श्री गुरु ग्रंथ साहिब प्रकाश पर्व : गुरु नानक देव के समय सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति
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श्री गुरु ग्रंथ साहिब प्रकाश पर्व : गुरु नानक देव के समय सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 4, 2024, 04:05 pm IST
in धर्म-संस्कृति
अध्यात्म वाणी से लोगों में आत्म एवं परमात्मा के प्रति

अध्यात्म वाणी से लोगों में आत्म एवं परमात्मा के प्रति

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक जी देव का जन्म सन् 1469 में तलवंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ। आज यह स्थान ‘ननकाना साहिब’ के नाम से प्रसिद्ध है। नानक जी के पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता था। उनकी एक बहन थीं, जिनका नाम नानकी था। ध्रुव और प्रह्लाद की तरह नानक जी भी बचपन से ही परमात्मा की भक्ति में लीन रहने लगे। सांसारिक पदार्थ और कर्मकांड उन्हें बिलकुल न भाते। गुरु नानक के समय मुगलों का शासन था, इन मुस्लिम आक्रांताओं से समाज त्रस्त था। उस समय की भारत की सामाजिक और राजनीतिक जो दशा मुगलों के कारण थी उसका उल्लेख भी गुरु ग्रन्थ साहिब में मिलता है। जब गुरु नानक जी का जन्म हुआ, उत्तर भारत का शासक बहलोल लोदी था। उसके उत्तराधिकारी का नाम सिकन्दर लोदी था। इसके बाद इब्राहीम लोदी शासक बना। गुरु नानक जी के समय में बाबर ने मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी, तथा बाद में उन्हीं के समय में बाबर के बाद उसका पुत्र हुमायुँ उसका उत्तराधिकारी हुआ।

दसवीं शताब्दी के साथ ही मध्य एशिया से मुसलमान आक्रान्ताओं के लगातार आक्रमण होने लगे। दिल्ली का मुख्य मार्ग पंजाब से गुज़रता था, इसलिए इसी प्रांत के लोगों को सबसे अधिक कष्ट भोगने पड़े। अफ़ग़ानों तथा तुर्क़ों ने अपने राज्य कायम किये, तथा विभिन्न मुस्लिम देशों ने उत्तरी भारत पर राज्य किया।

विदेशी शासकों तथा उनके विदेशी प्रतिनिधियों ने सैन्यबल के आधार पर शासन किया। उन्होंने जनता का शोषण किया और अनगिनत अत्याचार किये, गैर-मुसलमानों पर जजिया नामक व्यक्तिगत टैक्स लगाया, यूं भी उन पर भारी कर लगाये। सिवाय छोटे पदों के बाकि सारे ऊँचे पदों पर हिन्दुओं की नियुक्ति के मार्ग बन्द थे। हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त कर बड़ी संख्या में मस्जिदों का निर्माण हो रहा था। हिन्दू विद्यालयों को बन्द किया जा रहा था, और हिन्दू सभ्यता तथा संस्कृति को नष्ट’ करने का हर उपाय किया जा रहा था।

● ‘द जेयूईस्ट्स एण्ड द ग्रेट मुगल्स’ नामक अपनी पुस्तक में सर एडवर्ड मैक्लागन लिखते हैं (पृष्ठ 28) कि “किनारे से फ़तेहपुर (आगरा) तक की सारी यात्रा के दोरान पादरियों ने पाया कि मुसलमानों ने हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर डाला है। पश्चिम तथा पश्चिमोत्तर इलाक़ों में तो स्थिति ओर भी खराब थी”।

● तलवार के ज़ोर पर बहुत-से हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया, तथा जनता के विश्वास को तोड़ा गया । शासकों और शासित के बीच खाई थी, तथा हिन्दू और मुसलमान आबादियों में भी भेद होता था, यहाँ तक कि हिन्दू संतों को सभी तरह के अपमान सहने पड़ते थे।

● धर्मनिन्दा कानून को बड़ी सख्ती से लागू किया गया तथा इस्लाम की आलोचना के लिए प्राणदंड मिलता। बोधन ब्राह्मण को सिकंदर लोदी ने इसलिए प्राणदंड दिया कि उसने कहा था कि जैसा इस्लाम है वैसा ही हिन्दू धर्म भी है। हिन्दुओं का धर्म-परिवर्तन हर समय होता रहता था, लेकिन विशेष अवसरों पर तथा देश के कुछ भागों में तो सामूहिक रुप से धर्म -परिवर्तन कराया जाता था ।

