनों से मिलने तक नहीं दिया गया। बेटियों को मां से, पत्नियों को पति से और वृद्धों को उनके बच्चों से अलग कर दिया गया। पुलिस के जवान लगातार डरा-धमका कर उन्हें चुप रहने को मजबूर करते रहे। खाना मिला, लेकिन ऐसा जिसे देखकर भूख भी शर्म से सिर झुका ले। हिन्दुस्थान समाचार की टीम जब वहां पहुंची तो भीतर से चीखें सुनाई दीं। “हमें यहां बंद कर दिया गया है, कोई सुनने वाला नहीं,” ये शब्द सुमोना (परिवर्तित नाम) की जुबान से नहीं, उसकी आत्मा से निकले थे। उन्होंने कहा, “हम मुस्लिम दंगाइयों से किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन यहां पुलिस ने हमें फिर से कैद कर लिया।”

इसे भी पढ़ें: ‘पीड़ितों की आवाज़ सुनूंगा’ : मुर्शिदाबाद हिंसा के पीड़ितों से मिले राज्यपाल, कहा- इस कैंसर की जड़ें खत्म करनी होंगी

मीडिया को अंदर जाने से रोका

सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब मीडिया को अंदर जाने से रोका गया। आईपीएस फैसल रज़ा ने माननीय कोर्ट के आदेश का हवाला देकर कवरेज पर रोक लगाई, जबकि ऐसा कोई आदेश था ही नहीं। जब उनसे आदेश दिखाने को कहा गया तो वह धमकियों पर उतर आए। शिविरों में रह रहे तपन (परिवर्तित नाम) ने कहा, “हमने कभी नहीं सोचा था कि एक लोकतांत्रिक देश में अपने ही देश की पुलिस हमें कैद करेगी। हम तो बस जीना चाहते हैं, लेकिन क्या हिंदू होना ही हमारा गुनाह है?”

राज्यपाल, मानवाधिकार व महिला आयोग के सामने भी शरणार्थियों ने खोले राज

पुलिस की इस बर्बरता के खिलाफ कैंप में रह रहे लोगों ने शुक्रवार और शनिवार (18 और 19 अप्रैल) को तब भी गुस्सा जाहिर किया, जब उनसे मिलने के लिए राज्यपाल डॉक्टर सीवी आनंद बोस, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम पहुंची थी। लोगों ने पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और बताया कि किस तरह से उन्हें सुरक्षा के नाम पर उनके परिवार से अलग रखा गया। धमकी दी गई और जबरन घर ( मालदा से मुर्शिदाबाद) खदेड़ा गया। लोगों ने साफ-साफ यह बात कही है कि उन्हें एक तरह से कैद करके रखा गया और लगातार धमकियां मिली, जिससे यहां दंगा पीड़ितों के प्रति पुलिस की संवेदना के वजाय वर्दी में मौजूद दंगाई भीड़ के समर्थक अधिकारियों का वर्चस्व उजागर हुआ।

डीएम और एसपी ने नहीं दिए कोई जवाब 

मालदा के स्कूल में शरणार्थियों को पुलिस की ओर से इस तरह से टॉर्चर किए जाने के बारे में शिकायत और मीडिया कवरेज में मदद के लिए गुरुवार (18 अप्रैल) की शाम कई बार मालदा के एसपी प्रदीप यादव और डीएम को फोन किया गया, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। कई सीनियर अधिकारियों ने सीडीपीओ फैसल रजा का हवाला देकर बाद में फोन उठाना बंद कर दिया। हालांकि, वहां मौके पर मौजूद स्थानीय युवाओं ने मीडिया कर्मियों की काफी मदद की और कैंप में रह रहे लोगों से दूसरे रास्ते से बात करवाया, जिसकी वजह से हकीकत खुलकर सामने आई। वहां स्थानीय लोगों ने भी पुलिस के प्रति गुस्सा जाहिर किया और कहा कि पुलिस का बर्ताव देखकर वे गुस्से में हैं, लेकिन कुछ कर नहीं पा रहे हैं।

भाजपा-कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप

भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने इन शिविरों को ‘डिटेंशन कैंप’ बताते हुए कहा कि सरकार ने इन्हें संवेदनशील शरणस्थल की जगह जेलखाना बना दिया है। उन्होंने कहा, “करीब 400 लोग अपने घर छोड़कर भागे और अब उन्हें कैद कर रखा गया है। मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं को अंदर नहीं जाने दिया जा रहा।” उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस एनजीओ के दिए भोजन को भी जब्त कर स्थानीय गोदामों में भर रही है और जो मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, उनके खिलाफ झूठे मुकदमे किए जा रहे हैं। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि दंगा पीड़ितों को उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।

तृणमूल व पुलिस ने दी सफाई 

इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस के कुणाल घोष ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए भाजपा पर अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया। उधर मालदा जिला पुलिस का कहना है कि शिविर में सभी के लिए बिना रोकटोक प्रवेश वहां मौजूद लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, इसलिए प्रवेश को नियंत्रित किया गया है। साथ ही बड़ी संख्या में बाहरी लोगों की आवाजाही से स्थानीय इलाकों में डर, अफवाह और तनाव का माहौल बना है, जिससे न तो स्थानीय लोग सुरक्षित हैं और न ही विस्थापित लोग। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन महिलाओं की चीखें, बच्चों की भूख और बुजुर्गों की विवशता भी कोई साजिश है?

यह एक ऐसा मामला है जहां सरकार ने न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों को रौंदा, बल्कि इंसानियत को भी तार-तार कर दिया। सवाल ये नहीं कि कौन भागा, सवाल ये है कि वो क्यों भागा और फिर क्यों कैद किया गया। अगर राज्यपाल, महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग की मौजूदगी में भी पुलिस बर्बरता जारी है, तो फिर आम नागरिक किसके दरवाज़े जाए?

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