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ध्यान दीजिये ! यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं, कर्नाटक से कश्मीर तक देशविरोधियों का भी है मुख्य मोर्चा

भारत के दुश्मन भी अब नकली मोर्चे खड़े करके भारतीयों का ध्यान अपनी मूल जंग से हटा रहे हैं

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Apr 23, 2023, 04:01 pm IST
in विश्लेषण, मत अभिमत
analysis

विश्लेषण

द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की तरफ से एक घोस्ट आर्मी भी लड़ रही थी. 1000 जवानों की ये यूनिट जर्मन सेना को ये विश्वास दिलाने में सफल रही कि ये 30000 जवानों का दस्ता है, जिसके पास टैंक से लेकर कहीं भी पुल बना देने की क्षमता है. जर्मन सेना इस घोस्ट यूनिट के फेर में फंसी रही और उधर, इसकी आड़ में मित्र राष्ट्रों ने नॉर्मंडी तक की लड़ाई लड़ डाली. मशहूर चीनी जनरल सुन त्जू ने अपनी किताब आर्ट आफ वॉर में दुश्मन को भ्रम में डालने को अहम मोर्चा करार दिया है.

भारत के दुश्मन भी अब नकली मोर्चे खड़े करके भारतीयों का ध्यान अपनी मूल जंग से हटा रहे हैं. एक घोर सांप्रदायिक माफिया सरगना अतीक अहमद की हत्या, यानी अपराधी की अपराधियों द्वारा हत्या क्या राष्ट्रीय विमर्श का मसला है? कई राज्यों के राज्यपाल रहने और पद पर रहते हुए मौन और उच्च पद से हटते ही निम्न स्तर मुखरता प्रदर्शित करने वाले सत्यपाल मलिक की कड़वाहट क्या विश्वास करने योग्य है? क्या लाइमलाइट के लिए लालायित एक अविश्सनीय नेता की बातों पर आपको विश्वास करना चाहिए? क्या आपको नहीं सोचना चाहिए कि समलैंगिक विवाह जैसे अनावश्यक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही प्रोसिडिंग कहीं आपका ध्यान असली मुद्दों से भटकाने की कोशिश नहीं है? जरा सोचिए कि इन मुद्दों में आकस्मिकता तो हो सकती है, लेकिन राष्ट्र से जुड़े दूरगामी मसले नहीं हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत विरोधी खेमा अपनी मूल रणनीति से आपका ध्यान कहीं और खींचने की कोशिश कर रहा है?

असल में इस समय देश में मुख्य लड़ाई तीन मोर्चों पर चल रही है. पहला मोर्चा, कश्मीर है. जम्मू-कश्मीर में 370 समाप्त होने के बाद जिस तरीके से आतंकवाद की जड़ें उखड़ी हैं, उसे लेकर पाकिस्तान जितना परेशान है, उतना ही परेशान कांग्रेस, फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती हैं. राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के बाद ऐलानिया कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में उन्होंने आतंकवादियों को देखा. आतंकवादियों ने उन्हें देखा. लेकिन कुछ कहा नहीं. राहुल के वक्तव्य का क्या मतलब है. क्या ये मतलब है कि कश्मीर में अब भी आतंकवादी घूम रहे हैं. या फिर ये कि दहशतगर्द राहुल गांधी या कांग्रेस को खतरा नहीं मानते. या फिर वे राहुल या कांग्रेस को दोस्त मानते हैं. या फिर ये संदेश या संकेत है कि हम अगर सत्ता में आते हैं, तो तुम हमें कुछ मत कहना और हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे. इस बारे में कोई भी राय बनाते समय ये जरूर याद रखिएगा कि कांग्रेस अनुच्छेद 370 समाप्त होने या जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में पूर्ण विलय के खिलाफ है. राहुल गांधी के इस बयान से घाटी में मौजूद भारत विरोधी ताकतों को ऑक्सीजन मिली है. ये इस्लामिक दहशतगर्द ताकतों, उन्हें प्रश्रय देने वाली विदेशी शक्तियों (जैसे पाकिस्तान) और कांग्रेस के बीच किसी आपसी समझदारी का संकेत नहीं है क्या?

