राष्ट्रीय शिक्षा नीति: ‘स्व’ शिक्षा की ओर बढ़ते कदम
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति: ‘स्व’ शिक्षा की ओर बढ़ते कदम

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 अंग्रेजों द्वारा 1835 में लागू शिक्षा नीति को खत्म कर शिक्षा क्षेत्र को पूरी तरह भारत केंद्रित करने के उद्देश्य से बनी है। इस नीति में क्रांति में ऐसे बीज छुपे हुए हैं कि जिन बीजों के अंकुरित, पुष्पित-पल्लवित होने से भारत का ही नहीं, अपितु सारे विश्व का मार्गदर्शन करने वाली एक अत्यंत शास्त्रीय-वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होगा। आवश्यकता है इस नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 5, 2022, 11:00 am IST
inभारत, शिक्षा

भारत को 1947 में स्वतंत्रता भी प्रस्थापित व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए ही प्राप्त हुई थी। किंतु उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि व्यवस्था का परिवर्तन नहीं हुआ, व्यवस्था में भी परिवर्तन हुआ। इसलिए उसी विदेशी व्यवस्था के संचालक जब भारतीय हो गए, उसको हमने स्वातंत्र्य मान लिया किंतु ‘स्व’ का तंत्र नहीं आया।

 

मुकुल कानिटकर
संगठन मंत्री,
अखिल भारतीय
भारतीय शिक्षण मंडल

भारत में क्रांति शब्द की परिभाषा कुछ भिन्न ही है। सामान्यत: अंग्रेजी के शब्द रिवॉल्यूशन के अनुवाद के रूप में ‘क्रांति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। इस कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वीरों को क्रांतिकारी कहते हैं। केवल रक्तपात द्वारा परिवर्तन को क्रांति कहने का भाव-बोध मार्क्सवादी, साम्यवादी प्रभाव में वैचारिक विमर्श में सम्मिलित हुआ है। किंतु भारत के सांस्कृतिक चिंतन में क्रांति पूर्ण परिवर्तन को कहते हैं। जब प्रस्थापित रचना और व्यवस्था को जड़-मूल से रूपांतरित कर नई व्यवस्था की रचना होती है, तब उसे क्रांति संबोधित किया जाता है। क्रांति केवल आघात से ही नहीं होती। सहज, सरल, वैचारिक क्रांति भी संभव है।

वास्तव में भारत में परिवर्तन इसी प्रकार से होता है। भारत को 1947 में स्वतंत्रता भी प्रस्थापित व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए ही प्राप्त हुई थी। किंतु उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि व्यवस्था का परिवर्तन नहीं हुआ, व्यवस्था में भी परिवर्तन हुआ। इसलिए उसी विदेशी व्यवस्था के संचालक जब भारतीय हो गए, उसको हमने स्वातंत्र्य मान लिया किंतु ‘स्व’ का तंत्र नहीं आया। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत की स्वतंत्रता मात्र राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित रह गई। वैचारिक, भावनात्मक, राष्ट्रीय स्तर पर स्व-बोध चिंतन का परिवर्तन होना चाहिए, वह परिवर्तन भारतीय स्वतंत्रता के समय नहीं हुआ।

क्या यह शिक्षा नीति क्रांतिकारी है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को शिक्षा क्षेत्र में क्रांति करने वाली होने के कारण क्रांतिकारी शिक्षा नीति कहा जाता है, तो वहां पर हम हिंदी में क्रांति शब्द का अर्थ आमूलचूल परिवर्तन के अर्थ में करते हैं। स्वतंत्रता के समय तंत्र में परिवर्तन इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मानसिकता का निर्माण वही शिक्षा व्यवस्था कर रही थी जो 1835 से अंग्रेजों ने इस देश में लागू की थी। जब तक शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होता, तब तक बाकी तंत्र में परिवर्तन संभव नहीं है।

जब तक ‘स्व’ का तंत्र इस देश में नहीं आता, तब तक देश सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकता। इस दृष्टि से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1986 में तब तक शिक्षा नीति बनी थी, उसके बाद 1992 में कार्ययोजना बनी। उसके 34 वर्ष बाद यह शिक्षा नीति आई है, ऐसा कहते हैं। वास्तविकता में राष्ट्रीय शब्द को सही अर्थ में सार्थक करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1835 के बाद प्रथम बार आई है। अत: दासता में डालने वाली शिक्षा नीति, जो 1835 में अंग्रेजों ने भारत में लागू की थी, उसे जड़ से उखाड़कर भारत केंद्रित तंत्र का निर्माण करने वाली यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 है।

