रामनवमी पर विशेष : भारत की आत्मा और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं श्रीराम
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रामनवमी पर विशेष : भारत की आत्मा और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं श्रीराम

दुनिया के अनेक देशों के लोग भी उन्हें भगवान और मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए पूजते रहे हैं। वे भारत की पहचान और राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Mar 28, 2023, 11:56 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
मर्यादा पुरूषोत्तम

मर्यादा पुरूषोत्तम

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष नवमी को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में रामनवमी का त्यौहार अपार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

समस्त भारतवर्ष में प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष नवमी को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में रामनवमी का त्यौहार अपार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में उत्सवों का विशेष आयोजन होता है, जिनमें भाग लेने के लिए देशभर से हजारों भक्त अयोध्या पहुंचते हैं तथा अयोध्या स्थित सरयू नदी में पवित्र स्नान कर पंचकोसी की परिक्रमा करते हैं। समूची अयोध्या नगरी इस दिन पूरी तरह राममय नजर आती है और हर तरफ भजन-कीर्तनों तथा अखण्ड रामायण के पाठ की गूंज सुनाई पड़ती है। देशभर में अन्य स्थानों पर भी जगह-जगह इस दिन श्रद्धापूर्वक हवन, व्रत, उपवास, यज्ञ, दान-पुण्य आदि विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

दरअसल श्रीराम भारत की बहुसंख्यक आबादी के आराध्यदेव हैं। श्रीराम न सिर्फ हिन्दुओं अथवा भारतवासियों के लिए परम पूजनीय हैं बल्कि दुनिया के अनेक देशों के लोग भी उन्हें भगवान और मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए पूजते रहे हैं। वे भारत की पहचान और राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं। वर्ष 2020 में लॉकडाउन के दौरान दूरदर्शन पर प्रसारित की गई ‘रामायण’ देखने के बाद तो नई पीढ़ी के बच्चे भी मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के पावन चरित्र के मुरीद हो गए। दरअसल श्रीराम के आदर्श, उनका अनुकरणीय और आज्ञापालक चरित्र तथा रामायण काल के अन्य सभी पात्रों की अपार निष्ठा, भक्ति, प्रेम, त्याग एवं समर्पण अपने आप में अनुपम है और नई पीढ़ी को धर्म एवं आदर्शों की प्रेरणा देने के साथ-साथ उसमें जागरूकता का संचार करने के लिए भी पर्याप्त है।

विभिन्न हिन्दू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि श्रीराम का जन्म नवरात्र के अवसर पर नवदुर्गा के पाठ के समापन के पश्चात् हुआ था और उनके शरीर में मां दुर्गा की नवीं शक्ति जागृत थी। मान्यता है कि त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या के महाराजा दशरथ की पटरानी महारानी कौशल्या ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को जन्म दिया था। वाल्मिकी रामायण के अनुसार, ‘‘भगवान श्रीराम चन्द्रमा के समान अति सुंदर, समुद्र के समान गंभीर और पृथ्वी के समान अत्यंत धैर्यवान थे तथा इतने शील सम्पन्न थे कि दुखों के आवेश में जीने के बावजूद कभी किसी को कटु वचन नहीं बोलते थे। वे अपने माता-पिता, गुरूजनों, भाईयों, सेवकों, प्रजाजनों अर्थात् हर किसी के प्रति अपने स्नेहपूर्ण दायित्वों का निर्वाह किया करते थे। माता-पिता के प्रति कर्त्तव्य पालन एवं आज्ञा पालन की भावना तो उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उनकी कठोर से कठोर आज्ञा के पालन के लिए भी वह हर समय तत्पर रहते थे।’’

श्रीराम का चरित्र बेहद उदार प्रवृत्ति का था। उन्होंने उस अहिल्या का भी उद्धार किया, जिसे उसके पति ने देवराज इन्द्र द्वारा छलपूर्वक उसका शीलभंग किए जाने के कारण पतित घोषित कर पत्थर की मूर्त बना दिया था। जिस अहिल्या को निर्दोष मानकर किसी ने नहीं अपनाया, उसे भगवान श्रीराम ने अपनी छत्रछाया प्रदान की। लोगों को गंगा नदी पार कराने वाले एक मामूली से नाविक केवट की अपने प्रति अपार श्रद्धा व भक्ति से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने उसे अपने छोटे भाई का दर्जा दिया और उसे मोक्ष प्रदान किया। अपनी परम भक्त शबरी नामक भीलनी के झूठे बेर खाकर शबरी का कल्याण किया।

महारानी केकैयी ने महाराजा दशरथ से जब राम को 14 वर्ष का वनवास दिए जाने और अपने लाड़ले पुत्र भरत को राम की जगह राजगद्दी सौंपने का वचन मांगा तो दशरथ गंभीर धर्मसंकट में फंस गए थे। वह बिना किसी कारण राम को 14 वर्ष के लिए वनों में भटकने के लिए भला कैसे कह सकते थे और श्रीराम में तो वैसे भी उनके प्राण बसते थे। दूसरी ओर वचन का पालन करना रघुकुल की मर्यादा थी। ऐसे में जब श्रीराम को माता केकैयी द्वारा यह वचन मांगने और अपने पिता महाराज दशरथ के इस धर्मसंकट में फंसे होने का पता चला तो उन्होंने खुशी-खुशी उनकी यह कठोर आज्ञा भी सहज भाव से शिरोधार्य की और उसी समय 14 वर्ष का वनवास भोगने तथा छोटे भाई भरत को राजगद्दी सौंपने की तैयारी कर ली। श्रीराम द्वारा लाख मना किए जाने पर भी उनकी पत्नी सीता जी और अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ वनों में निकल पड़े।

