हिन्दी साहित्याकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र थे भारतेंदु हरिश्चंद्र
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हिन्दी साहित्याकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र थे भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र जयंती (9 सितम्बर) पर विशेष : भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक भारत के महान हिंदी लेखकों में से एक हैं

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Sep 9, 2024, 07:16 am IST
inभारत, शिक्षा

आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी रंगमंच के भी जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक भारत के महान हिंदी लेखकों में से एक माने जाते हैं। 9 सितबर 1850 को वाराणसी के चौखंभा मोहल्ले में जन्मे हरिश्चंद्र ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के विकास के लिए समर्पित कर दिया था और उनके इसी महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान के कारण ही 1857 से 1900 तक के काल को ‘भारतेंदु युग’ के नाम से जाना जाता है। आज की हिंदी उन्हीं की ही देन मानी जाती है, इसीलिए उन्हें ‘आधुनिक हिंदी का जनक’ भी माना जाता है।

दरअसल उनके समय में राजकाज और संभ्रांत वर्ग की भाषा फारसी ही हुआ करती थी और साथ ही ब्रिटिश शासन के चलते अंग्रेजी का वर्चस्व भी लगातार बढ़ता जा रहा था। शासन तंत्र से संबंधित सभी कार्य अंग्रेजी में ही होते थे और ब्रिटिश आधिपत्य में अधिकांश भारतीयों में भी विदेशी सभ्यता के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था, लोग अंग्रेजी समझना, पढ़ना और बोलना गौरव की बात समझते थे। हमारी  के साथ किए जा रहे खिलवाड़ के ही कारण लोगों में हिंदी के प्रति आकर्षण कम हो रहा था, जिसका हमारे हिंदी साहिगौरवशाली भारतीय संस्कृतित्य पर भी बुरा असर पड़ रहा था। साहित्य में भी ब्रजभाषा का ही बोलबाला था और फारसी के प्रभाव वाली उर्दू भी चलन में आ गई थी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ऐसे विकट समय में लोकभाषाओं और फारसी से मुक्त उर्दू के आधार पर खड़ी बोली का विकास किया। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु सही मायनों में हिंदी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। काव्य-प्रतिभा उन्हें अपने पिता बाबू गोपाल चंद्र से विरासत में मिली थी, जो स्वयं भी एक कवि थे। जब हरिश्चंद्र केवल पांच वर्ष के थे, तभी उनकी माता का देहांत हो गया था और दस वर्ष की आयु होते-होते पिता भी स्वर्ग सिधार गए लेकिन विलक्षण प्रतिभा के धनी भारतेंदु ने अपनी विकट परिस्थितियों को स्वयं पर होने देने के बजाय इनसे गंभीर प्रेरणा ली और अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल विदेशी हुकूमत का पर्दाफाश किया बल्कि हिंदी साहित्य में भी अविस्मरणीय योगदान दिया। उनका सबसे बड़ा योगदान नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में रहा। उन्होंने पारसी और पश्चिमी थिएटर के प्रभाव से दूर हिंदी रंगमंच की स्थापना की। 1867 में उनके नाटक लेखन की शुरुआत बांग्ला के ‘विद्यासुंदर’ नामक नाटक के अनुवाद के साथ हुई।

भारतेंदु को हिंदी का पहला मौलिक नाट्य चिंतक भी माना जाता है, जिन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 17 मौलिक और अनूदित नाटकों की रचना की। दरअसल उनसे पहले के नाटक धार्मिक और भावुकता प्रधान ही होते थे जबकि भारतेंदु ने पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक नाटक लिखे, जिनके माध्यम से उन्होंने तार्किक चिंतन विकसित करने का प्रयास गंभीर प्रयास किया। भारतेंदु की भाषा बड़ी परिष्कृत और प्रवाह से भरी थी और वह हमेशा भाषा की शुद्धता के पक्ष में रहते थे। अपने चर्चित नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में भारतेंदु ने ब्रिटिश शासन की जितनी तीखी आलोचना की, उतनी ही तीखी आलोचना भारत की जनता की भी की थी। उसमें एक ओर ब्रिटिश शासन तथा शोषण के दृश्य हैं तो दूसरी ओर भारत की जनता के आलस्य, अंधविश्वास, भाग्यवाद और जातिवाद की तस्वीरें भी हैं। उन्होंने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण के बारे में काफी कुछ लिखा।

स्वतंत्रता प्रेमी, प्रगतिशील विचारक, युगचिंतक, दूरदर्शी, विभिन्न विधाओं के प्रणेता साहित्यकार और लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने महज पांच वर्ष की आयु में ही रचनाएं करने की शुरूआत कर दी थी। उनमें कवि, लेखक एवं नाटककार बनने की अद्भुत प्रतिभा थी। वे विविध भाषाओं में रचनाएं लिखा करते थे लेकिन ब्रजभाषा पर उनका असाधारण अधिकार था। ब्रजभाषा में उन्होंने अद्भुत श्रृंगारिकता का परिचय दिया। अपने उच्च कोटि के लेखन कार्य के माध्यम से वे दूर-दूर तक जाने जाते थे। उनकी मित्र मंडली में पं. बालकृष्ण भट्ट, पं. प्रताप नारायण मिश्र, पं. बद्रीनारायण उपाध्याय आदि बड़े-बड़े लेखक, कवि एवं विचारक थे, जिनकी बातों से वे प्रभावित थे। भारतेंदु एक श्रेष्ठ पत्रकार भी रहे।

