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तारिक फतह क्यों चुभते थे कठमुल्लों को

तारिक फतह को उनके चाहने वाले एक बेखौफ लेखक के रूप में याद रखेंगे। वे सच का साथ देते रहे। वे भारत के परम मित्र थे। उन्हें इस बात का गर्व रहा कि उनके पूर्वज हिंदू राजपूत थे।

Written byआर.के. सिन्हाआर.के. सिन्हा
Apr 26, 2023, 03:31 pm IST
in विश्लेषण
तारिक फतेह (फाइल फोटो)

तारिक फतेह (फाइल फोटो)

तारिक फतेह हिंदी पट्टी के मुसलमानों के दिल में चुभते हैं। उनकी तारीफ यह थी कि वह डंके की चोट पर अपने पूर्वजों को हिंदू बताते रहे। बहुत कम मुसलमान यह हिम्मत दिखा पाते हैं। वह मुस्लिम सांप्रदायिकता पर लगातार चोट करते रहे।

तारिक फतह को उनके चाहने वाले एक बेखौफ लेखक के रूप में याद रखेंगे। वे सच का साथ देते रहे। वे भारत के परम मित्र थे। उन्हें इस बात का गर्व रहा कि उनके पूर्वज हिंदू राजपूत थे। वे बार-बार कहते और लिखते थे कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के तमाम मुसलमानों के पुरखे हिंदू ही थे और उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया। उनकी इस तरह की साफगोई कठमुल्लों को नागवार गुजरती थी। तारिक फतेह हिंदी पट्टी के मुसलमानों के दिल में चुभते हैं। उनकी तारीफ यह थी कि वह डंके की चोट पर अपने पूर्वजों को हिंदू बताते रहे। बहुत कम मुसलमान यह हिम्मत दिखा पाते हैं। वह मुस्लिम सांप्रदायिकता पर लगातार चोट करते रहे।

तारिक फतह पहली बार 2013 में भारत दौरे पर आए थे। तब उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था- ‘पाकिस्तान को तो अब भूल जाइए। इसको एक न एक दिन कई टुकड़ों में टूटना ही है। वो दिन भी दूर नहीं जब बलूचिस्तान और सिंध उससे अलग हो जाएगा। पाकिस्तान की सेना एक औद्योगिक माफिया है जिसका अपने देश के अनाज, ट्रकों, मिसाइलों से लेकर बैंकों तक पर नियंत्रण हैं।’ यह सुनकर पाकिस्तान के हुक्मरान तिलमिला गए थे। तारिक फतह मानते थे कि भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां मुसलमान बिना डरे स्वतंत्रतापूर्वक काम करते हैं।

तारिक फतह से जितने लोग मुहब्बत करने वाले हैं उससे बहुत ही कम नफरत करने वाले हैं। वे कभी इस्लाम की आलोचना नहीं करते थे, बल्कि इस्लाम के नाम पर झूठे गौरव और पाखंड की बखिया उधेड़ देते थे। अच्छा से अच्छा मौलवी उनके छोटे से चुभते हुए तर्क से तिलमिला कर रह जाता था। एक बार एक मौलवी साहब औरंगजेब की बहुत तारीफ कर रहे थे और उसे सच्चा और अनुकरणीय मुसलमान साबित कर रहे थे। तारिक फतह ने उससे सिर्फ एक सवाल किया कि अगर औरंगजेब एक सच्चा मुसलमान था तो क्या उसने हज की थी ? मौलवी साहब बगलें झांकते नजर आने लगे और उनकी सारी पिछली तारीफों पर फतह साहब के एक सवाल ने पानी फेर दिया। किसी मुसलमान पर हज उतना ही बड़ा फर्ज है जितने कि नमाज, रोजा और जकात। इनमें से कोई एक-दूसरे की भरपाई नहीं कर सकता।

चारों ही अलग अलग फर्ज हैं। कोई भी मुस्लिम जब बालिग हो जाए और हज करने के लायक स्वास्थ्य और आमदनी हो तो हज तुरन्त फर्ज हो जाती है। अल्लाह ने औरंगजेब को 96 साल की लम्बी उम्र दी। बचपन से बुढ़ापे तक तंदुरुस्त रखा। पहले शाहजादा फिर बादशाह बनाया। हज में दुनियावी मसायल की वजह से कोई माफी नहीं है। अगर सामर्थ्यवान होते हुए भी 96 साल की उम्र तक औरंगजेब हज नहीं करता तो या तो उसका हज के फर्ज होने पर ईमान नहीं है या उसे ईश्वर पर भरोसा नहीं है कि वह हज करने गया तो वापस उसकी गद्दी उसे मिलेगी या नहीं। उसका पंजवक्ता नमाजी होना और टोपियां सिल कर रोजी कमाना सब बेकार गया। हज को महत्व न देना और उसको टालना दोनों ही “गुनाहे कबीरा” यानी घोर पाप हैं।

