उत्तराखंड: रामनगर के पास सीतावनी आश्रम, माता सीता के जीवन से जुड़ा है यहां का पौराणिक इतिहास
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उत्तराखंड: रामनगर के पास सीतावनी आश्रम, माता सीता के जीवन से जुड़ा है यहां का पौराणिक इतिहास

पुरातत्व विभाग करता है आश्रम की देखरेख, उत्तराखंड सरकार करेगी स्थल विकास का कार्य

Written byदिनेश मानसेरादिनेश मानसेरा
Jan 11, 2024, 02:57 pm IST
inभारत, उत्तराखंड
सीतावनी में मंदिर

सीतावनी में मंदिर

कॉर्बेट सिटी रामनगर से 22 किलोमीटर दूर पॉल गढ़ वन्यजीव अभयारण्य के पास पौराणिक क्षेत्र सीतावनी है। माना जाता है कि यहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है और यही वह स्थान है जहां माता सीता ने आश्रय लिया था और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ।

सीतावनी न सिर्फ आध्यत्मिक रूप से पहचान बनाए हुए है बल्कि पर्यटन के क्षेत्र में भी जाना जाता है। वाल्मीकि आश्रम, सीतावनी मन्दिर को त्रेता युग का बताया जाता है। रामनगर वन प्रभाग के अंर्तगत सीता जी का मंदिर घने जंगल के बीच है । जहाँ बाघ, हाथी, गुलदार के अलावा कई प्रकार के वन्यजीव दिखाई देते हैं। जंगल में दिन में भी निकलना किसी खतरे से कम नहीं है। माता सीता से जुड़ी धार्मिक कहानियों के कारण ही इस जंगल को सीतावन भी कहा गया है।

कुमायूं के इतिहासों में है उल्लेख

हिमालयन गजेटियर और कुमायूं के इतिहास में सीतावनी को लेकर कई प्रकार की किंवदंतियां हैं। बद्रीदत्त पाडे की पुस्तक कुमाऊँ के इतिहास में बताया गया है कि महर्षि विश्वामित्र के कहने पर एक बार श्री राम, लक्ष्मण व सीता जी यहाँ आए थे। वन की सुंदरता देख सीता जी इतनी मोहित हो गयी थीं कि उन्होंने श्री राम से कहा कि वैशाख के महीने में हमे यहाँ रहना चाहिए और कौशिकी में स्नान करना चाहिए। वह वैशाख में यहीं रहे जहां पानी के दो झरने निकले। दूसरी किंवदंती के अनुसार यहाँ महर्षि वाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था। वनवास के दौरान सीता जी यहीं रहीं और यहीं लव कुश का जन्म हुआ।

स्कंद पुराण में भी जिक्र

स्कंद पुराण में कौशिकी नदी जो आज कोसी नदी है, इसके बाईं ओर शिवगिरि पर्वत है। जिसे सिद्ध आत्माओं और गन्धर्वों का विचरण स्थल कहा गया है। रामायण, स्कंद पुराण और महाभारत में भी सीतावनी का उल्लेख मिलता है। यहां के महंत शिवगिरि की मानें तो मन्दिर में जल की तीन धाराएं हैं। जिनका जल गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गुनगुना रहता है।

महर्षि वाल्मीकि की पूजा करने आते हैं श्रद्धालु

महर्षि वाल्मीकि का आश्रम होने के कारण यह तीर्थ स्थल भी है। वर्ष में एक बार, सनातन समाज द्वारा यहाँ विशाल मेले का आयोजन और भंडारा भी किया जाता है।

पुरातत्व विभाग करता है मंदिर की देखरेख

वनक्षेत्र सीतावनी मन्दिर क्षेत्र सदियों पुराना और पौराणिक होने की वजह से भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन है। हालांकि यह क्षेत्र वन विभाग के अंतर्गत आने के कारण यहाँ प्रवेश के लिए वन विभाग द्वारा अनुमति दी जाती है।

पर्यटक भी जाते हैं मंदिर

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में जिन पर्यटकों को भीतर जाने का परमिट नहीं मिलता वे अब सीतावनी क्षेत्र में बाघ और अन्य वन्यजीव देखने जाते हैं। सीतावनी मंदिर के दर्शन करने भी आते हैं ।धार्मिक महत्व के बाद पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो चुका है। हर साल हजारों पर्यटक इस क्षेत्र में आने लगे हैं। इससे वन विभाग को भी राजस्व प्राप्त होने लगा है।

बन रही है कार्ययोजना

श्रीराम मंदिर निर्माण की पावन बेला में जनमानस में श्रीराम को लेकर उमड़ रही श्रद्धा के बीच स्थानीय लोगों ने उत्तराखंड सरकार से सीतावनी को धार्मिक स्थल के रूप में विकसित करने और पौलगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी का नाम सीतावनी किए जाने की मांग की है। उत्तराखंड सरकार इस वन को तीर्थाटन की दृष्टि से विकास के काम करने जा रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर वन विभाग इस दिशा में कार्ययोजना बना रहा है।

Topics: राम मंदिरManasरामनगरसीतावनीमहर्षि वाल्मीकि आश्रमपॉलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य
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