नियमन की ओर कदम
1835 में प्रथम बार शिक्षा को सरकार के नियंत्रण में लाया गया। अत: प्रशासन का दंड शिक्षा का नियंत्रण करने लगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षकों को स्वायत्तता देने की बात करती है। विद्यालय ही नहीं, आचार्यों के स्तर तक स्वायत्तता को ले जाने की बात करती है। अत: धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण को नियमन का रूप दिया जाए, यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन इस शिक्षा नीति में है। दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन है उद्देश्य को लेकर। 1835 की शिक्षा नीति में रचनाकार लॉर्ड टीवी मैकॉले ने अपने पिता को लिखे पत्र में कहा था कि ‘अंग्रेजों के लिए आवश्यक बाबू बनाने वाली शिक्षा नीति का निर्माण मैंने कर दिया है।

अब चेहरे-मोहरे से भारतीय होते हुए भी अंदर से अंग्रेज नौकरों का निर्माण यह शिक्षा करेगी।’ उस दासता-भरी शिक्षा के उद्दिष्ट से मुक्ति देने वाली यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति है। इस नीति से एक बड़ी अपेक्षा यह है कि यह नौकर निर्माण करने के स्थान पर स्वरोजगार के आधार पर नौकरी देने वाले उद्योजकों का निर्माण करने वाली बनेगी। इस अर्थ में भी यह क्रांतिकारी शिक्षा नीति है। यह शिक्षा नीति मूल रूप से शिक्षा के ढांचे को ही परिवर्तित कर आत्मनिर्भर भारत के लिए, आत्मविश्वासपूर्ण भारत का निर्माण करने वाली है।

भाषा का स्वातंत्र्य भी बहुत महत्वपूर्ण है जिसके कारण सर्वसमावेशक, पूरे 100 प्रतिशत लोगों को शिक्षा देने वाली व्यवस्था का पुनर्निमाण यह शिक्षा नीति कर रही है।

1835 से पूर्व भारत 100 प्रतिशत साक्षर था लेकिन अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था ने 88 प्रतिशत भारत को निरक्षर बना दिया और स्वतंत्रता के समय हम केवल 12 प्रतिशत साक्षर थे। 2030 तक शालेय शिक्षा में सकल पंजीयन अनुपात एक बार पुन: 100 प्रतिशत करने का संकल्प लेते हुए यह शिक्षा नीति एक नई क्रांति, सर्वसमावेशक, सर्वजन हिताय का उद्देश्य पूर्ण करने वाली है। और भी अनेक बिंदु हैं जो इस शिक्षा नीति को मूल रूप से क्रांतिकारी बनाते हैं। उन बिंदुओं को नीचे सूचीबद्ध किया गया है। इन्हें पढ़ने से हमें पता चलेगा कि क्यों हम शिक्षा नीति को मूल रूप से क्रांतिकारी बनाते हैं कि यह शिक्षा नीति सच्चे अर्थ में भारतीय शिक्षा व्यवस्था का पुनर्निर्माण करेगी और भारत अपने ‘स्व’ को जानकर सच्चे अर्थों में स्वतंत्र हो सकेगा।

क्रांति के बीज
केन्द्रीय मंत्रालय का नाम एक बार पुन: शिक्षा मंत्रालय किया गया है। भारतीयता के भाव को ध्यान में रखते हुए इस परिवर्तन का स्वागत किया जाना चाहिए। आगे सुझाव यह है कि इसमें ‘संस्कृति’ को भी जोड़ा जाए। स्वतंत्रता के समय शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय ही था। वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत लगभग 150 ऐसे संस्थान हैं जो कला शिक्षा के कार्य में संलग्न हैं। दोनों मंत्रालयों के साथ जुड़ने से शिक्षा एवं संस्कार का कार्य अधिक परिणामकारी और परिपूर्ण होगा।

भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग
अनेक वर्षों से शिक्षा क्षेत्र की मांग रही है कि शिक्षा का प्रबंधन और संचालन शिक्षकों तथा शिक्षाविदों के हाथ में होना चाहिए। इस हेतु शैक्षिक संगठनों की मांग रही है कि एक शक्तिशाली स्वायत्त राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना की जाए। इस नीति में भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग (एचईसीआई) की अनुशंसा की गई है।