वनवास की यात्रा की शुरूआत श्रृंगवेरपुर नामक स्थान से प्रारंभ कर वहां से वे भारद्वाज मुनि के आश्रम में चित्रकूट पहुंचे। उसके बाद विभिन्न स्थानों की यात्रा के दौरान पंचवटी में उन्होंने अपनी कुटिया बनाने का निश्चय किया। यहीं पर रावण की बहन शूर्पणखां की नाक काटे जाने की घटना हुई। उसी घटना के कारण वहां खर-दूषण सहित 14000 राक्षस राम-लक्ष्मण के हाथों मारे गए। यहीं से श्रीराम व लक्ष्मण की अनुपस्थिति में लंका का राजा रावण माता सीता का अपहरण कर उन्हें अपने साथ लंका ले गया।

कहा जाता है कि जब सीता का विरह श्रीराम से नहीं सहा गया तो उन्होंने साधारण मनुष्य की भांति विलाप किया लेकिन हिम्मत न हारते हुए सीता जी की खोज में राम-लक्ष्मण जंगलों में भटकने लगे। उसी दौरान उनकी भेंट श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान से हुई, जिन्होंने राम-लक्ष्मण को वानरराज बाली के छोटे भाई सुग्रीव से मिलाया, जो उस समय बाली के भय से यहां-वहां छिपता फिर रहा था। श्रीराम ने बाली का वध करके सुग्रीव तथा बाली के पुत्र अंगद को किष्किंधा का शासन सौंपा और उसके बाद सुग्रीव की वानरसेना के नेतृत्व में लंका पर आक्रमण कर देवताओं पर भी विजय पाने वाले महाप्रतापी, महाबली, महापंडित तथा भगवान शिव के घोर उपासक लंका नरेश राक्षसराज रावण का वध कर सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया और लंका पर खुद अपना अधिकार न जमाकर लंका का शासन रावण के छोटे भाई विभीषण को सौंप दिया तथा वनवास की अवधि समाप्त होने पर भैया लक्ष्मण, सीता जी व हनुमान सहित अयोध्या लौट आए।

वास्तव में विधि के विधान के अनुसार राम को दुष्ट राक्षसों का विनाश करने के लिए ही वनवास मिला था। उन्होंने अपने मानव अवतार में न तो भगवान श्रीकृष्ण की भांति रासलीलाएं खेली और न ही कदम-कदम पर चमत्कारों का प्रदर्शन किया बल्कि उन्होंने सृष्टि के समक्ष अपने क्रियाकलापों के जरिये ऐसा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी वजह से उन्हें ‘मर्यादा पुरूषोत्तम’ कहा गया।
जहां तक राम-रावण के बीच हुए भीषण युद्ध की बात है तो वह सिर्फ दो राजाओं के बीच का सामान्य युद्ध नहीं था बल्कि दो विचारधाराओं का संघर्ष था, जिसमें एक मानव संस्कृति थी तो दूसरी राक्षसी संस्कृति। एक ओर क्षमादान की भावना को महत्व देने वाले व जनता के दुख-दर्द को समझने एवं बांटने वाले वीतरागी भाव थे तो दूसरी ओर दूसरों का सब कुछ हड़प लेने की राक्षसी प्रवृत्ति। रावण अन्याय, अत्याचार व अनाचार का प्रतीक था तो श्रीराम सत्य, न्याय एवं सदाचार के। यही नहीं, सीता जी के अपहरण के बाद भी श्रीराम ने अपनी मर्यादाओं को कभी तिलांजलि नहीं दी। उन्होंने उसके बाद भी रावण को एक महाज्ञानी के रूप में सदैव सम्मान दिया और यह इससे साबित भी हुआ कि रावण की मृत्यु से कुछ ही क्षण पूर्व श्रीराम ने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान अर्जन के लिए भेजा था।

मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम में सभी के प्रति प्रेम की अगाध भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनकी प्रजा वात्सल्यता, न्यायप्रियता और सत्यता के कारण ही उनके शासन को आज भी ‘आदर्श’ शासन की संज्ञा दी जाती है और आज भी अच्छे शासन को ‘रामराज्य’ कहकर परिभाषित किया जाता है। ‘रामराज्य’ यानी सुख, शांति एवं न्याय का राज्य। रामनवमी पर्व वास्तव में मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम की गुरू सेवा, माता-पिता की सेवा व आज्ञापालन, जात-पात के भेदभाव को मिटाने, क्षमाशीलता, भ्रातृप्रेम, पत्नीव्रता, न्यायप्रियता आदि विभिन्न महान् आदर्शों एवं गुणों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Topics: Manasश्रीरामचरित मानसन्यायप्रियतामानसमर्यादा पुरूषोत्तमShukla Paksha Navamimaanasशुक्ल पक्ष नवमीbirth anniversary of Lord Shriramरामनवमी पर विशेषभगवान श्रीराम के जन्मोत्सवPanchkosi after taking holy bathपवित्र स्नान कर पंचकोसीAyodhya cityअयोध्या नगरीHindu scripturesहिन्दू धर्मग्रंथsalvation of Ahalya toojusticeअहिल्या का भी उद्धारforgivenessMaryada Purushottamक्षमाशीलताfraternal loveगोस्वामी तुलसीदासभ्रातृप्रेमwifelinessरामचरित मानसपत्नीव्रता
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