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आंतरिक सुरक्षा : पीएफआई प्रतिबंधित

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकी संगठन पीएफआई और इससे जुड़े संगठनों को गैरकानूनी घोषित करते हुए 5 साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। केंद्रीय एजेंसियों की दो दौर की छापेमारी के बाद सरकार ने यह कदम उठाया

नागार्जुनबिनय कुमार सिंहWritten byनागार्जुनandबिनय कुमार सिंह
Oct 3, 2022, 04:24 pm IST
in भारत, विश्व, रक्षा, विश्लेषण
केंद्रीय जांच एजेंसियां पीएफआई से जुड़े 350 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी हैं

केंद्रीय जांच एजेंसियां पीएफआई से जुड़े 350 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी हैं

आतंकी संगठन पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) और इसके सहयोगी संगठनों पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। इनकी वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट्स को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस कड़ी में पीएफआई का आधिकारिक ट्विटर अकाउंट बंद किया जा चुका है।

केंद्र सरकार ने आतंकी संगठन पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) और इसके सहयोगी संगठनों पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। इनकी वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट्स को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस कड़ी में पीएफआई का आधिकारिक ट्विटर अकाउंट बंद किया जा चुका है। बीते दिनों राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य एजेंसियों ने देशभर में पीएफआई और इससे जुड़े लोगों के ठिकानों पर छापेमारी की थी। इसमें पीएफआई के 350 गुर्गों को गिरफ्तार किया गया है। पीएफआई लंबे समय से लगातार देश को अस्थिर करने के षड्यंत्र में लगा हुआ था। लेकिन सरकार ने सख्त कदम उठाकर यह साफ कर दिया है कि देश को नुकसान पहुंचाने का इरादा रखने वाले संगठनों को बख्शा नहीं जाएगा।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पीएफआई और इससे जुडे संगठनों की गतिविधियों को देश के लिए खतरा बताते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इस इस्लामिक आतंकी संगठन और उसके सहयोगियों के विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। कर्नाटक, गुजरात, असम और उत्तर प्रदेश सरकार इस आतंकी संगठन पर प्रतिबंध की मांग कर रही थीं। महाराष्ट्र के अलावा कई राज्यों और विभिन्न मुस्लिम संगठनों ने केंद्र सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है, जबकि कांग्रेस, माकपा और राजद ने फैसले पर ही सवाल उठाया है। कांग्रेस ने तो छापेमारी के विरुद्ध पीएफआई द्वारा आहूत केरल बंद के मद्देनजर अपनी भारत जोड़ो यात्रा भी रोक दी। केरल में बंद के दौरान पीएफआई के कार्यकर्ताओं ने हिंसक प्रदर्शन किए। इन्होंने तिरुवनंतपुरम और कोट्टयम सरकारी बसों, गाड़ियों में तोड़फोड़ करने के साथ और पुलिस पर भी हमले किए। कन्नूर के मट्टनूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर भी पेट्रोल फेंका गया। राज्य पुलिस ने सैकड़ों उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है।

 

ये हैं आरोप

पीएफआई और उससे जुड़े संगठनों पर कई गंभीर आरोप हैं। सरकार का कहना है कि ये देश में आतंक फैलाने और राष्ट्र की सुरक्षा, लोक व्यवस्था को खतरे में डालने के इरादे से हिंसक और आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। यदि इनके विरुद्ध तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो ये अपनी विध्वंक गतिविधियां जारी रखेंगे. जिससे लोक व्यवस्था भंग होगी और देश का संवैधानिक ढांचा कमजोर होगा। इन पर आरोप हैं-
2047 तक भारत को इस्लामिक देश बनाने का षड्यंत्र रचना।
धन शोधन, चंदे की आड़ में हवाला व आतंकियों को वित्त पोषण।
मार्शल आर्ट की आड़ में युवकों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देना।
मुस्लिम युवाओं को प्रशिक्षण देकर आतंकी संगठनों में भर्ती करना।
कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में हिंदुओं की नृशंस हत्या।
आईएसआईएस जैसे खूंखार आतंकी संगठन के साथ गठजोड़। 
पूरे देश में कट्टर इस्लामिक साहित्य का प्रचार-प्रसार करना।
मदरसों में जिहादी तालीम का पोषण, कट्टरपंथ को बढ़ावा देना।
देश में प्रधानमंत्री सहित अनेक विभूतियों की हत्या के षड्यंत्र रचना।
शाहीन बाग जैसे इस्लामिक एजेंडे के जमघटों के लिए धन जुटाना।
देश में हिंसक व आतंकी गतिविधियों में संगठन व इसके काडर की संलिप्तता।
जिहादी घटनाओं में लिप्त अपराधियों के न्यायिक मुकदमे हेतु धन उपलब्ध कराना।
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु सहित कई राज्यों में ‘हिजाब आंदोलन’ को हवा देना।
केरल में हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं की हत्या में संलिप्तता।
देश के संवैधानिक प्राधिकार और संवैधानिक ढांचे के प्रति घोर अनादर दिखाना।