देश में सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर हुए दंगो के बाद तारिक फतह ने कहा था- ‘हर वह व्यक्ति हिंदू है, जो हिंदुस्तान के इतिहास और परंपरा की मिल्कियत रखता है।’ मुस्लिम समुदाय में तारिक फतह जैसा बोल्ड और जीनियस लेखक या विचारक मिलना मुश्किल है। इस्लाम की कट्टरता के विरुद्ध बिगुल फूंकने वाला, पाकिस्तान के आतंकवाद-प्रेम पर मुखर होकर निरंतर प्रहार करने वाला कोई दूसरा मुस्लिम लेखक या विचारक मिलना मुश्किल है। इस्लाम सहित तमाम मुद्दों पर मुखर रूप से बोलने वाले तारिक फतह टीवी डिबेट में अक्सर खुद को हिंदुस्तानी बताते थे और हमेशा सिंध और हिंद का कनेक्शन जोड़ते थे। तारिक फतह पाकिस्तान के विचार को खारिज करते थे। वे मानते थे कि देश का बंटवारा नहीं होना चाहिए था। दुर्भाग्य यह है कि उनकी मौत का कुछ कथित प्रगतिशील और कठमुल्ले जश्न मना रहे हैं। अगर आपको यकीन न हो तो सोशल मीडिया पर चले जाइये। वहां पर आपको तारिक फतह को लेकर तमाम तरह की ओछी टिप्पणियां पढ़ने को मिलेंगी।

कुछ समय पहले तारिक फतेह ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक ‘ट्विटर स्पेस’ का स्क्रीन शॉट शेयर करते हुए लिखा था कि एक सज्जन ने ग्रुप बनाया है जो मेरा सिर कलम (सर तन से जुदा) करने की योजना बना रहा है। तारिक फतह के न रहने से आज दुनिया ने एक सच्चा लेखक खो दिया है। उनकी जब याद आएगी तो फैज अहमद फैज का यह शेर ‘कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब आज तुम याद बे-हिसाब आए’ याद कर ही उनके प्रशंसकों का सहारा बनेगा।

तारिक फतह धार्मिक अतिवाद के खिलाफ बोलने और एक उदारवादी इस्लाम के पक्ष को बढ़ावा देने के लिये प्रसिद्ध थे। उन्होंने ‘यहूदी मेरे दुश्मन नहीं हैं’ नाम से एक पुस्तक भी लिखी। पाकिस्तान में बलूचों के आंदोलनों के समर्थक भी रहे। बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन और पाकिस्तान द्वारा बलूचों पर की जा रही ज्यादतियों के विषय पर भी बोलते और लिखते रहे। तारिक फतह मुस्लिम इतिहास के भी प्रकांड विद्वान थे, जिस कारण तर्कों और तथ्यों में उन्हें पराजित करना किसी के लिये नामुमकिन था।

तारिक फतह कोरानाकाल से पहले मेरे राजधानी के हुमायूं रोड के सरकारी आवास में भी कई बार पधारे। उनसे कई अहम मसलों पर चर्चा हुई। वे बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। वे पाकिस्तान के शहर कराची में जन्मे थे और 1987 से कनाडा में रहने लगे। “तारिक फतह आप” वाकई पंजाब के शेर और हिंदुस्तान के बेटे थे, जैसा कि आपकी बिटिया नताशा ने कहा है। तारिक फतह ने एक बार मुझसे जानना चाहा कि क्या सच है कि बहरत के संविधान की मूल प्रति पर “हड़प्पा और मोहन जोदड़ों” के चित्र हैं। मैंने कहा कि मेरे पास संविधान की मूल प्रति है। आपको नन्द लाल बसु की “हड़प्पा और मोहन जोदड़ो” की पेंटिंग दिखाता हूं I मैंने जब उन्हें संविधान की मूल प्रति दिखाई तो वे भावुक हो उठे और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े I

तारिक फतह किसी टीवी के कार्यक्रम में सिंध का इतिहास, पंजाब का इतिहास, पाकिस्तान के वजूद और यूपी के मुसलमानों की बात अवश्य करते थे। वे बार-बार कहते थे कि पाकिस्तान के पंजाबियों पर उर्दू भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों ने थोपी। इस वजह से उनसे भारत और पाकिस्तान का एक तबका खफा रहता था। यह सच है कि पंजाबियों पर उर्दू थोपी गई।

चूंकि वे एक बेखौफ साहसी लेखक थे और खुलकर अपनी राय का इजहार करते थे इसलिए उनकी जान के दुश्मन भी कम नहीं थे। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहती थीं। उन्हें ‘सर तन से जुदा’ जैसी धमकियां भी लगातार मिल रही थीं। कुछ समय पहले तारिक फतेह ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक ‘ट्विटर स्पेस’ का स्क्रीन शॉट शेयर करते हुए लिखा था कि एक सज्जन ने ग्रुप बनाया है जो मेरा सिर कलम (सर तन से जुदा) करने की योजना बना रहा है। तारिक फतह के न रहने से आज दुनिया ने एक सच्चा लेखक खो दिया है। उनकी जब याद आएगी तो फैज अहमद फैज का यह शेर ‘कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब आज तुम याद बे-हिसाब आए’ याद कर ही उनके प्रशंसकों का सहारा बनेगा।

(लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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