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दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी में द्वन्द

भाजपा की दिल्ली की राजनीति में पूरी पकड़ है। भाजपा ने पिछले तीन लोकसभा चुनाव में वहां की सभी सातों सीटों पर आसानी से जीत दर्ज़ की थी।

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Dec 12, 2024, 10:50 am IST
inविश्लेषण
Aam Aadmi party delhi election

दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की तैयारी जोरों शोरों से शुरू कर दी गई हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए आप ने अपनी दो सूची जारी कर एक बहुत ही बड़ा संकेत खुद ब खुद दिल्ली की जनता के समक्ष रख दिया है। अभी तक घोषित आप के 31 उम्मीदवारों में 16 उम्मीदवारों को बदल दिया गया है। वहीं 10 विधायकों की सीटें भी बदली गई हैं। यह कदम उठाकर आप ने खुद ही अपने विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को स्वीकार कर लिया है।

अगर हम आप के अभी तक के घोषित उम्मीदवारों को देखें तो पाते हैं कि 50% विधायकों की उम्मीदवारी समाप्त की गई है, वहीं 32 प्रतिशत की सीट बदली गई है। यानि कुल 82 प्रतिशत विधायकों पर किसी ना किसी रूप में अविश्वास दिखाया गया है।
इन विधायकों के बर्तावों के गहरे और लम्बे निहितार्थ हैं। वर्तमान में आप में सब-कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा। वर्तमान में दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी मर्लेना पर आप के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल को भरोसा नहीं रह गया है। अरविन्द केजरीवाल किसी भी वैसे विधायक को टिकट नहीं देना चाहते हैं जिन पर उनको मार्लेना के करीबी होने का शक मात्र भी है।

अरविंद केजरीवाल भी अब जीतन राम मांझी प्रकरण से आशंकित हैं। उन्हें आभास हो रहा है कि जैसे मांझी ने नितीश कुमार के साथ सत्ता बदल के लिए जोर आजमाइश किया था वैसे ही उन्हें भी न करना पड़े। आप सत्ता विरोधी लहर से इस कदर भयाक्रांत है कि उसने अपने दूसरे नंबर के नेता मनीष सिसोदिया की भी सीट बदल दी है। आप ने अपने उम्मीदवारों की दूसरी सूची की घोषणा कर दी है, जिसमें मनीष सिसोदिया को जंगपुरा से चुनाव मैदान में उतारने का ऐलान किया गया है। वहीं पार्टी में तुरंत शामिल किये गए अवध ओझा को पटपड़गंज से उम्मीदवार बनाया गया है। अवध ओझा की उम्मीदवारी यह सिद्ध करती है कि उनकी पहले उम्मीदवारी तय करके ही पार्टी में शामिल किया गया है।

दिल्ली में भी हरियाणा जैसे परिणामों से इंकार नहीं कर सकते हैं, जहाँ चुनाव पूर्व कांग्रेस पार्टी केवल अपने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा करने की सोच रही थी। कांग्रेस को पूरी उम्मीद थी की वो चुनाव जीत रही है और उसे केवल उसके बाद की तैयारी ही करनी है। दिल्ली में आप के अलावे दो पार्टियां कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी चुनावी मैदान में हैं। कांग्रेस पार्टी केवल नाम मात्र की पार्टी अब दिल्ली की राजनीति में बची है। दिल्ली वैसे प्रदेशों में है, जहाँ कांग्रेस पार्टी के एक भी विधायक नहीं हैं। ऐसे अन्य राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और नागालैंड हैं।

दिल्ली वैसा प्रदेश है, जहाँ से कांग्रेस पार्टी विगत तीन लोकसभा चुनावों 2014, 2019 और 2024 में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। यह तब हुया जब इन तीनों चुनावों से पूर्व दो लोकसभा चुनावों 2009 में कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली की सभी सातों लोकसभा की सीट जीती थी। वहीं 2004 में सात में छह सीट जीती थी। दिल्ली कांग्रेस पार्टी के गिरते प्रदर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय है। कांग्रेस पार्टी को दिल्ली में अपने बुरे हालात की पूरी खबर है। इसी कारण कांग्रेस पार्टी ने पिछले 2024 के लोकसभा चुनाव में आप के साथ गठबंधन के तहत महज 3 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा फिर भी यह गठबंधन भाजपा के आगे नतमस्तक होते हुए अपना खाता तक नहीं खोल सकी।

कांग्रेस पार्टी ने पिछले दो विधानसभा चुनाव में दिल्ली में ऐसा प्रदर्शन किया है कि इस बार उसे उम्मीदवार खोजने में भी मशकक्त करनी पड़ रही है। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने केवल 3 सीटों पर ही अपनी जमानत बचाई थी। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 66 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 63 सीटों पर जमानत खोयी थी। वहीं 2015 में कांग्रेस ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 62 सीटों पर जमानत खो दी थी। भाजपा की दिल्ली की राजनीति में पूरी पकड़ है। भाजपा ने पिछले तीन लोकसभा चुनाव में वहां की सभी सातों सीटों पर आसानी से जीत दर्ज़ की थी। 2024 में कांग्रेस पार्टी और आप में गठबंधन के बाजवूद भाजपा ने सातों सीटों पर अपना कब्ज़ा बनाये रखा। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 70 विधानसभा की सीटों में 52 सीटों, 2019 के लोकसभा चुनाव में 56 विधानसभा की सीटों, 2014 के लोकसभा चुनाव में 60 विधानसभा की सीटों पर बढ़त बनाई थी।

भाजपा दिल्ली की सत्ता में वापसी कर सकती है, इसके भरपूर संकेत और सन्देश हैं। भाजपा ने कई राज्यों में जैसे अपनी उभार को दर्शाया है और अपनी धमक दिखाई है वैसा ही दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनावों में भी कर सकती है। असम में भाजपा ने 2011 के विधानसभा चुनाव में महज 5 सीट जीती थी मगर 2016 में खुद की 60 सीटें जीतकर अपने गठबंधन के स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई थी। पूर्व में असम के विधानसभा के चुनावी इतिहास में भाजपा का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन महज 10 सीटों तक का था। हरियाणा में भाजपा ने 2014 में 47 सीटें जीतकर 90 सदस्यीय विधानसभा में खुद के बल पर सरकार बनाई। वहीं उसके पिछले 2009 के विधानसभा चुनाव में भाजपा में महज 4 सीट ही जीत सकी थी। हरियाणा के विधानसभा के चुनावी इतिहास में भाजपा का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन महज 16 सीटों तक का था।

त्रिपुरा में भाजपा का सफर भारत की राजनीति में एक अनोखा उद्धरण की तरह है। त्रिपुरा के 60 सदस्यीय विधानसभा में 2018 से पूर्व के चुनाव में भाजपा का एक भी सीट नहीं जीतने का रिकॉर्ड रहा था। 2013 तक के चुनावों में भाजपा महज एक सीट पर अपनी जमानत बचा पाने का इतिहास रहा था। मगर 2018 के विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में भाजपा ने 36 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने फिर से स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई। अतएव दिल्ली में भी हम भाजपा के इस तरह के हतप्रभ करने वाली परिणामों को नज़रअंदाज नहीं कर सकते हैं। भाजपा दिल्ली की सत्ता में वापसी करती दिख रही हैं।

Topics: दिल्ली विधानसभा चुनावDelhi Assembly ElectionsDelhiआम आदमी पार्टीAam Aadmi Partyदिल्लीचुनावElections
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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