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लोकतंत्र के लिए अराजकता का इलाज जरूरी

अग्निपथ योजना का विरोध केवल एक योजना का विरोध है? नहीं, ये हर उस बदलाव को बदलने की कुचेष्टा है जो बड़े सामाजिक बदलाव का कारक बन सकती है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 27, 2022, 06:00 am IST
inभारत, सम्पादकीय

अग्निपथ योजना का विरोध केवल एक योजना का विरोध है? नहीं, ये हर उस बदलाव को बदलने की कुचेष्टा है जो बड़े सामाजिक बदलाव का कारक बन सकती है। जो लोग कह रहे हैं कि इससे रोजगार गारंटी खत्म हुई है, उन्हें यह भी बताना होगा कि उनके द्वारा जो मनरेगा के तहत रोजगार गारंटी दी गई थी, जिसे गेम चेंजर बताया गया था, उसका क्या परिणाम रहा?

अग्निपथ योजना की घोषणा होने के बाद इसका स्वागत होना चाहिए था, परंतु विरोध देखने में आ रहा है। ट्विटर पर एक सप्ताह से इससे जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, अखबारों में, चैनलों में प्राइम टाइम पर यही मुद्दा छाया है।
इस विरोध को, इसके आयामों को समझना बहुत आवश्यक है। इसके विरोध के बिंदुओं को देखें।

पहली बात, यह देखनी चाहिए कि विरोध कर कौन रहे हैं? देखने में आया है कि इसका विरोध करने वालों का क्षेत्र बिहार केंद्रित रहा। यहां के अलावा पश्चिम बंगाल, ग्वालियर, सिकंदराबाद और अन्य कुछ स्थानों पर छिटपुट विरोध प्रदर्शन हुए। कम-ज्यादा, 20 राज्यों में इसके विरुद्ध आग सुलगाई गई। देखने में आया कि जिन राज्यों में बड़े स्तर पर विरोध हुआ, वहां विरोध करने वालों का संबंध भाजपा के विरोधी राजनीतिक दलों से रहा।

दूसरे ग्वालियर, सिकंदराबाद और कुछ अन्य स्थानों, जो कोचिंग के लिए ख्यात हैं, पर कोचिंग संचालक पकड़े गए। विरोध करने वालों का जो व्यवहार सामने आया, वह हैरतअंगेज था। कुछ लोगों ने यह कहा कि उनके पास आतंकवादी बनने का भी रास्ता है। बिहार, बंगाल में ट्रेनों को रोक कर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया। इन ट्रेनों में हजारों लोग अपने जरूरी कामों से यात्रा पर थे। देशभर में 12 लाख रेलयात्री इस विरोध प्रदर्शन से प्रभावित हुए। सड़कों पर हुड़दंग हुआ।

प्रश्न उठता है कि क्या ये विरोध करने वाले वास्तव में रोजगार की कतार में थे? क्या इनका आचरण सेना, जिसमें अनुशासन और राष्ट्र रक्षा के सर्वोच्च मानदंडों की अपेक्षा रहती है, में भर्ती होने योग्य है? सैनिकों के लिए एक बात कही जाती है कि जो एक बार सैनिक बन जाता है, वह हमेशा शिष्ट रहता है। जिस शालीनता और शक्ति का सामंजस्य सैन्यबल में होता है, ये हुड़दंगी उसके कहीं आसपास भी थे क्या?

राजनीतिक गठजोड़ की बौखलाहट
दूसरी बात, विरोध करने वालों का नेतृत्व कौन कर रहे हैं? इसके पीछे छुपी राजनीतिक मंशाओं को नकारा नहीं जा सकता।

कुछ लोग राष्ट्रीय मुद्दों का लगातार राजनीतिकरण कर रहे हैं, सामाजिक सरोकारों को छोड़ राजनीतिक सरोकार साध रहे हैं। वे इसके लिए विभिन्न वर्गों को भड़का रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी जब बेरोजगारी, महंगाई पर चर्चा करते हुए लंदन में कहते हैं कि भाजपा ने पूरे देश में मिट्टी का तेल छिड़क दिया है, एक चिनगारी देश को बड़े संकट की ओर ले जा सकती है, तो वे किस तरह के संकेत दे रहे हैं? प्रियंका गांधी विरोध करने वालों को समर्थन देते हुए कहती हैं कि अग्निपथ योजना से सेना खत्म हो जाएगी जबकि आपका मकसद इस सरकार को गिराना होना चाहिए।

स्पष्ट दिखता है कि एक राजनीतिक गठजोड़ है जो बौखलाया हुआ है। बिहार में लालू प्रसाद यादव का साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया है। कांग्रेस मटियामेट हो चुकी है। कांग्रेस के युवराज से 48 घंटे पूछताछ हुई। अगला नंबर उनकी मां सोनिया गांधी का है। इससे कांग्रेस तिलमिलाई हुई है। कांग्रेसी इस जांच के खिलाफ सड़कों पर लोट कर प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं महिला कांग्रेस की अध्यक्ष नेटा डिसूजा पुलिस पर थूकते हुए, वरिष्ठ कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी पुलिसकर्मी का कॉलर पकड़ते हुए पाई गई।

