उत्तराखंड: 142 करोड़ लोग भारत की रीढ़ की हड्डी के मनके हैं, धर्म और संस्कृति को आचरण में लाना जरूरी है- डॉ. मोहन भागवत
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उत्तराखंड: 142 करोड़ लोग भारत की रीढ़ की हड्डी के मनके हैं, धर्म और संस्कृति को आचरण में लाना जरूरी है- डॉ. मोहन भागवत

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती के 72वें जन्म उत्सव के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन धर्म पर हमारी सृष्टि है, धर्म नहीं तो सृष्टि नहीं अतः उसे पहचान कर उस पर चलने वाले सुखी रहेंगे।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो
Jun 3, 2023, 10:31 pm IST
in भारत, उत्तराखंड

ऋषिकेश : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि 142 करोड़ लोग भारत की रीढ़ की हड्डी के मनके हैं। हमें धर्म और संस्कृति को आचरण में लाना जरूरी है। हमें अपने धर्म को प्रत्यक्ष रूप से आचरण में उतारना होगा। यह बात मोहन भागवत जी ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती  के 72वें जन्म उत्सव के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति श्रेष्ठ संस्कृति है, परन्तु भारतीय संस्कृति को उत्थान के लिए प्रयत्न करना होगा। सनातन धर्म पर हमारी सृष्टि है, धर्म नहीं तो सृष्टि नहीं अतः उसे पहचान कर उस पर चलने वाले सुखी रहेंगे।

मोहन भागवत जी का कहना था कि आज विश्व भर में पर्यावरण पर चर्चा हो रही है, हमें उसके लिए कार्य करना पड़ रहा है। हमारी भूमि में सब कुछ है, 6 हजार वर्षों से हम खेती कर रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। जो बातें विज्ञान के लिए उपयोगी है, वह हमारे वेदों में उपलब्ध है। हमारे पास पहले से ही ज्ञान भी है और विज्ञान भी है। उसके बावजूद सनातन धर्म अपना काम करता है। सनातन धर्म अपने विधि-विधान के अनुसार अपना कार्य करेगा। उसे पहचानकर हमें उन संस्कारों को स्वीकार कर चलना होगा तो हम सुखी रहेंगे। धर्म को हमारी जरूरत नहीं है, परन्तु हमें धर्म की जरूरत है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने स्वामी चिदानंद मुनि के जन्मदिन पर कहा कि उनको अपना जन्मदिन मनाने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु यह हमारी जरूरत है कि वह जो कार्य कर रहे हैं, उसे अपने जीवन में हम लेकर आएं।

उन्होंने कहा कि संतों के आचरण में धर्म रहता है, धर्म सर्वत्र कार्य करता है। इस अवसर पर उन्होंने तुकाराम महाराज के संदेशों को सुनाया। संत एकांत में आत्मसाधना और समाज में लोकसाधना करते हैं। जन्मदिवस के अवसर पर हमारे लिए एक संदेश है कि हम अपने स्थान पर रहकर ही कुछ करें। हम दीपक की तरह जब तक तेल और बाती है जब तक तो कम से कम जलते रहें। हमारे जीवन चलाने वालों की चिंता करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धर्मो रक्षति रक्षितः हमें अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचना है। यही संकल्प लेकर यहां से जाएं।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने जगद्गुरू शंकराचार्य महाराज से लेकर महामंडलेश्वर स्वामी असंगानन्द महाराज की परम्परा को प्रणाम करते हुए सभी संतों का अभिनन्दन करते हुए कहा कि गंगा के इस पावन तट और हिमालय की पवित्र वादियों से एक आह्वान करने का समय आ गया है। भारत के ऊर्जावान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत का मान पूरे विश्व में बढ़ा रहे हैं। उन्हें यह संस्कृति और संस्कार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मिले है, क्योंकि यह व्यक्ति की नहीं वैश्विक संस्था है।