आयोग का स्वरूप अधिक स्वायत्त, शक्तिशाली हो, इस हेतु शिक्षाविदों का सहभाग बढ़ाया जाए। वर्तमान स्वरूप में एचईसीआई एक स्वतंत्र निकाय होगा जिनमें प्रासंगिक क्षेत्रों में काम कर रहे प्रतिबद्ध उच्चतर श्रेणी के विशेषज्ञ होंगे जिनके पास सार्वजनिक सेवाओं में योगदान देने का विशिष्ट अनुभव होगा। एचईसीआई का भी खुद का अपना एक छोटा, स्वतंत्र निकाय होगा जिसमें उच्चतर शिक्षा में प्रसिद्ध सामाजिक सरोकारों वाले विशेषज्ञ सम्मिलित होंगे, जो एचईसीआई की सत्यनिष्ठा और प्रभावी कार्यकुशलता को संचालित करेंगे और इसकी निगरानी करेंगे। आयोग का कार्य केवल सुझाव देने वाला न होकर कार्यपालिका के रूप में है तथा सभी नियंत्रक इसके अधीन हैं। राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान उपाध्यक्ष होने से आयोग अधिक स्वायत्त होगा।

लचीलापन
शिक्षा की संरचना में लचीलापन अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा नीति में 5+3+3+4 की रचना प्रस्तुत की गई है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा को भी जोड़ा गया है। 9-12 को एकत्र सोचा गया है। इस स्तर पर विषय चुनाव में लचीले विकल्प दिए गए हैं। विज्ञान, वाणिज्य, कला शाखाओं के भेद को मिटाकर मिश्रित विषय चयन का विकल्प भी रखा गया है। 4 वर्षों में 40 विषय के गुणांक प्राप्त करने होंगे। इसमें 15 व्यावसायिक विषय होने अनिवार्य हैं। इस प्रावधान के लागू होने से शिक्षा का स्वरूप ही बदल जाएगा। उच्च शिक्षा में भी स्नातक पूर्व और स्नातक शिक्षा का प्रावधान रखा है। मल्टीपल एक्जिट का प्रावधान भी है। उसका स्वरूप शिक्षण मंडल के प्रारूप में विस्तार से दिया गया था। उसे अक्षरश: स्वीकार किया गया है।

प्रथम वर्ष की शिक्षा पूरी करने पर यदि किसी को अध्ययन छोड़ना पड़ा तो उसे प्रमाणपत्र मिलेगा। द्वितीय वर्ष की शिक्षा पूर्ण करने पर डिप्लोमा तथा 3 वर्ष पूर्ण करने पर उपाधि प्राप्त होगी। 4 वर्ष के अध्ययन के बाद प्रतिष्ठा के साथ उपाधि प्राप्त होगी। जिसने सामान्य उपाधि प्राप्त की हो, उसे 2 वर्ष का परास्नातक और जिसने 4 वर्ष की प्रतिष्ठा उपाधि प्राप्त की हो, उसे 1 वर्ष का परास्नातक पाठ्यक्रम करना पड़ेगा। इसी के साथ ‘एकेडेमिक क्रेडिट बैंक’ की स्थापना की भी व्यवस्था की गई है जो स्वागत योग्य है।

राष्ट्रीय अनुसंधान न्यास
यह एक क्रांतिकारी संकल्पना है जिसके अंतर्गत उच्च शिक्षा में अनुसंधान को नई गति मिलेगी। इससे समाजोपयोगी, उद्देश्यपूर्ण और परिणामकारी अनुसंधान होगा। न्यास की गतिविधियों में व्रत प्रकल्प के अंतर्गत कई विश्वविद्यालय राष्ट्रीय आवश्यकता के विषय पर समन्वित अनुसंधान कर सकें, यह प्रावधान भी जोड़ा जाए। इसी हेतु से भारतीय शिक्षण मंडल प्रेरित रिसर्च फॉर रिसर्जन्स फाउंडेशन भी प्रभावी कार्य कर रहा है।


पूर्ण स्वायत्तता
उच्च शिक्षा आयोग से प्रारंभ स्वायत्तता का विषय शिक्षा संस्थानों तक बढ़ाया गया है। उच्च शिक्षा में सभी महाविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने का प्रावधान नीति में है। शालेय शिक्षा में भी निजी विद्यालयों तक को अपने शुल्क निर्धारण का अधिकार देने जैसा क्रांतिकारी विचार शिक्षा नीति में है। केवल एक अनिवार्यता रखी गई है कि शिक्षा सेवाभाव से दी जाए। महाविद्यालयों को तो शैक्षिक, प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता दी गई है।