ये शक तब और पुख्ता हो जाता है, जब राहुल गांधी लंदन जाते हैं. यहां वह कहते हैं कि भारत में बोलने की आजादी नहीं है. वह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विदेश में जाकर सवाल उठाते हैं. पूरी दुनिया में चीन का साम्राज्यवादी रवैया चिंता पैदा कर रहा है, लेकिन राहुल गांधी उसे अमनपसंद देश बताते हैं. पैगासस से लेकर संसद में बोलने से रोकने तक एक के बाद एक झूठ परोसते हैं. प्रकारांतर में लोकतंत्र को अपने ख्याली खतरे से बचाने के लिए विदेशी ताकतों को एक तरीके से न्योता देते हैं. और इन सबके बीच पुंछ में आतंकवादी हमला होता है. एक गांव के लोगों के लिए रोजा इफ्तार का सामान ले जा रहे सेना के वाहन पर हमला होता है. पांच जवान बलिदान हो जाते हैं. और इसकी जिम्मेदारी कौन लेता है… इसकी जिम्मेदारी लेता है पीपुल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ) नाम का एक अचानक से इजाद हुआ संगठन. यह पहला मौका है, जब कश्मीर में किसी आतंकवादी संगठन के नाम में इस्लाम और जिहाद नहीं है. इस संगठन का नाम क्या उन जुमलों से नहीं मिलता, जो राहुल गांधी और कुछ विपक्षी दल रोज बोलते हैं. अचानक से इस्लामिक आतंकवादी संगठन उस काल्पनिक फासीवादी खतरे से बंदूक व बारूद लेकर लड़ने निकल पड़ते हैं, जो राहुल गांधी और उनका गिरोह रोज बताता रहता है. पीपुल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट नाम में ही यह गठजोड़ नजर आ जाता है. यानी पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों को अब कोई सीख दे रहा है कि इस्लाम के लिए लड़ो, भारत के टुकड़े करने के लिए लड़ो. लेकिन नाम फासीवाद विरोधी रख लो. तुम्हारे लाख खून माफ हो जाएंगे और इस्लाम भी बदनाम नहीं होगा.

दूसरा मोर्चा है कर्नाटक. कर्नाटक का विधानसभा चुनाव इस बार सामान्य नहीं है. कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सफलता, उसका जनाधार असल में इस मिथक को तोड़ता है कि भाजपा हिंदी बेल्ट की पार्टी है. हमेशा से कर्नाटक को दक्षिण भारत का द्वार माना जाता है. भाजपा ने जिस तरह से तमिलनाडु में तेजी से विस्तार किया है, ऐसे में विपक्ष की बेचैनी स्वाभाविक है. भाजपा का तमिलनाडु नेतृत्व केरल की भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों से घिरी सरकार से सड़क पर लड़ाई लड़ रहा है. भारतीय जनता पार्टी यदि अपना कर्नाटक का किला बचा लेती है, तो ऐसे में सुदूर दक्षिण तक उसकी सफलता की संभावनाएं बढ़ जाएंगी. पर कर्नाटक सिर्फ राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं है. कर्नाटक इस्लामिक कट्टरपंथ और देशविरोधी ताकतों की प्रयोगशाला भी बन चुका है. कांग्रेस और जनता दल (सेक्यूलर) की इस्लाम परस्त सरकारों ने राज्य में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) जैसे प्रतिबंधित संगठन की राजनीतिक इकाई एसडीपीआई को यहां एक ताकत बना दिया है. अब आलम ये है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और जद (एस) बैकचैनल से एसडीपीआई के कैडर के सामने गिड़गिड़ाने की मुद्रा में हैं. चाहे हिजाब का मसला रहा हो, या फिर मुखर हिंदू युवा नेताओं की हत्या, या फिर स्कूलों में हिजाब पहनाने की जिद का मामला, इस्लामिक ताकतों ने कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ मिलकर कर्नाटक में भाजपा को हिलाने की हरसंभव कोशिश की है.

कर्नाटक के हालात को इस तरह से समझिए कि मौलाना तय कर रहे हैं कि कांग्रेस को कितने टिकट मुसलमानों को देने चाहिए. कांग्रेस ने 224 में से 14 मुसलमानों को टिकट दिया है. कर्नाटक सुन्नी उलेमा बोर्ड ने बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके कांग्रेस को धमकी दी कि 23 से कम टिकट मुसलमानों को दिए गए, तो अंजाम भुगतने होंगे. जनता दल एस ने मुसलिम कट्टरपंथी संगठनों की मांग मानते हुए कुल 24 मुसलमानों को टिकट दिए हैं. इतना ही नहीं, प्रदेश अध्यक्ष भी मुसलमान बनाया है. कर्नाटक में बहुत कांटे की लड़ाई है. यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं है. इस लड़ाई में कट्टरपंथी ताकतें, देश विरोधी संगठन, तुष्टिकरण के लिए घुटनों के बल बैठे राजनीतिक संगठनों का गठजोड़ भाजपा के विजयरथ को रोकने की कोशिश कर रहा है. आपको समझना होगा कि कर्नाटक से कश्मीर तक ये गठजोड़ काम कर रहा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Topics: नकली मोर्चेदेश विरोधी ताकतेंचुनावी मुद्दाकर्नाटक विधानसभा चुनावविधानसभा चुनाव2023karnataka assembly electionsKashmir issueanti-nationalAnti-national frontArticle 370Fake frontsAssembly Elections 2023Election issueJihadiकश्मीर का मुद्दाजिहादीअनुच्छेद370terrorदेश विरोधियों का मोर्चाआतंकदेश विरोधीanti-national forces
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