ये हैं गैरकानूनी संगठन

सरकार ने पीएफआई के आठ सहयोगी संगठनों पर भी लगाया है। इनमें रिहैब इंडिया फाउंडेशन (आरआईएफ), कैंपस फ्रंट आॅफ इंडिया (सीएफआई), आॅल इंडिया इमाम काउंसिल (एआईआईसी), नेशनल कॉन्फेडरेशन आॅफ ह्यूमन राइट्स आॅर्गनाइजेशन (एनसीएचआरओ), नेशनल वीमेंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन, केरल शामिल हैं। हालांकि एसडीपीआई जैसे इसके कुछ और संगठन हैं, जो अभी बचे हुए हैं।

डिजिटल पाबंदी भी
पीएफआई ने अपने संगठन को भंग कर दिया है। फेसबुक पर इसकी घोषणा करने वाले पीएफआई के केरल महासचिव अब्दुल सत्तार भी गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन पीएफआई की छात्र इकाई कैंपस फ्रंट आफ इंडिया ने प्रतिबंध को अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक बताते हुए सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती देने की बात कही है। बता दें कि केंद्रीय एजेंसियों ने 22 और 27 सितंबर को देशभर में पीएफआई और इसके गुर्गों के ठिकानों पर छापेमारी की थी।

पहली बार 15 राज्यों में 93 ठिकानों पर की गई छापेमारी में 106 और बाद में 247 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें अधिकांश शिक्षक-प्रोफेसर, वकील, मजदूर, कारीगर, मैकेनिक आदि हैं। इन्हें लक्षित करके संगठन में भर्ती किया गया, क्योंकि ये घरों-मुहल्लों में सहजता से आवाजाही कर सकते थे। ये नए लोगों को संगठन से जोड़ते थे। एनआईए ने आरोपियों को अदालत में पेश करते हुए बताया था कि पीएफआई एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है, जिसने युवाओं को लश्कर-ए-तैयबा, इस्लामिक स्टेट व अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों में भर्ती के लिए प्रोत्साहित किया। वहीं, ईडी का कहना था कि आरोपियों को पीएफआई के अन्य सदस्यों, हवाला, बैंकिंग चैनलों आदि के जरिए पैसे मिले, जिनका प्रयोग गैरकानूनी गतिविधियों और अपराधों को अंजाम देने के लिया गया। अधिकारियों के मुताबिक, पीएफआई को सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और यूएई से हर साल 500 करोड़ रुपये मिलते हैं।

केरल में पीएफआईके हिंसक कार्यकर्ताओं ने सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की

उतर गया मुखौटा
2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा तो इसने एनडीएफ नाम रख लिया। जब एनडीएफ पर मराड में मछुआरों को मारने का आरोप लगा तो प्रतिबंध के डर से इसने नाम बदल कर पीएफआई रख लिया। इस तरह 2006 में पीएफआई अस्तित्व में आया। इसमें सक्रिय अधिकांश कट्टरपंथी प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी व आईएम से जुड़े थे। पीएफआई की कार्यशैली प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) जैसी ही थी।

अंतर इतना था कि यह आईएम की तरह सीधे तौर पर आतंकी घटना को अंजाम देने की बजाए चोरी-छिपे सक्रिय था। इसका काम देश के अलग-अलग हिस्सों में दंगे कराना, आतंकी घटनाओं के लिए धन जुटाना और मजहब के नाम पर मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेलना था। अपने बचाव के लिए इसने कई मुखौटा संगठन भी खड़े किए, जो मुसलमानों के हित के लिए काम करने का दिखावा करते हैं। इनमें सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई), अखिल भारतीय कानूनी परिषद, सोशल डेमोक्रेटिक ट्रेड यूनियन, रिहैब इंडिया फाउंडेशन इत्यादि प्रमुख हैं।

सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से पीएफआई के काम करने के तरीकों और इसके शीर्ष पदाधिकारियों पर निगाह रखे हुए थीं। जैसे- पीएफआई द्वारा कैसे फंडिंग की जाती है? किस मॉडयूल के जरिए युवाओं को जोड़ा जाता है? कहां-कहां पर इसने अपने संबद्ध संगठनों के जरिए दंगों आदि को अंजाम दिया। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों को यह सब पता लगाने और सबूत जुटाने में समय लगा। यह सब इतना आसान नहीं था। पीएफआई मुखौटा ओढ़ कर काम कर रहा था, जैसे-रक्तदान शिविर लगाना, बच्चियों के स्कूल के लिए काम करना। यह सब वह यह दिखाने के लिए करता था कि वह एक सामाजिक संगठन है। लेकिन भीतरखाने यह देश के मुस्लिम युवाओं को जिहादी घुट्टी पिला कर आतंकी बनाने में जुटा हुआ था। भारत से 66 मुस्लिम युवाओं को इसी ने आईएसआईएस में शामिल कराया। ये पीएफआई से जुडे हुए थे।

मुखौटा संगठनों के असली काम
एसडीपीआई- यह पीएफआई की राजनीतिक शाखा है, जो चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इस पर अभी प्रतिबंध नहीं लगा है। चुनाव आयोग के पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2018-19 से अब तक इसे 11 करोड़ रुपये से अधिक चंदा मिला है। यह कन्वर्जन की फैक्टरी है। यही लव जिहाद को बढ़ावा देता है।

एनसीएचआरओ- इसके सदस्य देश में घटित होने वाली घटनाओं की जांच के लिए जाते थे और उस पर रिपोर्ट देते थे। इस संगठन के जरिए पीएफआई ने खुद को सेकुलर दिखाने का प्रयास किया। इसलिए इसमें मुसलमानों के अलावा दूसरे लोगों को भी रखा। लेकिन भीतरखाने यह नक्सलियों, खालिस्तानी आतंकियों के लिए भी काम करता था।

जूनियर फ्रंट आफ इंडिया- इसमें पीएफआई ने छोटे-छोटे बच्चों को शामिल किया था। यानी दुनिया में पहली बार बच्चों का ऐसा संगठन बनाया गया। पत्थरबाजी, दंगों और पुलिस कार्रवाई में इन बच्चों को आगे रखा जाता था, ताकि पकड़े जाने पर भी नाबालिग होने के नाते इन्हें आसानी से छुड़ाया जा सके। भाजपा नेता नुपुर शर्मा को लेकर रांची में जो उपद्रव हुए, उसमें यही संगठन सक्रिय था। उपद्रव के दौरान रणनीति के तहत अग्रिम पंक्ति में महिलाओं या नाबालिग बच्चों को रखा गया।

आल इंडिया इमाम काउंसिल- इसका काम देशभर के सारे इमामों को एक छतरी के नीचे लाना और मस्जिदों में पीएफआई से जुडेÞ कट्टरपंथी मुल्ले-मौलवियों को बिठाना था। योजना मस्जिद आने वाले अधिक से अधिक मुसलमानों को जिहादी घुट्टी पिलाने की थी। बीते कुछ समय से देश में जुमे की नमाज के बाद हिंसा की घटनाएं भी बढ़ी हैं।

सीएफआई- यह पीएफआई की छात्र इकाई है, जिसने देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अपनी जड़ें जमार्इं। कहने को तो इसका उद्देश्य देशभर के छात्रों को संगठित कर सशक्त बनाना था। लेकिन इस संगठन की आड़ में मजहबी एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा था। हिजाब विवाद में इसकी सक्रियता सामने आई। पहली बार गुजरात में बिलकिस बानो प्रकरण में पोस्टरबाजी को लेकर यह चर्चा में आया था।

आरआईएफ- कहने को तो यह एक एनजीओ है, जो देश के सबसे पिछड़े हिस्सों में भूख, बीमारियों और निरक्षरता से लड़ता है और सशक्तिकरण व सतत विकास को बढ़ावा देता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इसी साल जून में धन शोधन मामले में पीएफआई और रिहैब इंडिया फाउंडेशन के 33 खाते फ्रीज किए थे। इनमें पीएफआई के 23 खातों में 59,12,051 रुपये और आरआईएफ के 10 खातों में 9,50,030 रुपये थे।

