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धागों ने धोया गरीबी का दाग

कर्नाटक के बेलगाम में ‘जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र’ चलता है। यहां प्रशिक्षित महिलाएं राखियां बनाती हैं और संघ के गणवेश सिलती हैं। यहां 1,272 महिलाएं स्वावलंबी बन चुकी हैं

अश्वनी मिश्रअरुण कुमार सिंहWritten byअश्वनी मिश्रandअरुण कुमार सिंह
Apr 21, 2023, 05:54 pm IST
in भारत, संघ @100, कर्नाटक
बेलगाम स्थित सेवा भारती के केंद्र में सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण प्राप्त करतीं महिलाएं

बेलगाम स्थित सेवा भारती के केंद्र में सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण प्राप्त करतीं महिलाएं

‘जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र’ से कुछ रास्ता निकल सकता है। वह वहां गईं। अपनी व्यथा बताने के बाद उन्होंने कुछ करने की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद केंद्र में उन्हें राखी बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। अब वह सालभर राखियां ही बनाती हैं। इस काम में उनके साथ ममता पुजारी, मंजुला पट्टार, गीता नंदीहल्ली भी हैं।

कहा जाता है कि गरीबी से बुरी और कोई चीज नहीं होती और जो इस गरीबी से मुक्ति दिलाए, वह भगवान से कम नहीं होता। कुछ ऐसा ही कहना है बेलगाम (कर्नाटक) की गीता कापलुसकर का। 55 वर्षीया गीता विधवा हैं। बेलगाम की एक झुग्गी में रहने वाली गीता ने मजदूरी करके अपने इकलौते बेटे को पाला-पोसा और बड़ा किया।

बेलगाम स्थित सेवा भारती के केंद्र में सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण प्राप्त करतीं महिलाएं

जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र

बेटा कुछ करता उससे पहले ही वह भी अपनी मां को अकेला छोड़कर इस दुनिया से चल बसा। इसके बाद तो गीता लगभग टूट-सी गईं। कई महीने बाद वह बेटे के गम से उबर पाईं। अब सवाल था कि भरण-पोषण कैसे हो? उन्हीं दिनों उन्हें पता चला कि ‘जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र’ से कुछ रास्ता निकल सकता है। वह वहां गईं। अपनी व्यथा बताने के बाद उन्होंने कुछ करने की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद केंद्र में उन्हें राखी बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। अब वह सालभर राखियां ही बनाती हैं। इस काम में उनके साथ ममता पुजारी, मंजुला पट्टार, गीता नंदीहल्ली भी हैं।

इस काम से हर महिला को प्रतिमाह 5,000 रु. की आमदनी हो जाती है। इनके द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 8,00,000 राखियां बनाई जा रही हैं। इन राखियों को रक्षाबंधन से पहले कुछ तय दुकानदारों को दे दिया जाता है। वे लोग इन राखियों को यह कहकर बेचते हैं कि इन्हें गरीब महिलाओं ने बनाया है। इस कारण उन राखियों की बिक्री आसानी से हो जाती है। कुछ राखियां संघ के आनुषंगिक संगठन खरीद लेते हैं। यानी राखियों को बेचने की कोई समस्या नहीं है।

अनेक महिलाएं सालभर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गणवेश बनाती हैं। ये गणवेश पूरे कर्नाटक के संघ कार्यालयों में जाते हैं। इस काम में सेवा भारती क कार्यकर्ता उनकी मदद करते हैं। कह सकते हैं कि ‘जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र’ ने न केवल महिलाओं को प्रशिक्षित किया, बल्कि उनके लिए काम की भी व्यवस्था की है।

गीता, ममता, मंजुला जैसी सैकड़ों महिलाओं को गढ़ने वाले ‘जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र’ की स्थापना सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने 2010 में यानी आज से 13 वर्ष पूर्व की थी। इस केंद्र में गरीब और असहाय महिलाओं को हुनरमंद बनाया जा रहा है, ताकि वे स्वावलंबी बन सकें। केंद्र में सिलाई-कढ़ाई, फैशन डिजाइनिंग, कंप्यूटर, योग आदि का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।

कर्नाटक उत्तर प्रांत, सेवा भारती की महिला प्रमुख शिल्पा वरनेकर ने बताया, ‘‘अब तक केंद्र से 1,272 महिलाओं ने अलग-अलग विधाओं का प्रशिक्षण लिया है। इनमें से 70 प्रतिशत महिलाएं अपना काम करती हैं। बाकी 30 प्रतिशत महिलाएं कहीं नौकरी करती हैं।’’ उन्होंने यह भी बताया कि अनेक महिलाएं सालभर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गणवेश बनाती हैं।

ये गणवेश पूरे कर्नाटक के संघ कार्यालयों में जाते हैं। इस काम में सेवा भारती क कार्यकर्ता उनकी मदद करते हैं। कह सकते हैं कि ‘जागृति महिला स्वावलंबन केंद्र’ ने न केवल महिलाओं को प्रशिक्षित किया, बल्कि उनके लिए काम की भी व्यवस्था की है।

अब ये महिलाएं कुछ कमाने लगी हैं, इसलिए अपने बच्चों को पढ़ने भी भेज रही हैं। इनमें यह भी विश्वास जगा है कि समाज उनके साथ है। यही विश्वास उनके जीवन की राह को और आसान बना रहा है।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसेवा भारतीजागृति महिला स्वावलंबन केंद्रJagruti Mahila Swavalamban Kendrathreads washed away the stain of poverty
अश्वनी मिश्र
अश्वनी मिश्र
@kashmirashwaniअश्वनी मिश्र भारत की सबसे पुरानी और व्यापक रूप से प्रसारित राष्ट्रवादी हिंदी साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं. देश के ज्वलंत मुद्दों की ग्राउंड रिपोर्ट करने के साथ ही मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा एवं राजनीतिक मुद्दों के बारे में लिखते हैं. जम्मू—कश्मीर, पश्चिम बंगाल एवं आतंकरोधी घटनाक्रम विशेष रुचि के क्षेत्र हैं. देश की विभिन्न राजनीतिक घटनाओं पर तीक्ष्ण नजर रखते हुए उनका समग्र विश्लेषण पत्रकारिता जगत में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भारतीय राजनीति, समाज, खेल, मानवाधिकार क्षेत्र की विशिष्ट विभूतियों से निरंतर साक्षात्कार और चर्चा उनके पत्रकारीय अनुभव को मजबूत बनाती हैं. उनके अनेक आलेखों पर देश के राजनीतिक गलियारों में एक नरैटिव खड़ा हुआ. विभिन्न प्रासंगिक विषयों की रिपोर्ट और आलेखों को संसद के पुस्तकालय में संग्रहणीय तौर पर शामिल किया गया. बंगाल की चुनावी हिंसा की ग्राउंड रिपोर्ट एवं उसके पहले की अनेक हिंसाओं में पीड़ितों के जीवंत साक्षात्कार देशभर में सराहे गए. सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थित विशेष दर्जा रखती है. [Read more]
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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