दत्तोपंत ठेंगड़ी: महान संगठनकर्ता, विचारक और भारतीय दर्शन के सच्चे वाहक
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दत्तोपंत ठेंगड़ी: महान संगठनकर्ता, विचारक और भारतीय दर्शन के सच्चे वाहक

दत्तात्रेय बापूराव जी को ही दत्तोपंत ठेंगड़ी के नाम से जाना जाता है, वह एक बुद्धिजीवी, संगठनकर्ता, दार्शनिक, विचारक और उत्कृष्ट वक्ता थे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 6, 2024, 04:51 pm IST
inभारत
समाज सुधारक दत्तोपंत ठेंगड़ी

समाज सुधारक दत्तोपंत ठेंगड़ी

दत्तात्रेय बापूराव जी को ही दत्तोपंत ठेंगड़ी के नाम से जाना जाता है, वह एक बुद्धिजीवी, संगठनकर्ता, दार्शनिक, विचारक और उत्कृष्ट वक्ता थे। उनका जन्म हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक अमावस्या विक्रम संवत १९७७ अर्थात ग्रेगोरियन कैलेंडर के 10 नवंबर, 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के अरवी ग्राम में हुआ था। उनकी माता का नाम श्रीमती जानकी देवी और पिता का नाम श्री बापूराव ठेंगड़ी था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा आर्वी (वर्धा) और उच्चतर शिक्षा नागपुर से हुई जहां से उन्होंने बीए, एलएलबी की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में पूर्ण की। ठेंगड़ीजी बाल्यकाल से ही सामाजिक गतिविधियों से जुड़ गए थे।

आयु के 12 वे वर्ष में महात्मा गाँधी जी के अहिंसा आंदोलन में शामिल हुए। वह आर्वी वानर सेना तालुका समिति के अध्यक्ष रहे। नगरपालिका हाईस्कूल आर्वी विद्यार्थी संघ के अध्यक्ष रहे, नगरपालिका हाईस्कूल विद्यालय के गरीब छात्र फण्ड समिति (1935-36) के सचिव रहे तथा आर्वी गोवारी झुग्गी झोपड़ी मंडल के संगठक रहे। वर्ष 1936 में श्री बापूराव पालघीकर जी के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े।

यह वही समय था, जब उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से हुआ और इस भेंट ने ठेंगड़ी जी के मन में संघ तत्व का बीजारोपण किया। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और 1936-38 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के सदस्य रहे। वह संघ के दूसरे सरसंघसंचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय और बाबा साहेब अंबेडकर से प्रभावित थे। ठेंगड़ी जी 1942 में प्रचारक के रूप में संघ से जुड़े। उन्होंने 1942-44 के बीच केरल, 1945-47 में बंगाल और 1948-49 में असम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक के रूप में काम किया।

यह वही समय था, जब उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से हुआ और इस भेंट ने ठेंगड़ी जी के मन में संघ तत्व का बीजारोपण किया। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और 1936-38 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के सदस्य रहे। वह संघ के दूसरे सरसंघसंचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय और बाबा साहेब अंबेडकर से प्रभावित थे। ठेंगड़ी जी 1942 में प्रचारक के रूप में संघ से जुड़े। उन्होंने 1942-44 के बीच केरल, 1945-47 में बंगाल और 1948-49 में असम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक के रूप में काम किया।

वह हमेशा समग्रता में विश्वास करते थे और राजनीतिक छुआछूत के विचार का खंडन करते थे। उन्होंने हिंदू धर्म और भारतीय दर्शन के मूल दर्शन को एक साथ बनाए रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों के कई संगठनों के लिए विचार पथ का निर्माण किया।

वह 1964-76 के दौरान दो कार्यकाल तक राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने मोरारजी देसाई की सरकार में कोई पद स्वीकार नहीं किया। बाद में उन्होंने पद्मविभूषण स्वीकार करने से भी मना कर दिया था।

