अपरिमित नारी शक्ति का प्रतीक हैं रानी दुर्गावती, इतिहासकारों ने गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग को छोटा करके दिखाया
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अपरिमित नारी शक्ति का प्रतीक हैं रानी दुर्गावती, इतिहासकारों ने गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग को छोटा करके दिखाया

सोलहवीं शताब्दी के इतिहास के पन्नों को पलटने पर भारत की एक ऐंसी वीरांगना का नाम उभरता है,जो तुलनात्मक दृष्टि से विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना होने का दर्जा प्राप्त करती हैं। उन्हें भारतीय इतिहास में राजमाता वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जाना जाता है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Sep 22, 2024, 07:25 pm IST
inभारत

विश्व की श्रेष्ठ वीरांगनाओं और नारी शक्ति के आदर्श प्रतिमानों के आलोक में सोलहवीं शताब्दी के इतिहास के पन्नों को पलटने पर भारत की एक ऐंसी वीरांगना का नाम उभरता है,जो तुलनात्मक दृष्टि से विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना होने का दर्जा प्राप्त करती हैं। उन्हें भारतीय इतिहास में राजमाता वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जाना जाता है। रानी दुर्गावती का गौरवशाली इतिहास बुंदेलखंड के कालिंजर से प्रारम्भ होकर,गढ़ा कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग तक पहुंचता है। रानी दुर्गावती 16 वर्ष तक गढ़ा कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य की साम्राज्ञी रहीं। एतदर्थ वीरांगना रानी दुर्गावती के इतिहास के पृष्ठ गोंडवाना से खोलते हैं।

भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी के महान् कलचुरि वंश का 13 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवसान हो गया था। फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियां इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लिए लालायित हो रही थीं। अंततः इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादोंराय (यदुराय) ने, तिलवाराघाट निवासी एक महान् ब्राह्मण सन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से, त्रिपुरी क्षेत्रांतर्गत, गढ़ा-कटंगा क्षेत्र में गोंड वंश की नींव रखी।(यह उपाख्यान आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य की याद दिलाता है) कालांतर में यह साम्राज्य महान् गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।गोंडवाना साम्राज्य का चरमोत्कर्ष का प्रारंभ 48वीं पीढ़ी के महानायक राजा संग्रामशाह (अमानदास) के समय हुआ और इनकी पुत्रवधू वीरांगना रानी दुर्गावती का समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है।

रानी दुर्गावती के इतिहास से छल और उसका पटाक्षेप

भारतीय इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना साम्राज्य के महान् इतिहास को एक छोटी सी कहानी बना डाला और पटाक्षेप कर दिया। रानी दुर्गावती का साम्राज्य लगभग इंग्लैंड के बराबर था। 16 वर्ष का शासन काल था, पूरे भारत में एकमात्र राज्य जहाँ कर, सोने के सिक्के एवं हाथियों तक में चुकाया गया था। जिसके चरित्र,शौर्य, पराक्रम, प्रबंधन और देशभक्ति के सामने आस्ट्रिया की मारिया थेरेसा रुस की कैथरीन द्वितीय और इंग्लैंड की एलिजाबेथ प्रथम, रजिया बेग़म और नूरजहाँ,कहीं नहीं लगतीं। (केवल जोन आव आर्क को छोड़ दिया जाए वह भी युद्ध कला में)मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना के इतिहास को गौण स्वरुप प्रदान करते हुए छिन्न – भिन्न रुप में प्रस्तुत कर,छल किया है। इसलिए अब शोधपूर्ण वास्तविक इतिहास लिखा जाना अनिवार्य है ताकि रानी दुर्गावती और गोंडवाना साम्राज्य साम्राज्य के इतिहास के साथ न्याय हो और वर्तमान पीढ़ी और भावी पीढ़ी में गर्व और गौरव की अनुभूति हो तथा राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हो।

 

Topics: वीरांगना रानी दुर्गावतीRani Durgavatirani Durgavati fortRani Durgavati lifeRani Durgavati historyRani Durgavati of Gondwana
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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