श्री गुरु तेग बहादुर जी : प्राण दिए पर धर्म न त्यागा
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श्री गुरु तेग बहादुर जी : प्राण दिए पर धर्म न त्यागा

श्री गुरु तेग बहादुर जी ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान तक दे दी। भीषण यातनाओं के बाद भी जब उन्होंने इस्लाम नहीं स्वीकारा तो औरंगजेब के हुक्म पर दिल्ली के चांदनी चौक में उनके सिर को धड़ से अलग कर दिया गया।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 18, 2025, 10:30 am IST
in भारत, दिल्ली
श्री गुरु तेगबहादुर जी

श्री गुरु तेगबहादुर जी

सनातन धर्म की रक्षा में गुरु तेग बहादुर जी का अमूल्य योगदान रहा है। यदि उन्होंने बलिदान नहीं दिया होता तो शायद आज सनातन धर्म का यह स्वरूप नहीं होता। उनके बलिदान ने लोगों को स्वधर्म की रक्षा के लिए प्रेरित किया। गुरु जी का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को हुआ था। पिता हरगोविंद जी एवं माता नानकी ने बच्चे का नाम त्यागमल रखा। जन्म के बाद हरगोविंद जी जब पहली बार अपने पुत्र से मिलने आए तो उनके साथ तीन अनुयायी भी थे। सभी ने मिलकर परमशक्ति से प्रार्थना की कि वे इस बालक को सदा अपने संरक्षण में रखें और इसे इतना बल प्रदान करें कि वह जालिमों का सामना कर सज्जन शक्ति की रक्षा कर सके। सिख पंथ के ‘वेदव्यास’ कहे जाने वाले भाई गुरदास जी, सेवा के पुंज बाबा बुड्ढ़ा जी और शौर्य एवं शूरवीरता के प्रतीक भाई विधी चंद जी पुरुख ने तेग बहादुर जी में साहस, चिंतनशीलता एवं विनयशीलता के गुण भरने का काम किया। गुरु तेग बहादुर साहिब ने संसार के कल्याण हेतु रची बानी को स्वयं अपने जीवन में चरितार्थ किया। 1632 ई़ में महज 11 वर्ष की आयु में त्यागमल जी वैवाहिक बंधन में बंध गए।

त्यागमल बने तेग बहादुर
अप्रैल, 1635 में करतारपुर में लड़ाई छिड़ गई। एक तरफ मुगल फौजदार पैदे खां की अगुआई में मुगल आक्रांता शाहजहां की फौज थी, तो दूसरी तरफ गुरु हरगोविंद सिंह एवं उनके अनुयायी थे। गुरु जी इस युद्ध को लेकर चिंतन कर ही रहे थे कि उनके पुत्र तेग बहादुर जिनकी आयु महज 14 वर्ष की थी, युद्ध में जाने की आज्ञा मांगने पहुंच गए। पिता की सहमति मिलते ही वे युद्ध के लिए निकल पड़े। युद्ध में 26 अप्रैल, 1635 को पैदे खां मारा गया। युद्ध में मिली जीत ने त्यागमल जी को तेग बहादुर बना दिया। इसके बाद पिता जी ने उन्हें लंबी साधना करने के लिए प्रेरित किया। 1644-1664 तक बाबा बकाला में वे 20 वर्ष तक तप में लीन रहे।

गुरुबानी विचार
30 मार्च, 1664 को तेग बहादुर जी ने नौवें गुरु के रूप में गद्दी संभाली। 22 नवंबर, 1664 को वे श्री दरबार साहिब अमृतसर के दर्शनार्थ गए और 16 जून, 1665 को आनंदपुर में ‘चक माता नानकी’ की नींव रखी। तेग बहादुर जी की बानी संपूर्ण गुरुबानी के क्रम एवं योजना के अनुसार रागों में बद्ध गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। उनकी बानी के अंतर्गत 56 सबद तथा 57 श्लोक हैं, जिन्हें भोग (पाठ समाप्ति) का श्लोक भी कहा जाता है।

औरंगजेब की अवहेलना
1658 में औरंगजेब जब बादशाह बना तो उसने बड़े-बड़े फकीरों को अपनी हुजूरी में बुलवाना शुरू कर दिया। उसने शरियत को लागू करने का फरमान सुनाया और हिंदुओं के मंदिरों एवं पाठशालाओं को तोड़ने का हुक्म दे दिया। लेकिन गुरु तेग बहादुर उसके फरमानों को मानने से इनकार करते रहे। श्री गुरु तेग बहादुर जी अक्तूबर,1666 से 1669 तक पटना के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में धर्म प्रचार करते रहे। उधर औरंगजेब के अत्याचार बढ़ते रहे।