स्वयं के पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी करने का अधिकार महाविद्यालयों को दिया गया है। भारतीय शिक्षण मंडल इस स्वायत्तता का स्वागत करता है किन्तु शिक्षा के व्यापारीकरण का निदान इससे नहीं होगा। अत: उस हेतु क्रांतिकारी उपाय करने की आवश्यकता है। केवल सेवार्थ शिक्षा संस्थान चलाने की बात करना ही पर्याप्त नहीं है, व्यापारिक संस्थान खोलने की अनुमति प्रदान की जाए और उसे समाज में सही ढंग से प्रकट किया जाए ताकि अभिभावक निर्णय कर सकें कि उन्हें सेवाभावी संस्थान में प्रवेश लेना है या व्यापारिक संस्थान में।

शिक्षण विधि
वर्तमान में बालक केंद्रित शिक्षा की चर्चा होती है। इस हेतु अनेक उपाय किए गए हैं। उनमें से कई तो ऐसे हैं जो शिक्षकों को विवश करने वाले हैं। अनेक शिक्षक इन उपायों से स्वयं को बंधा अनुभव करते हैं। भारत का आदर्श अध्ययन केंद्रित तथा शिक्षक आधारित शिक्षा है। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इन दोनों बातों को महत्व दिया गया है। अध्ययन का दायित्व विद्यार्थी का है। शिक्षक तो मार्गदर्शक और सहयोग की भूमिका में होता है। 9वीं कक्षा से गुणांक व्यवस्था लगाने से अध्ययन का दायित्व छात्रों पर होगा। दूसरी ओर पाठ्यक्रम निर्धारण का दायित्व शिक्षकों पर दिया गया है। यदि दोनों अपनी भूमिकाओं का सही निर्वाह करेंगे तो गुरुकुल जैसी आदर्श शिक्षा के निर्माण की संभावना इस बीज में है।

समाज पोषण
भारत में सदैव शासन मुक्त शिक्षा व्यवस्था की बात की गई है किंतु इसका अर्थ वर्तमान के निजीकरण से नहीं रहा है। शिक्षा सदा ही समाज का दायित्व रहा है। परिचय अध्याय में नीति के मूलभूत सिद्धांतों में कहा गया है- शिक्षा एक सार्वजनिक सेवा है। अत: शिक्षा व्यवस्था समाजपोषित हो, ऐसी अपेक्षा की जाती रही है।

शिक्षा नीति में प्रशासन में समाज के सहभाग की व्यवस्था है तथा वित्त पोषण में परोपकारी गतिविधियों को पुनर्जीवित कर धन जुटाने की बात भी कही गई है। किंतु निजी के स्थान पर सामाजिक संस्थान की बात होना भी आवश्यक है। व्यापारी निजी शिक्षा संस्थानों के साथ सेवाभावी सामाजिक संस्थानों को भी गैर सरकारी होने के कारण निजी कहना और उनके नियंत्रण के लिए भी उसी मापदंड का प्रयोग उचित नहीं है। नीति में निजी/परोपकारी ऐसा शब्द प्रयोग तो हुआ है किन्तु इनका विभाजन स्पष्ट नहीं किया गया है। इस विसंगति को दूर करने से हर स्तर पर समाज के सहभाग को बढ़ाया जा सकेगा।

पारदर्शी गुणवत्तापूर्ण व्यवस्थापन
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के नियमन हेतु बने एमसीआई, आईसीएआर, बीसीआई जैसी संस्थाएं वर्तमान शिक्षा क्षेत्र के व्यापार और भ्रष्टाचार का केन्द्र बन गई हैं। शिक्षा नीति में इन संस्थाओं की भूमिका में पूर्ण परिवर्तन का प्रावधान है। ये संस्थाएं व्यावसायिक मानक निर्धारण संस्था बनेंगी, नियंत्रक नहीं। अध्ययन पूर्ण होने के बाद गुणवत्ता निर्धारण हेतु सीए एसोशिएशन के समान एक सामान्य उत्तीर्ण परीक्षा ले सकती है।

