गौ भक्तों का बलिदान पर्व आज : जब 4 गौ भक्तों को फांसी और 135 को दी गई थी कालेपानी की सजा
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गौ भक्तों का बलिदान पर्व आज : जब 4 गौ भक्तों को फांसी और 135 को दी गई थी कालेपानी की सजा

हरिद्वार में मज़हबी गौ हत्यारों ने बकरीद पर सार्वजनिक रूप से गौ हत्या की घोषणा की थी, लेकिन गौ भक्तों ने सभी गायों को बचा लिया था। इसको लेकर जमकर विवाद भी हुआ था।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो
Feb 8, 2023, 10:26 am IST
inभारत, उत्तराखंड
बलिदान स्थल

बलिदान स्थल

गाय माता सनातन हिन्दू धर्म का मुख्य मानबिंदु, भारतीय संस्कृति का प्रतीक, देश के आर्थिक ढांचे का आधार स्तंभ और हिन्दुओं के जीवन का मुख्य सहारा और आत्मा है। जिस प्रकार प्राण के बिना शरीर स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार भारत देश और इसकी अर्थव्यवस्था, संस्कृति, संस्कार सब गाय पर निर्भर और आधारित है। मनुष्य अपने प्राणों की रक्षा के लिए विरोधी पर प्रहार करता है, उसके प्राण तक लेने को आतुर हो जाता है, उसी प्रकार गाय माता की रक्षा के लिए भी समय-समय पर हिन्दुओं ने अपने प्राणों की बाजी लगायी है। जिस प्रकार किसी मनुष्य का अपनी आत्मरक्षा में हमलावर पर प्रतिकार में घात करना कानून की दृष्टि मे अपराध नहीं है, उसी प्रकार गौरक्षा भी अपनी आत्मा की ही तो रक्षा है।

“अन्तकाय गौघातम्”
अर्थात – “गौघातक को प्राण दण्ड हो.”
“यजुर्वेद.”
“यदि नो गां हंसि यंधश्वंयदि पुरुषम्.
तं त्वां सोसेन विष्यामो यथा नो असा अवीरहा.”
अर्थात – “यदि तु हमारी गाय, घोडे तथा पुरुष का वध करेगा तो हम तुम्हे शीशे की गोली से बींध देंगे।”
“अथर्ववेद 01/16/04”

सन 1918 में ग्राम कटारपुर, हरिद्वार में मज़हबी गौ हत्यारों ने बकरीद के अवसर पर सार्वजनिक रूप से गौहत्या की घोषणा की। देवभूमि उत्तराखण्ड की मायानगरी हरिद्वार के मायापुरी क्षेत्र में ऐसा घोर अनर्थ कभी नहीं हुआ था। उक्त घोषणा पर हिन्दुओं ने स्थानीय ज्वालापुर थाने पर शिकायत की, परन्तु वहां के थानेदार मसीउल्लाह तथा अंग्रेज प्रशासन की शह पर ही यह सब हो रहा था। हरिद्वार थाने में शिवदयाल सिंह थानेदार थे, उन्होंने हिन्दुओं को हर प्रकार से सहयोग देने का वचन दिया। हिन्दुओं ने घोषणा कर दी कि चाहे जो हो, पर गौ हत्या नहीं होने देंगे। तत्कालीन समय में 17 सितम्बर सन 1918 को बकरीद थी। हिन्दुओं के विरोध के कारण उस दिन तो कुछ नहीं हुआ। अगले दिन 18 सितम्बर सन 1918 को गौ हत्यारों ने पांच गौ माता को सार्वजनिक रूप से जुलूस निकालकर सरेआम कुर्बानी, कत्ल करने हेतु उन्हें एक इमली के पेड़ से बांध दिया। वह कट्टर मज़हबी नारे लगा रहे थे। दूसरी ओर हनुमान मंदिर के महंत रामपुरी महाराज के नेतृत्व में सैकड़ों वीर गौभक्त निर्भिक हिन्दू युवक भी अस्त्र-शस्त्रों के साथ तैयार खड़े थे। जैसे ही कुर्बानी के लिये गौ हत्यारों ने गाय माता की गर्दन पर छुरी रखी तो तैयार खड़े गौभक्तो ने “जयकारा वीर बजंरगी, हर हर महादेव” के जयकारों के साथ धावा बोल दिया और सब गाय छुड़ा लीं। लगभग तीस गौ हत्यारे मौके पर ही मारे गए। (यह संख्या का आंकडा सुनिश्चित नहीं हैं केवल जनश्रुति के आधार पर प्रस्तुत किया गया हैं) बाकी के गौ हत्यारे भाग खड़े हुए।