कश्मीरी हिंदुओं की गुहार
25 मई,1675 को कश्मीरी हिंदुओं का एक दल श्री कृपाराम की अगुआई में आनंदपुर आया और तेग बहादुर जी को औरंगजेब की क्रूरता की कहानी बताकर सहायता मांगी। ठीक उस समय गोविंद राय खेलते हुए वहां आए और पिता के मुख पर चिंता देखकर उसका कारण जानना चाहा। गुरु तेग बहादुर जी ने कहा कि इन लोगों का धर्म संकट में है और कोई महान व्यक्ति ही इनके धर्म की रक्षा कर सकता है। इस पर नौ वर्ष के गोविंद राय, जो बाद में नानक परंपरा के 10वें गुरु बने, ने कहा कि आपसे बढ़कर महान दूसरा कौन हो सकता है। इस उत्तर से गुरु तेग बहादुर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कश्मीरी हिंदुओं को कहा कि आप जाकर औरंगजेब के लोगों को कह दीजिए कि अगर गुरु तेग बहादुर इस्लाम स्वीकर कर लेते हैं तो सारे हिंदू उनका अनुकरण करेंगे। यह बात आग की तरह फैलते हुए बादशाह के कानों तक पहुंची। उसके बाद गुरु तेग बहादुर को इस्लाम स्वीकार करवाने के लिए मजबूर करना औरंगजेब की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई।

आत्मनियंत्रण की पराकाष्ठा
गुरु तेग बहादुर जी को 12 जुलाई, 1675 को मलकपुर (रोपड़) से भाई मतिदास, भाई सतिदास एवं भाई दयालदास जी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। सूबा दिल्ली ने शाही काजी के सुझाव पर गुरुजी के समक्ष तीन विकल्प रखे- चमत्कार दिखाना, इस्लाम स्वीकार करना और मरने के लिए तैयार रहना। गुरुजी ने तीसरा विकल्प स्वीकार किया। इस कारण उन्हें बहुत यातनाएं दी गईं।

महान आत्मबलिदान
श्री तेग बहादुर जी को डराकर इस्लाम कबूल कराने के लिए भाई दयालदास, भाई मतिदास और भाई सतीदास को चांदनी चौक कोतवाली के निकट एक वृक्ष के नीचे लाया गया। शाही काजी ने फतवा दिया कि गुरु तेगबहादुर के तीनों साथियों को उनके सामने तड़पा-तड़पा कर मारा जाए। फतवे के अनुसार पहले भाई दयालदास को उबलते देगे में बंद करके मारा गया उसके बाद भाई मतीदास को आरे से चीरा गया और अंत में भाई सतीदास को रूई में लपेटकर जिंदा जला दिया गया। इस भयानक अमानवीय दृश्य को देखकर गुरु जी सहज भाव में बोले धन्य-सिक्खी-धन्य सिक्खी और कहा कि तीनों की शहादत ने तुर्क राज की जड़ें हिला दी हैं। यह राज अब अधिक समय तक नहीं रहेगा। इन तीनों का नाम दुनिया में हमेशा रौशन रहेगा। जब मुगल आक्रांता औरंगजेब किसी भी तरह गुरु तेगबहादुर को धर्म डिगा न सका तो उसने उन्हें मार देने का आदेश दिया। इसके बाद गुरु जी को चांदनी चौक में 11 नवंबर, 1675 को शहीद कर दिया गया।

भारत के आध्यात्मिक पुरुष गुरु तेग बहादुर जी के इस बलिदान ने मुगलों के पतन की आधारशिला रख दी थी। फलस्वरूप भारत के निरुत्साहित लोगों में सांस्कृतिक चेतना का प्रस्फुटन हुआ। उन्होंने स्व-प्रदर्शन एवं स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए कर्म मार्ग को अपनाया। आत्म बलिदान की भावना जाग उठी जिससे लोगों के मन में मुगलों का भय खत्म हो गया। गुरुजी ने आत्मसम्मान पर स्थिर रहने पर बल दिया। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी उपदेश दिया कि इसके लिए दूसरों को भयभीत करने का यत्न नहीं करना चाहिए। जन-कल्याण का अर्थ यह है कि अपने निजी लाभ अथवा स्वार्थ के प्रयत्नों को उचित सीमा में रखकर मानवता के प्रति सजग रहें। सांसारिक उन्नति एवं आध्यात्मिक जागृति के लिए निरंतर दृढ़ यत्न किए जाएं। इसी में ‘लोक सुखीए परलोक सुहेले’ का रहस्य छिपा है। भारत की राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता हेतु शीश न्योछावर करने वाले गुरु तेग बहादुर जी के प्रकाश पर्व पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

Topics: हिंद की चादरSri Guru Tegh Bahadur jiगुरु तेग बहादुर जीगुरु तेग बहादुर जी का प्रकाश पर्व
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