कला और सामाजिक विषय के संस्थान
कला, साहित्य में रुचि होते हुए भी केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण अनेक छात्र आईआईटी में प्रवेश लेते हैं। मौलिक विज्ञान के प्रति छात्रों का रुझान बढ़ाने हेतु 10-15 वर्ष पूर्व आईएसईआर, एनआईएसईआर जैसी संस्थाएं प्रारंभ की गई। इस शिक्षा नीति में कला तथा भाषा के क्षेत्र में इस प्रकार के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। अनुवाद के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रांसलेशन एवं इंटरप्रेटेशन-आईआईटीआई प्रारंभ किए जाएंगे।

समग्र एवं बहुआयामी शिक्षा के लिए आदर्श बहुविषयक शिक्षा एवं शोध विश्वविद्यालय (एमईआरयू) की स्थापना की जाएगी। इसी प्रकार सामाजिक शास्त्र के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस (आईआईएसएस) तथा भाषा के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट आफ लैंग्वेज एंड लिंग्वस्टिक्स (आईआईएलएल) तथा कलाओं के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट आफ लिबरल आर्ट्स (आईआईएसलए) का भी विचार किया जाना चाहिए। खेल तथा युद्ध विद्या के लिए भी राष्ट्रीय महत्व के संस्थान खोले जाने चाहिए ताकि प्रतिभा के अनुसार प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा का चयन विकल्प हर मेधावी छात्र के पास हो।

इन सारे बिंदुओं का अध्ययन करने के बाद हमें पता चलता है कि इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऐसे बीज छुपे हुए हैं कि जिन बीजों के अंकुरित, पुष्पित-पल्लवित होने से भारत ही नहीं, अपितु सारे विश्व का मार्गदर्शन करने वाली एक अत्यंत शास्त्रीय-वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था का निर्माण भारत में होने जा रहा है। आवश्यकता है प्रभावी क्रियान्वयन की। बीज में तो समूचा वृक्ष छुपा होता है।

इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंग्रेजी में 66 पन्नों में भी पूरे विश्व का मार्गदर्शन करने वाली भारतीय शिक्षा व्यवस्था का वटवृक्ष छुपा हुआ है। आवश्यकता है कि उस बीज का समुचित संगोपन किया जाए, सही ढंग से उसको अंकुरित किया जाए। सही ढंग से इस शिक्षा नीति को लागू करने वाली इच्छाशक्ति का प्रदर्शन पूरे राष्ट्र द्वारा हो। शासन को तो अपना काम करना ही है, किंतु उससे अधिक महत्वपूर्ण है कि शिक्षा जगत के भागीदार-शिक्षक, शाला और महाविद्यालय के प्रबंधक, कुलगुरुओं से प्रारंभ कर प्राचार्य तक शैक्षिक नेतृत्व और अभिभावक, समूचा समाज ही इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति के राष्ट्रीय तत्वों को समझकर उसे क्रियान्वित करने में अपना-अपना योगदान देगा तो यह क्रांतिकारी शिक्षा नीति फलीभूत होगी और सारे विश्व के लिए मार्गदर्शक होगी। यही तो सहस्राब्दियों से भारत का स्वप्न रहा है।

भारत के मन में यदि कोई आकांक्षा है तो समूची मानवता का मार्गदर्शन करने वाली शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कर विश्व का गुरु बनने की मानसिकता है। प्रथम बार किसी शासकीय अभिलेख में विश्वगुरु शब्द का प्रयोग उद्देश्य के रूप में किया गया। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतरराष्ट्रीयकरण वाले परिशिष्ट में यह कहा गया है कि भारत को एक बार पुन: विश्वगुरु बनाने के लिए समूचे विश्व से विद्यार्थी यहां शिक्षा लेने के लिए आएं, इस प्रकार की व्यवस्था का निर्माण करना इस शिक्षा नीति का उद्देश्य है। आइए, हम वास्तविक क्रांति करें, संक्रमण करें और केवल भारत में ही नहीं, समूचे विश्व में गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को मुख्यधारा की शिक्षा बनाकर इस क्रांति को साकार रूप दें।

लेखक : संगठन मंत्री,अखिल भारतीय भारतीय शिक्षण मंडल

Topics: ‘एकेडेमिक क्रेडिट बैंक’राष्ट्रीय अनुसंधान न्यासराष्ट्रीय शिक्षा नीतिभारत में परिवर्तन‘स्व’ शिक्षा की ओर बढ़ते कदमभारतीय उच्चतर शिक्षा
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