उन्होंने कहा कि भारत ही पूरे विश्व को शान्ति का मंत्र दे सकता हैं क्योंकि भारत एक जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि शान्ति की भूमि है। भारत का मंत्र ही है वसुधैव कुटुम्बकम्।  यज्ञ तो बहुत लोग करते है, परन्तु उन्होंने अपने जीवन को ही यज्ञ बना दिया है। यहां बात सत्ता की नहीं सत्य की है। समय-समय पर सनातन के सूर्य को ढकने के लिए बादल आते रहे हैं परन्तु कोई ढक नहीं पाया।
उन्होंने कहा कि हम संकल्प लें की इस मातृभूमि के मान को सदैव बनाए रखेंगे। हम विकास और विरासत को साथ-साथ लेकर चलें। स्वामी जी ने कहा कि यह प्राकट्य महोत्सव नहीं बल्कि पर्यावरण महोत्सव है, इसलिए पर्यावरण का दीप जलाए रखें। इस अवसर पर जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि महाराज ने कहा कि विगत कुछ वर्षो से योग, आयुर्वेद और भारत की विभिन्न विधाओं से पूरा विश्व परिचित हुआ है।

पूरे विश्व में तेजी से सकारात्मक रूप से प्रसारित होने वाली संस्कृति भारत की संस्कृति है। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, समाधान और आनन्द देने वाली संस्कृति भारत की संस्कृति है। भारत की संस्कृति हमें भय की ओर नहीं बल्कि भाव व स्वभाव की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि वृक्ष धरा का श्रृंगार है इसलिए इनका रक्षण करें। प्रकृति की पूजा केवल भारत में देखी जा सकती है। महाराज के पास एक दृष्टि, अध्ययन, विचार, ज्ञान और चिंतन है आप ऐेसे ही भारत का मार्गदर्शन करते रहें। उन्होंने इस अवसर पर सभी को पौधारोपण का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि जब भारत आजाद हुआ था। तब 1328 वृक्ष प्रत्येक भारतीय के हिस्से में थे, अब केवल 7 वृक्ष रह गए हैं। यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है, इसलिए हमारे पूज्य महाराज जी ने यह अलख जगाई है। इस अवसर पर उन्होंने गांवों बचाने का संदेश दिया।

कथाकार संत मुरलीधर महाराज ने कहा कि संसार में दो तरह का जन्म होता है, एक भोगने के लिए और एक उद्धार के लिए। संतों का जन्म मानवता और प्रकृति के उद्धार के लिए होता है। हम सब पूज्य स्वामी जी को पर्यावरण की सेवा कर अपना उपहार प्रदान करें।

आरएसएस के अन्तर्राष्ट्रीय संरक्षक दिनेश ने सर्वमंगल की कामना करते हुए कहा कि मैं स्वामी महाराज को उनके युवा अवस्था से जानता हूं, तब भी उनमें यही तन्मयता थी, वहीं तन्मयता आज पूरे विश्व को प्रकाशित कर रही है।

महामंडलेश्वर स्वामी धर्मदेव महाराज ने कहा कि आज महाराज का आर्विभाव दिवस है, उन्होंने भारत के कोने-कोने और समुद्र पार वैदिक सनातन संस्कृति को पहुंचाया है। बसंत जिनके खिलने से धन्य हो जाता है, वैसे ही हमारे महाराज श्री है, जिन्होंने पूरे विश्व को महकाया है। संघर्ष साधना से मानव माथे का चंदन बन जाता है। वैसे ही महाराज श्री आप हम सब के माथे का चंदन हैं। आज संकल्प लें कि हम अपने जीवन का एक दिन अपने गुरू को दें, तो इस प्रकृति का और उद्धार होगा।

महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति को पूरे विश्व में पहुंचाने का अद्भुत कार्य किया है। पूज्य संतों की साधुता और सरलता अद्भुत है। संत पूरे विश्व को नवजीवन प्रदान कर रहे हैं। एक समय ऐसा था जब अंधेरा, उजालों को झल रहा था। तब मोहन भागवत ही ने नव क्रान्ति प्रदान की।

उन्होंने कहा कि स्वामी ने नदियों में अविरल और निर्मल जल और पौधों के रोपण हेतु अद्भुत कार्य किया है। डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि पूज्य संतों का जन्मदिवस नहीं होता बल्कि संत तो ब्रह्मंड की सेवा के लिए अवतरित होते हैं। स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज के जीवन का एक ही मूल मंत्र है ‘हां’ वे सदैव मानवता, प्रकृति और पर्यावरण की सेवा हेतु तत्पर रहते हैं। हम सभी उनके जीवन से सेवा रूपी दिव्य सूत्रों को आत्मसात करने का संकल्प लें। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने सभी पूज्य संतों और अतिथियों को रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया।

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