ठेंगड़ी जी ने दर्जनों पुस्तकें लिखी जिसमें ‘एकात्म मानवदर्शन’, ‘हिन्दू राष्ट्र चिन्तन’, ‘कार्यकर्ता’, ‘देशप्रेम की अभिव्यक्ति स्वदेशी’, ‘संकेतरेखा’, ‘’अर्थ या अनर्थ’, ‘आत्म-विलोपी आबाजी’, ‘आदर्श आत्मविलोपी मोरोपंत पिंगले’, ‘आपात स्थिति और बीएमएस’, ‘एकात्मता के पुजारी डा. बाबा साहेब अंबेडकर’, ‘दीनदयाल उपाध्याय व्यक्ति और विचार’, ‘भारतीय किसान संघ’, ‘कम्युनिज्म अपनी ही कसौटी पर’, ‘पश्चिमीकरण के बिना आधुनिकीकरण’ आदि प्रमुख हैं।

वह अपने निजी अनुभव से अंबेडकर के व्यक्तित्व को सच्चे प्रकाश में प्रस्तुत करने के लिए बहुत उत्सुक थे। 14 अक्टूबर 2004 को मस्तिष्क आघात से निधन से पहले “डॉ अंबेडकर” उनकी अंतिम पुस्तक थी जिसे उन्होंने जुलाई 2004 में पूरा किया था।

उनकी प्रसिद्ध टिप्पणियां

“हम इस विचार को नहीं मानते हैं कि पश्चिमी प्रतिमान प्रगति और विकास का सार्वभौमिक मॉडल है, हमें नहीं लगता कि आधुनिकीकरण का मतलब पाश्चात्यीकरण है।“

“कार्यकर्ता, दुनिया को एकजुट करें।“

“रोजगार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।“

“उद्योग का श्रमीकरण करो, राष्ट्र का औद्योगीकरण करो, श्रम का राष्ट्रीयकरण करो।“

“लाल गुलामी छोड़ कर, बोलो वंदेमातरम”

“राजनेता, अगले चुनाव के बारे में सोचता है, राज प्रशासक अगली पीढ़ी के बारे में और राष्ट्र निर्माता कई भावी पीढ़ियों के बारे में सोचता है। एक राष्ट्र निर्माता के लिए विवशता जैसी कोई भी वस्तु नहीं होती है। वह समझौता नहीं करता है, सिद्धांतों को समझौतों की वेदी पर नहीं मारता है, वह कठिन रास्ता चुनता है।“

“ज्ञान और सत्य चरित्र में सार्वभौमिक हैं। सत्य कोई वर्ग, जाति या राष्ट्र नहीं जानता है। हम सभी लोगों से ज्ञान को आत्मसात करने के पक्ष में हैं। लेकिन हमें अपनी पिछली परंपराओं और वर्तमान आवश्यकताओं के आलोक में इसकी छानबीन करनी चाहिए और फिर यह तय करना चाहिए कि इसे कितना अपनाया जाना चाहिए, कितना अपनाया जा चुका है, कितना अस्वीकार किया गया है अथवा करना चाहिए।“

“तथाकथित उन्नत देशों की अंधी नकल का कोई फायदा नहीं होगा। गुरु देव टैगोर का मानना था कि भगवान ने अलग-अलग देशों को अलग-अलग प्रश्नपत्र दिए हैं।“

“जिन तथ्यों और आंकड़ों पर मार्क्स ने काम किया वह अपर्याप्त थे, उनकी जानकारी त्रुटिपूर्ण, उनके दृष्टिकोण अवैज्ञानिक, उनके निष्कर्ष गलत, उनकी भविष्यवाणियां असत्य, और उनके सिद्धांत तर्कसंगत नहीं थे। मार्क्सवाद न्यूटन के विज्ञान, डार्विन के विकासवाद और हेगेल के द्वंद्व वाद पर उगा एक बौद्धिक परजीवी फफूंद है…। जो लोग मार्क्सवाद की तुलना हिंदू धर्म से करने की कोशिश करते हैं, वे दोनों के बारे में अपनी अज्ञानता को नकारने की गलती करते हैं।“

“कट्टर मुसलमानों का दावा है कि इस्लाम किसी भी तरह की राष्ट्र पूजा की अनुमति नहीं देता है और मुसलमानों को राष्ट्रवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन तथाकथित मुस्लिम देशों में राष्ट्रवादियों ने इस बुराई का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। इस्लाम के मूल सिद्धांत देशभक्ति की भावना के साथ पर्याप्त रूप से समन्वित हैं।“

“हिंदू कानून पूरी मानव जाति को गले लगा सकता है मात्र उन लोगों के अपवाद के साथ जो स्वयं को इस लाभ को लेने से इनकार करते हैं।“

 

 

 

 

 

 

 

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