बुंदेलखंड और उसकी होली: झांसी की रानी से जुड़ा इतिहास
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होम भारत उत्तर प्रदेश

बुंदेलखंड और उसकी होली: झांसी की रानी से जुड़ा इतिहास

रानी लक्ष्मीबाई ने ऊंचे स्वर में कहा- 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'।

Written byMasummba ChaurasiaMasummba Chaurasia
Mar 24, 2024, 01:50 pm IST
in उत्तर प्रदेश

रंगों का त्योहार होली पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है। अलग-अलग राज्यों में इस त्योहार को मनाने का अपना-अपना तरीका है। वहीं, होलिका और भक्त प्रह्लाद की कहानी तो आपने जरूर सुनी होगी। भक्त प्रह्लाद का वध करने के लिए हिरण्यकश्यप ने अपने पापों की सीमा पार की थी। उसने बहन होलिका (होलिका को आशीर्वाद प्राप्त था कि वह आग में कभी नहीं जलेगी) की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर आग लगा दी, लेकिन इस दहन में प्रह्लाद की जान बच गई थी। हिरण्यकश्यप के पापों का घड़ा भर गया और भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर उसका वध किया। यह स्थान एरच में है, जो उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के अंतर्गत आता है। इस जगह से होली की शुरुआत मानी जाती है। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि जिस स्थान से इस त्योहार की शुरुआत हुई वहां के लोग यह त्योहार होली के अगले दिन मनाते हैं, इसके पीछे की कहानी रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी हुई है।

बात 1857 के महसंग्राम के कुछ दिनों पहले की है। रानी लक्ष्मीबाई ने बेटे को जन्म दिया। जन्म के कुछ महीने बाद ही बेटे की मृत्यु हो गई। इसके बाद राजा गंगाधर राव ने एक बच्चे को गोद लिया और यह घोषित किया कि वही झांसी का युवराज होगा, लेकिन अंग्रेजों की गिद्ध नजर झांसी की रियासत पर गड़ी हुई थी। अंग्रेजों ने फरमान जारी कर दिया कि रानी लक्ष्मीबाई का गोद लिया बच्चा उनकी विरासत को नहीं संभालेगा…

जिसके बाद लक्ष्मीबाई ने झांसी राज में अपने दावे और गोदनामे के बारे में बहुत पत्र व्यवहार किए। (वे सभी पत्र आज भी झांसी अभिलेखागार में सुरक्षित हैं) इसी मामले को लेकर रानी लक्ष्मीबाई ने लगभग एक वर्ष तक पत्राचार किया लेकिन अंग्रेजी सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी। 26 फरवरी 1854 को डलहौजी ने झांसी राज को कंपनी के शासन में लेने का निर्णय लिया और नियमानुसार अपने तीन सहयोगियों से चर्चा की और फिर एक ऑर्डर पर तीनों के दस्तखत हुए। 28-2-1854 को जे. ए. डोरिनो ने हस्ताक्षर किए और 2-3-1854 को इस आदेश पर एफ. जे. हेलिडे ने अपने हस्ताक्षर किए।

मार्च के पहले ही सप्ताह में यह आदेश डी. ए. मेलकम के पास पहुंच गया और उसके आधार पर मेलकम ने 15-3-1854 को आदेश दिया। जिसमें उसने लिखा था कि झांसी का गोदनामा स्वीकृत नहीं किया गया है। स्वत्वाधिकार समाप्त होने के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने झांसी को अपने अधीन ले लिया है। उसने लिखा- मैं मेजर एलिस को झांसी का शासक नियुक्त करता हूं और अब से झांसी की जनता ब्रिटिश सरकार के अधीन है एवं राजस्व मेजर एलिस को दें। एलिस ने तय किया कि यह आदेश रानी लक्ष्मी बाई को वह 16-3-1854 को देगा।

16-3-1854 को होलिका दहन भी था। उसने निर्धारित समय पर रानी लक्ष्मीबाई के दरबार में पहुंचकर ऊंचे स्वर में आदेश पढ़ना शुरू किया। आदेश का पाठ समाप्त होते ही पर्दे के पीछे से रानी की आवाज गूंजी ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’। रानी अंदर चली गईं और दरबार बर्खास्त हो गया।

अंग्रेजों की इस राजजप्ती आदेश के बारे में आमजन को कुछ भी पता नहीं था। वे इस मामले में अनजान थे क्योंकि उस दिन होलिका दहन था, तो लोगों ने होली दहन किया। लेकिन रात होते-होते ये खबर पूरे झांसी में फैल गई कि राज अंग्रेजों ने ले लिया है। सुबह हुई रंग खेलना था लेकिन इस घड़ी में कौन रंग-गुलाल खेलकर खुशी मनाता। सभी दुखी थे। इसलिए उस दिन झांसी में रंग नहीं खेला गया। वह दिन और आज का दिन झांसी में होलिका दहन के दूसरे दिन रंग-गुलाल की होली नहीं खेली जाती। बल्कि तीसरे दिन ये त्योहार मनाया जाता है।

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी

1857 के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की हुकूमत का डटकर सामना किया और जंग के मैदान में उन्हें धूल चटाई। उनका नाम सुनते ही अंग्रेज थर-थर कांपते थे। मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी अंतिम सांस तक महान वीरांगना अंग्रेजों से लड़ती रहीं और वीरगति को प्राप्त हुईं।

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