NCERT की कक्षा 11 की राजनीतिक विज्ञान की पुस्तक में भारतीय सेक्युलरिज्म की आलोचना से बवाल
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NCERT की कक्षा 11 की राजनीतिक विज्ञान की पुस्तक में भारतीय सेक्युलरिज्म की आलोचना से बवाल

संशोधित विषयवस्तु में गोधरा के पीड़ितों को धर्म के आधार पर विभाजित नहीं किया गया है। इसे लेकर विवाद है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 18, 2024, 11:51 pm IST
in विश्लेषण

एनसीईआरटी ने इस वर्ष एक बार फिर से अपनी पाठ्यपुस्तकों में कुछ परिवर्तन किए हैं। कक्षा 11 की राजनीतिक विज्ञान की पुस्तक में अध्याय 8 धर्मनिरपेक्षता में कुछ परिवर्तनों को लेकर हंगामा मचा हुआ है। यह शोर इस हद तक है कि इसे लेकर योगेंद्र यादव ने एनसीईआरटी को पत्र भेजा है कि उनका नाम पुस्तक से हटाया जाए। आखिर ऐसे क्या परिवर्तन एनसीईआरटी ने किए हैं, जिसे लेकर योगेंद्र यादव से लेकर कांग्रेस तक एनसीईआरटी पर हमलावर है?

दरअसल राजनीतिक विज्ञान की कक्षा 11 की पुस्तक राजनीतिक सिद्धांत में धर्मनिरपेक्षता नामक अध्याय में कुछ सामग्री हटाई गई है तो कुछ जोड़ी गई है। धर्मों के बीच वर्चस्ववाद नामक शीर्षक के अंतर्गत गुजरात के गोधरा दंगों का उल्लेख है। पहले जहां इसमें पीड़ितों के नाम पर मात्र मुस्लिमों का ही उल्लेख था तो वहीं जो इस बार संशोधित अध्याय है उसमें यह लिखा है कि ”2002 में गुजरात में गोधरा दंगों के पश्चात लगभग 1000 से अधिक लोग मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए बहुत से सदस्य अपने गाँव वापस नहीं जा सके, जहां से वे उजाड़ दिए गए थे।”

संशोधित विषयवस्तु में गोधरा के पीड़ितों को धर्म के आधार पर विभाजित नहीं किया गया है। इसे लेकर विवाद है। जबकि आँकड़े यह कहते हैं कि इन दंगों में मारे जाने वाले लोग हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के थे।

इसी अध्याय में “भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनाएं” में “वोट बैंक की राजनीति” की विषयवस्तु है, जिसको लेकर सबसे अधिक विरोध हो रहा है। पिछले वर्ष के पाठ्यक्रम में जहां इसका विस्तार नहीं था, और उसे यह कहते हुए सीमित कर दिया गया था कि ”वोट बैंक की राजनीति में कुछ गलत नहीं है, हाँ एक प्रकार की वोट बैंक की राजनीति ठीक नहीं होती है, जो अन्याय पैदा करती है। यह तथ्य कि धर्मनिरपेक्ष दल वोट बैंक को प्रयोग करते हैं, समस्या नहीं है। सभी दल किसी न किसी समूह के लिए यह करते हैं।”

जबकि इस वर्ष इसे यह कहते हुए विस्तार दे दिया है कि “सिद्धांत रूप से वोट बैंक की राजनीति में कुछ भी गलत नहीं हो सकता है लेकिन केवल जब वोट बैंक की राजनीति चुनावों के दौरान किसी विशेष उम्मीदवार या राजनीतिक दल के लिए सामूहिक रूप से वोट करने के लिए एक सामाजिक समूह को एकजुट करती है तो यह चुनावी राजनीति को विकृत कर देती है। यहाँ महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि मतदान के दौरान पूरा समूह एक समान इकाई के रूप में कार्य करता है। समूह के भीतर विविधता के बावजूद, ऐसी वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टी या नेता कृत्रिम रूप से यह धारणा बनाने की कोशिश करते हैं कि समूह का हित एक ही है। वास्तव में ऐसा कनरे से राजनीतिक दल समाज के दीर्घकालिक विकास और शासन की जरूरतों पर अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देते हैं।“

भारत की वर्तमान राजनीति में यदि कथित सेक्युलर दलों की राजनीति को देखा जाए तो उन्होंने वोट बैंक की राजनीति को लेकर वही खेल खेला है, जिसने कथित अल्पसंख्यक समुदायों के दीर्घकालिक हितों के बजाय अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता दी है। राजीव गांधी द्वारा शाहबानो वाले निर्णय को पलटना चुनावी लाभ को ही ध्यान मे रखकर किया था। इसी के साथ जब गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के कारसेवकों से भरे कोच को जानबूझकर जलाया गया था, उस समय तत्कालीन रेलमंत्री लालू यादव ने मात्र चुनावी राजनीति को ध्यान में रखते हुए इस घटना को दुर्घटना के रूप मे स्थापित करने का प्रयास किया था।

वोट बैंक की राजनीति को लेकर कथित सेक्युलर दलों का रवैया स्पष्ट है। इस अध्याय में आगे लिखा है कि “भारत में वोट बैंक की राजनीति अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से भी जुड़ी है। इसका मतलब यह है कि राजनीतिक सभी नागरिकों की समानता के सिद्धांतों की उपेक्षा करते हैं और अल्पसंख्यक समूह के हितों को प्राथमिकता देते हैं। विडंबना यह है कि इससे अल्पसंख्यक समूह अलगाव और हाशिये पर चला गया है। चूंकि वोट बैंक की राजनीति अल्पसंख्यक समूह के भीतर विविधता को स्वीकार करने में विफल रहती है, इसलिए इन समूहों के भीतर सामाजिक सुरक्षा के मुद्दों को उठाना भी मुश्किल साबित हुआ है!”

इस अध्याय में जिन संशोधनों को लेकर आपत्ति की जा रही है, जिसे लेकर कांग्रेस के नेता जयराम रमेश इस सीमा तक हमलावर हैं कि वे एनसीईआरटी को आरएसएस की सहायक संस्था घोषित कर रहे हैं? क्या वोट बैंक की राजनीति का सबसे ताजा उदाहरण हाल ही के लोकसभा चुनावों में नहीं देखा गया, जिसमें अल्पसंख्यक अर्थात मुस्लिम समुदाय ने अपने दीर्घकालिक हितों अर्थात तीन तलाक से छुटकारा आदि को ध्यान में न रखकर अल्पसंख्यक पहचान या अपनी मजहबी पहचान को ध्यान में रखते हुए वर्तमान एनडीए सरकार के विरोध में मत दिया था।

वोटिंग पैटर्न को देखकर कोई भी यह समझ सकता है कि कहीं न कहीं वोटिंग मजहब के आधार पर हुई थी और सत्ताधारी दल को किसी न किसी प्रकार अल्पसंख्यक विरोधी घोषित करने के आधार पर हुई थी। क्या जयराम रमेश को यह डर है कि यदि कक्षा 11 के बच्चे वोट बैंक की राजनीति पढ़ेंगे तो वे कथित सेक्युलर दल की असलियत समझ जाएंगे? वे उस मोहब्बत की दुकान की नफरत वाली राजनीति को समझ जाएंगे जो इन दिनों कांग्रेस खोलकर बैठी है?

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