● जैसा कि प्रो० आर्नेल्ड ट्यानवी ने “द सैकरेड राइटिंग्स ऑफ़ द सिम्स (यूनेस्को प्रकाशन, पृष्ठ १०) में कहा है– “हिन्दू धर्म तथा इस्लाम का मुख्य मिलन स्थल भारत है, जहाँ इस्लाम ने हिन्दू धर्म पर हिंसात्मक प्रहार किये हैं। कुल मिलाक़र, भारतीय भूमि में इन दो महान धर्मों का पारस्परिक सम्बन्ध संशय तथा शन्नुता की एक दुःखद कहानी है ।”

● सिकन्दर लोदी के गद्दी पर बैठने के समय गुरु नानक जी 20 वर्ष के थे। शाहज़ादा के रूप में भी सिकन्दर एक धर्मान्ध मुसलमान था। उसने उन सभी हिन्दुओं को मार देना चाहा जो थानेश्वर के पवित्र तालाब में स्नान के लिए इकट्ठे हुए थे। ‘तारीखे दाऊदी’ का लेखक अब्दुल्ला, सिकन्दर लोदी की प्रशंसा में लिखता है “वह इतना पक्का मुसलमान था कि उसने काफ़िरों के विभिन्न स्थानों को सम्पूर्णतया नष्ट कर दिया, और उनकी कोई निशानी न छोड़ी। उसने मूर्ति-पूजा के प्रमुख स्थल मथुरा के मठों को नष्ट कर दिया, तथा उपासना के मुख्य स्थानों को कारवाँ सरायों तथा मकतवों में बदल दिया। पत्थर की प्रतिमाओं से बूचड़ गोश्त तोलने का काम निकालने लगे, तथा सभी हिन्दुओं को सख्त मनाही की गई कि वे सिर या दाढ़ी न मुंडायें तथा आचमन-स्नान आदि न करें। इस तरह उसने मृर्तिपूजा संबंधी सारे रस्मों का ख़ात्मा कर दिया, किसी भी हिन्दू को, यदि वह दाढ़ी या सर मुंडाना चाहता, नाई नहीं मिलते। इस प्रकार हर नगर, जैसा वह चाहता था, इस्लाम के रिवाजों का पालन करने लगा ।” नागरकोट तथा ज्वालामुखी की प्रसिद्ध मूर्तियाँ टुकड़े-टुकड़े कर बूचड़ों में बाँट दी गई।

● बलदेव जी अपनी पुस्तक ‘भारत के महान संत’ में लिखते हैं –“ सिख धर्म एवं विचारधारा के संस्थापक सिखों के प्रथम गुरु नानक जी देवजी का जन्मदिन प्रति वर्ष बड़ी धूमधाम एवं श्रद्धपूर्वक मनाया जाता है । बचपन से ही उनकी प्रवृत्ति धर्म- अध्यात्म की थी । उनका काल ( 1469- 1539) बड़ा उथल- पुथल से भरा एवं हर प्रकार की अव्यवस्था, उत्पीड़न, असमता एवं अन्याय से पूर्ण था । मुगल बादशाह बाबर के राज की स्थापना भी उन्हीं के समय में हुई, जिसका प्रत्यक्ष कटु अनुभव गुरु नानक जी को यातनाएँ सहकर हो चुका था । राजनीतिक अराजकता से त्रस्त सामान्य जन का आत्मविलाप सुननेवाला कोई नहीं था । सामाजिक विपत्तियों के थपेड़े खाते लोगों के मध्य रामानंद, कबीर ( उत्तर भारत में) तथा ज्ञानदेव , नामदेव , एकनाथ आदि महाराष्ट्र में अपनी संवेदनात्मक – अध्यात्म वाणी से लोगों में आत्म एवं परमात्मा -विश्वास से अध्यात्म साम्य की भूमि तैयार कर चुके थे। ऐसे समय में नानक जी देव ने समूचे देश में तथा कई अन्य देशों – मदीना , बगदाद, तुर्किस्तान , काबुल, तिब्बत आदि में घूम – घूमकर अपने निर्गुणपंथी, मानवतावादी , समतामूलक , निर्भयपूर्ण एकेश्वरवादी विचारों का प्रसार किया।“

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