इस गौरक्षा के निमित्त हुई मुठभेड़ में असंख्य हिन्दू भी हताहत हुए। गौभक्त महंत रामपुरी के शरीर पर चाकुओं के 48 घाव लगे, अतः वे बच नहीं सके। पुलिस और प्रशासन को जैसे ही गौ हत्यारों के वध का पता लगा, तो वह सक्रिय हो उठा था। हिन्दुओं के घरों में घुसकर लोगों को पीटा गया, महिलाओं का अपमान किया गया। 172 लोगों को थाने में बन्द कर दिया गया। जेल का डर दिखाकर कई लोगों से भारी रिश्वत ली गयी थी। गुरुकुल महाविद्यालय के कुछ छात्र भी इसमें फंसा दिये गये थे, फिर भी हिन्दुओं का मनोबल नहीं टूटा। घटना के कुछ दिन बाद अमृतसर पंजाब में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। गुरुकुल महाविद्यालय के प्राचार्य आचार्य नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ ने वहां जाकर महात्मा गांधी को सारी बात बताई, लेकिन महात्मा गांधी शान्त रहे। महामना मदनमोहन मालवीय परम गौ भक्त थे, उनका हृदय पीड़ा से भर उठा। उन्होंने इन निर्दोष गौभक्तों पर चलने वाले मुकदमे में अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी।

8 अगस्त 1919 को न्यायालय द्वारा घोषित निर्णय में 4 गौभक्तों को फांसी और थानेदार शिवदयाल सिंह सहित 135 लोगों को कालेपानी की सजा दी गयी थी। गौरक्षा के निमित्त हुए इस महान संघर्ष में सम्मिलित गौभक्त हिन्दुओं में सभी जाति, समाज, वर्ग और अवस्था के लोग थे। जो गौभक्त अन्डमान निकोबार द्वीप पर कालेपानी की सजा हेतु भेजे गए। उनमें से अनेक भारी उत्पीड़न सहते हुए वहीं मर गये थे। महानिर्वाणी अखाड़ा कनखल के महंत रामगिरि भी प्रमुख अभियुक्तों में थे। घटना के बाद वह गायब हो गये और कभी पुलिस के हाथ नहीं आए थे। ब्रिटिश पुलिस के आतंक से डरकर अधिकांश हिन्दुओं ने गांव छोड़ दिया। अगले आठ वर्ष तक कटारपुर और आसपास के गांव में कोई फसल तक नहीं बोई गयी थी।

8 फरवरी सन 1920 को उदासीन अखाड़ा कनखल के महंत ब्रह्मदास 45 वर्ष तथा चौधरी जानकी दास 60 वर्ष को प्रयाग में, डॉ. पूर्णप्रसाद 32 वर्ष को लखनऊ एवं मुक्खा सिंह चौहान 22 वर्ष को वाराणसी जेल में फांसी दी गयी थी। चारों महान गौभक्त “गौ माता की जय” कहकर फांसी पर झूल गये। प्रयागराज में इन महान गौ भक्तों के सम्मान में उस दिन हड़ताल रखी गयी थी। इस घटना से गौरक्षा के प्रति हिन्दुओं में भारी जागृति आयी थी। महान गौभक्त लाला हरदेव सहाय ने प्रतिवर्ष 8 फरवरी को हिन्दुओं की महान शौर्य स्थली ग्राम कटारपुर में “गौ भक्तों का बलिदान पर्व” मनाने की प्रथा शुरू की थी। वहां स्थित गौरक्षा के निमित्त हुए महानतम संघर्ष और बलिदान का साक्षी वो इमली का पेड़ और गौ स्मारक आज भी उन महान गौभक्त वीरों की याद दिलाता है।

संदर्भ – घटनाक्रम के संबंध में प्रकाशित विभिन्न लेख, पुस्तक, इन्टरनेट पर सार्वजनिक रूप उपलब्ध जानकारी के स्रोत और सोशल मीडिया पर विभिन्न व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत विचारों पर आधारित एवं बलिदानी परिवारों और स्थानीय ग्रामीणों के कथन के अनुसार लेख प्रस्तुत किया गया है।

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