पहली बार पाबंदी 2018 में

पीएफआई पर झारखंड सरकार ने 12 फरवरी, 2018 को पहली बार प्रतिबंध लगाया था। तब राज्य में रघुवर दास की अगुआई वाली भाजपा सरकार थी। सरकार ने अपने आदेश में कहा था कि पीएफआई का संबंध आतंकी संगठन आईएसआईएस से है। इस फैसले को पीएफआई ने रांची उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उसका कहना था कि सरकार के पास कोई सबूत नहीं है और उसने बिना कारण बताओ नोटिस दिए प्रतिबंध लगा दिया, जो संविधान के अनुच्छेद-19 द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन है। साथ ही, तर्क दिया कि राज्य सरकार ने आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम-1908 की धारा 16 के अंतर्गत प्रतिबंध लगाया है, पर यह धारा 1932 से अस्तित्व में नहीं है।
लिहाजा, न्यायालय ने पीएफआई पर लगे प्रतिबंध को 28 अगस्त, 2018 को हटा दिया और सरकारी अधिसूचना को भी रद्द कर दिया था, क्योंकि इसे राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया था। हालांकि अदालत ने सरकार से कहा था कि वह त्रुटियां दूर कर पीएफआई पर दोबारा प्रतिबंध लगा सकती है। सरकार ने यही किया और मार्च 2019 में पीएफआई को पुन: प्रतिबंधित कर दिया।

 

किसने क्या कहा?

पीएफआई और उसके सहयोगियों पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगाने के लिए गृह मंत्री अमित शाह का धन्यवाद। ऐसे लोगों को देश में रहने का अधिकार नहीं है।
– एकनाथ शिंदे, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र

सरकार ने कट्टरपंथी संगठन पीएफआई पर प्रतिबंध लगाकर अच्छा कदम उठाया है। भारत की सरजमीं कट्टरपंथी विचारधारा की सरजमीं नहीं है और न यहां ऐसी विचारधारा पनप सकती है, जिससे मुल्क की एकता-अखंडता को खतरा हो।
– मौलाना शाहबुद्दीन रजवी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया मुस्लिम जमात

यह कार्रवाई आतंकवाद को रोकने के लिए की गई है। सभी को केंद्र के इस फैसले का स्वागत करना चाहिए। देश सुरक्षित है, तो हम सुरक्षित हैं। देश किसी भी संस्था या विचार से बड़ा है।
– जैनुल आबेदीन अली खान, दीवान, मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह (अजमेर)

पीएफआई जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं है, बल्कि बेहतर होता कि उन्हें राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर उनकी आपराधिक गतिविधियों के विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाती।
– सीताराम येचुरी, महासचिव, माकपा

सरकार ने यह फैसला चुनाव को देखते हुए लिया है। इस साल कई राज्यों में चुनाव हैं। अगले साल भी बहुत सारे चुनाव हैं, उससे पहले पाबंदी लगाई गई है और वह भी पांच साल के लिए। इसके बाद पीएफआई को संगठित होने की इजाजत दे दी जाएगी?
– राशिद अल्वी, कांग्रेस

कुल मिलाकर पीएफआई आतंकी विचारधारा का पोषक है। 2012 में केरल सरकार ने एक मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय से कहा था कि पीएफआई की गतिविधियां देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं। बीते कुछ वर्षों के दौरान इस कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन ने देश के 23 राज्यों में अपनी जड़ें जमा ली हैं। देशभर में इसके लाखों कार्यकर्ता हैं। इसलिए केवल प्रतिबंध लगाना ही काफी नहीं होगा। इस विष वृक्ष को समूल नष्ट करना होगा ताकि यह दोबारा पनप नहीं सके। पहले इसका मुख्यालय केरल के कोझिकोड में था, जिसे इसने दिल्ली स्थानांतरित कर लिया। इस पर प्रतिबंध का मतलब है कि अब यह किसी भी तरह की गतिविधि न तो कर सकता है और न ही उसमें हिस्सा ले सकता है।

Topics: पीएफआईपॉपुलर फ्रंट आफ इंडियाडिजिटल पाबंदीPopular Front of India (PFI)केंद्रीय जांच एजेंसियां
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