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…तो माफी मांग लें ‘बूढ़े और बीमार’ जावेद!

मानहानि के एक मुकदमे से बचने के लिए गीतकार जावेद अख्तर ने बुढ़ापे और बीमारी को बनाया ढाल

Written byरतन शारदारतन शारदा
Jan 15, 2025, 04:04 pm IST
in विश्लेषण
जावेद अख्तर

जावेद अख्तर

कुछ दिन पहले फिल्मी गीतकार जावेद अख्तर के विरुद्ध दर्ज मानहानि मामले के संबंध में अनेक समाचार पढ़ने को मिले। अधिकतर समाचारों में दावा किया गया था कि मानहानि के एक मामले में जावेद बरी हो गए हैं और मामला दर्ज करने वाले वकील संतोष रामस्वरूप दुबे हार गए हैं। बता दें कि कुछ समय पहले जावेद अख्तर ने अपने एक बयान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तालिबान के समान’ बताया था।

रतन शारदा
वरिष्ठ विचारक

इसी बयान को लेकर दुबे ने जावेद के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा किया था। जावेद की प्रार्थना पर न्यायालय ने एक ‘मध्यस्थता समिति’ का गठन किया। समिति के कहने पर दुबे ने अपना मुकदमा वापस ले लिया। फिर न्यायालय ने यह कह कर मामले को बंद कर दिया कि दोनों पक्षों ने ‘आपस में यह मामला समाप्त कर लिया है-सौहार्दपूर्ण ढंग से निबटारा।’ लेकिन इस निर्णय को ‘बरी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस संबंध में कुछ बातें हैं। 5 नवंबर, 2024 की मध्यस्थता बैठक में जावेद अख्तर ने कहा, ‘‘वे विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं थी जो वादी या उसके संगठन संघ की मानहानि करे।’’ (क्रमांक 3)। क्रमांक 4 में वे कहते हैं, ‘‘बढ़ती उम्र के कारण वे स्वस्थ नहीं हैं और यह वक्तव्य वादी और उनके संगठन से जुड़ा नहीं था। वे तो अफगानिस्तान की परिस्थिति समझने की बात कर रहे थे।’’

मध्यस्थता समिति की रपट 8 नवंबर, 2024 को न्यायालय में प्रस्तुत की गई। इस रपट के आधार पर न्यायालय ने जावेद को ‘मुक्त’ कर दिया। वादी स्वयं वकील था, परंतु इतना भोला था कि उसके ध्यान से शायद यह बात निकल गई कि जब जावेद ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध अपना वक्तव्य दिया था, तब भी वे ‘बूढ़े और बीमार’ थे।

स्पष्ट है कि जावेद ने अपनी वृद्धावस्था और बीमारी का हवाला देते हुए बड़ी कमजोर दलील दी। सच तो यह है कि जावेद अभी भी कई मंचों पर जाते हैं और खूब बोलते हैं। परंतु जैसे ही उन्हें न्यायालय में घसीटा गया, वे ‘कमजोर और बीमार वृद्ध’ हो गए। हम यह न भूलें कि जावेद शब्दों की ही कमाई खाते हैं। इसलिए उनके मुंह से कोई शब्द यूं ही नहीं निकलता है।

दुबे शायद यह भूल गए कि उन्होंने मुकदमे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी मानहानि की बात की थी। क्या उन्होंने जावेद के विरुद्ध मुकदमा करने से पहले संघ की राय ली थी? क्या उन्होंने सोचा कि इस प्रकार के समझौते से क्या परिणाम हो सकते हैं?

यह एक सबक है, उन वकीलों के लिए जो ऐसे मानहानि के अन्य दावे न्यायालयों में लड़ रहे हैं। वे ऐसे सितारों के समझौतों के चक्कर में तब तक न पड़ें, जब तक कि वे सार्वजनिक माफी न मांगें, या उन्हें सजा न मिले। इन दिनों मुंबई के अलग-अलग न्यायालयों में राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह, तस्लीम रहमानी, जॉन दयाल और कम्युनिस्ट नेता ए. एन. जमीर के विरुद्ध मानहानि के मामले चल रहे हैं।

इनके पक्षकार संतोष दुबे की ‘नादानी’ से कुछ शिक्षा लें और सावधानी रखें। यह भी कहना उचित लग रहा है कि संघ के प्रति घृणा रखने वाले ‘बड़े’ लोग किसी मामले मेें न्यायालय में घसीटे जाते हैं, तो वे सत्य के लिए लड़ें, कभी व्यस्तता और कभी बुढ़ापे का सहारा लेकर भागे नहीं।

अगर मानहानि के मुकदमे लड़ने की हिम्मत नहीं है, तो सार्वजनिक तौर पर माफी मांगें। तारीख पे तारीख लगवा कर न्यायालय का समय बर्बाद न करें। सबसे बड़े राजनीतिक भगोड़े अरविंद केजरीवाल में इतनी बात तो है कि वे माफी मांग लेते हैं। क्या ही अच्छा हो अगर जावेद अपने सेकुलर हमराही से कुछ तो सीखें।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघअरविंद केजरीवालArvind Kejriwalजावेद अख्तरJaved Akhtarपाञ्चजन्य विशेषराजनीतिक भगोड़ेRSSतालिबान के समानpolitical fugitivesame as Taliban
रतन शारदा
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