उन्होंने 18 वर्ष की आयु में ‘कविवचनसुधा’ नामक एक पत्रिका की शुरूआत की, जिसमें उस दौर के बड़े-बड़े रचनाकारों की रचनाएं छपा करती थी। केवल 20 वर्ष की उम्र में ही वे ऑनरेरी मजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। ‘कविवचनसुधा’ के अलावा उन्होंने 1873 में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ तथा 1874 में नारी शिक्षा के लिए ‘बाला बोधिनी’ नामक पत्रिकाएं भी निकाली। इन्हीं पत्रिकाओं के जरिये उन्होंने लोगों में देशप्रेम की भावना जगाने का अथक प्रयास किया। अपनी पत्रिकाओं के लिए उन्होंने स्वयं अनेक निबंध, आलोचना और रिपोर्ताज लिखे और इन सभी विधाओं को उनके साथियों ने भी समृद्ध किया। उनकी विद्वता से प्रभावित होकर और साहित्य व पत्रकारिता में दिए जा रहे उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए ही काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें ‘भारतेंदु’ की उपाधि से नवाजा था।

भारतेंदु ने अपने जीवनकाल में कुल 21 काव्य ग्रंथ, 38 प्रबंध काव्य और अनेक मुक्तकों की रचना की। गद्य वे खड़ी बोली में लिखा करते थे जबकि उनकी कविताएं ब्रज भाषा में हुआ करती थी। भारतेंदु के प्रमुख नाटकों में वैदिक हिंसा हिंसा न भवति, भारत दुर्दशा, साहित्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी, अंधेर नगरी, सत्य हरिश्चंद्र, चंद्रावली, प्रेम योगिनी, धनंजय विजय व मुद्राराक्षस आदि शामिल हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में भक्तसर्वस्व, प्रेममालिका, प्रेम माधुरी, प्रेम तरंग, उत्तरार्ध भक्तमाल, प्रेम प्रलाप, होली, मधुमुकुल, राग संग्रह, वर्षा विनोद, विनय प्रेम पचासा, फूलों का गुच्छा, प्रेम फुलवारी, कृष्णचरित्र, दानलीला, तन्मय लीला, नए जमाने की मुकरी, सुमनांजलि, बंदर सभा (हास्य व्यंग्य), बकरी विलाप (हास्य व्यंग्य) प्रमुख हैं। ‘सुलोचना’ उनका प्रमुख आख्यान है जबकि ‘बादशाह दर्पण’ इतिहास की जानकारी प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। भारतेंदु का अधिकांश साहित्य प्रेममय था, प्रेम को लेकर ही उन्होंने अपने ‘सप्त संग्रह’ (प्रेम फुलवारी, प्रेम प्रलाप, प्रेमाश्रु वर्णन, प्रेम मालिका, प्रेम तरंग, प्रेम सरोवर और प्रेम माधुरी) प्रकाशित किए। ‘प्रेम माधुरी’ को उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना माना जाता है।

हालांकि भारतेंदु हरिश्चंद्र के पास विपुल धनराशि थी, जिसे अपनी उदार प्रवृत्ति के कारण उन्होंने विविध संस्थाओं और साहित्यकारों की सहायता के लिए जीवनभर खुले हाथों से दान किया। मां सरस्वती की साधना में उन्होंने पानी की तरह धन बहाते हुए साहित्य को समृद्ध किया लेकिन उनके स्वयं के जीवन का अंतिम दौर आर्थिक तंगी में ही गुजरा क्योंकि अपने धन का बहुत बड़ा भाग उन्होंने साहित्य और समाज की सेवा में लगा दिया था। हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाते हुए केवल 34 वर्ष की छोटी सी आयु में ही भारतेंदु हरिश्चंद्र 6 जनवरी 1885 को दुनिया को अलविदा कह गए।

पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में हिन्दी भाषा में मौलिक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्हीं के नाम से 1983 में भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार’ की शुरुआत की गई। भारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दी साहित्य के आकाश के ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र थे, जो महज 34 वर्ष के अपने छोटे से जीवनकाल में ही 72 ग्रंथों की रचना कर आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध साहित्य की बेशकीमती पूंजी सौंप गए। हिन्दी साहित्य में दिया गया उनका योगदान युगों-युगों तक सराहा जाता रहेगा और उनकी कृतियां हिंदी भाषा में उनके अविस्मरणीय योगदान को सदैव स्मरण कराती रहेंगी।
(लेखक 34 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Topics: पाञ्चजन्य विशेषबाला बोधिनीहरिश्चंद्रकविवचनसुधाआधुनिक हिंदी साहित्यModern Hindi Literatureभारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दी साहित्य
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