गुजरात दंगा: 35 आरोपी बरी, कोर्ट ने तत्कालीन छद्म धर्मनिरपेक्ष मीडिया और नेताओं को लगाई फटकार, बताया क्यों लंबा चला केस
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गुजरात दंगा: 35 आरोपी बरी, कोर्ट ने तत्कालीन छद्म धर्मनिरपेक्ष मीडिया और नेताओं को लगाई फटकार, बताया क्यों लंबा चला केस

कोर्ट ने कहा कि गुजरात में दंगे स्वतःस्फूर्त थे, वे सुनियोजित नहीं थे, जैसा कि छद्म-धर्मनिरपेक्षवादियों ने बताया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 18, 2023, 12:41 am IST
in भारत, गुजरात
गुजरात दंगे का एक दृश्य

गुजरात दंगे का एक दृश्य

हालोल/अमदाबाद। गुजरात की एक निचली अदालत ने वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों से जुड़े चार मामलों में 35 लोगों को बरी कर दिया है। जिन आरोपियों को बरी किया गया है, उनमें कई चिकित्सक, प्रोफेसर, शिक्षक और व्यवसायी हैं। इसको लेकर कोर्ट ने कहा कि छद्म धर्मनिरपेक्ष मीडिया और संगठनों के हंगामे के कारण अनावश्यक रूप से मुकदमा लंबा चला।

पंचमहल जिले के हलोल कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हर्ष बालकृष्ण त्रिवेदी ने कहा कि गोधरा के बाद हुए दंगे स्वत: स्फूर्त थे और न कि छद्म धर्मनिरपेक्ष व्यक्तियों और नेताओं द्वारा वर्णित योजनाबद्ध। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अभियोजन सफल नहीं हो सकता क्योंकि कथित कहानी को पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया है।

15 जून 2023 को उपलब्ध हुए फैसले में न्यायाधीश त्रिवेदी ने चार मामलों में कुल 35 अभियुक्तों के खिलाफ फैसला सुनाया था। लगभग 20 साल पहले जब मुकदमा शुरू हुआ तो कुल 52 अभियुक्त थे। हालांकि, समय बीतने के साथ 17 लोगों की मौत हो गई। इस तरह मामले में सिर्फ 35 अभियुक्त ही बचे थे।

यह था मामला

गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में के S-6 डब्बे में आग लगाने की घटना के एक दिन बाद 28 फरवरी 2002 को कलोल बस स्टैंड, डेलोल गांव और डेरोल स्टेशन क्षेत्र के पास हिंसा भड़क गई थी। इनमें रूहुल अमीन पड़वा, हारून अब्दुल सत्तार तसिया और यूसुफ इब्राहिम शेख की हत्या कर दी गई थी। आरोपियों पर इन तीनों की हत्या के अलावा दंगा करने, आगजनी, गैरकानूनी जुटाव, अवैध हथियार रखने का आरोप लगाया गया था। हारून, रूहुल और यूसुफ अलग-अलग जगहों पर मारे गए। हारून को जिंदा जला दिया गया था। हारून का शव भी बरामद नहीं हो सका था।

फैसले में न्यायाधीश ने कहा कि किसी पर आरोपित के खिलाफ दंगा का अपराध साबित नहीं होता। पुलिस आरोपितों के खिलाफ एक भी सबूत नहीं पेश कर पाई। अभियोजक ने अनावश्यक रूप से 130 गवाहों को बुलाकर मामले को लंबा खींच दिया। इस मामले में लगभग सभी गवाहों की गवाही पूरी तरह अविश्वसनीय साबित हुई।

36 पन्नों के अपने फैसले में न्यायाधीश ने कहा कि भारत में सांप्रदायिक हिंसा कोई नई घटना नहीं है। ये कभी-कभी छोटे-छोटे मुद्दों पर विवादों या अफवाहों से भी शुरू हो जाती हैं। गवाहों की गवाही की अविश्वसनीयता पर कोर्ट ने कहा, “हमारे देश में लोगों के बीच सच्चाई का स्तर बहुत कम है।”

न्यायाधीश ने विस्तार से वर्णन किया कि कैसे गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के कोच एस-6 को जला दिया गया था जिसमें 59 यात्रियों की मौत हो गई थी। इससे आम लोग हैरान और परेशान हो गए।

न्यायाधीश ने आगे कहा कि शांतप्रिय गुजराती लोग इस घटना से हैरान और परेशान थे। हमने देखा कि तत्कालीन छद्म धर्मनिरपेक्ष मीडिया और राजनेताओं ने आक्रोशित लोगों के घावों पर नमक छिड़का। रिपोर्ट कहती है कि गोधरा के बाद गुजरात के 24 जिलों में से 16 सांप्रदायिक दंगे हुए। गुजरात में दंगे स्वतःस्फूर्त थे, वे सुनियोजित नहीं थे, जैसा कि छद्म-धर्मनिरपेक्षवादियों ने बताया।

Topics: गुजरात दंगेगोधरा कांडछद्म धर्मनिरपेक्षकोर्ट का फैसलागुजरात दंगे कोर्ट
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