कांग्रेस की इस भाव-भंगिमा को पूर्व उदाहरणों से देखिए। किसान आंदोलन में कांग्रेस ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। जिस कांग्रेस के हाथ ’84 के दंगों में सिखों के खून से सने हैं, वह भी खालिस्तानियों के सुर में सुर मिला रही है नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में कांग्रेस लोगों में भ्रम फैला कर भड़का रही थी। इस कानून में पड़ोसी देशों के धार्मिक आधार पर उत्पीड़ित लोगों को नागरिकता देने की बात थी जबकि भ्रम यह फैलाया गया कि यह मुसलमानों की नागरिकता छीनने का कानून है।

विरोध नहीं, कुचेष्टा
क्या अग्निपथ योजना का विरोध केवल एक योजना का विरोध है? नहीं, यह हर उस बदलाव को बदलने की कुचेष्टा है जो बड़े सामाजिक बदलाव का कारक बन सकती है। जो लोग कह रहे हैं कि इससे रोजगार गारंटी खत्म हुई है, उन्हें यह भी बताना होगा कि उनके द्वारा जो मनरेगा के तहत रोजगार गारंटी दी गई थी, जिसे गेम चेंजर बताया गया था, उसका क्या परिणाम रहा? उनके द्वारा प्रदत्त रोजगार की गारंटी और अग्निपथ जैसी योजना में से कौन शालीन, सम्मानजनक और संभावनाशील है? भविष्य में कौशल विकास किस तरह की योजनाओं से हो सकता है?

समाज के लिए आवश्यक है कि वह देश विरोधी राजनीति को समझे, राजनीतिक की कुचालों को समझे। परंतु कुछ चीजें सरकार को भी समझनी होंगी। अच्छी नीयत से लाई गई सुविचारित योजनाएं भी कई बार राजनीति के अखाड़े में पटखनी खा जाती हैं। भूमि सुधार कानून, नागरिकता संशोधन विधेयक, कृषि सुधार कानून-ये कुछ उदाहरण हैं कि जब दूरगामी परिणाम लाने वाली बड़ी योजनाओं के साथ सरकार आगे तो बढ़ी, परंतु अफवाह और अवसर पर पलने वाले तंत्र ने उपद्रव का एक अलग ही माहौल रच दिया

अग्निपथ योजना पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि इसमें चिकित्सकीय सुविधाओं की, पेंशन की और रोजगार की गारंटी नहीं है। यह सवाल वह आम आदमी पार्टी भी उठा रही है जो रोजगार पर बड़े-बड़े दावे करती है। इनके द्वारा प्रदत्त रोजगार की बानगी देखें। मनरेगा की तरह ही दिल्ली में दैनिक भुगतान पर युवकों को सड़कों पर खड़ा कर उनसे यातायात का उल्लंघन करने वालों को गुलाब का फूल बंटवा रही थी। प्रदूषण रोकने के लिए युवकों से वाहनों के इंजन बंद कराए जा रहे हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा इसी तरह के दैनिक भुगतान के फुटकर कामों से युवाओं को बहकाया जा रहा था। क्या इन फुटकर कामों में चिकित्सकीय सुविधा का प्रावधान था, क्या इनमें पेंशन की व्यवस्था थी, क्या ये स्थायी रोजगार की गारंटी दे रहे थे? और तो और, जिन सरकारी कर्मचारियों की कोविड के दौरान मृत्यु हुई, उनके परिजनों को राहत भी सुनिश्चित न कर पाने वाली आम आदमी पार्टी लोगों को भड़काने का काम कर रही है।

राष्ट्रीय चिंता और सबक
बहरहाल, किसी भी सरकारी योजना के पक्ष, विपक्ष हो सकते हैं, खूबियां और खामियां हो सकती हैं। परंतु देश की बात करते समय, समाज का विचार करते समय इस पक्ष-विपक्ष की केंद्रीय चिंता राष्ट्रीय होनी चाहिए। यह चिंता राजनीतिक नहीं हो सकती। राजनीतिक दलों को सामाजिक व्यवस्थाओं को अस्तव्यस्त करने, विभिन्न वर्गों को बरगलाने या शासकीय तंत्र या व्यवस्था को ढहाने की छूट नहीं दी जा सकती। यह विशुद्ध अराजकता है जिसका लोकतंत्र से कोई लेना-देना नहीं है। लोकतंत्र को ठीक रखना है तो इनका इलाज करना होगा।

समाज के लिए आवश्यक है कि वह देश विरोधी राजनीति को समझे, राजनीतिक की कुचालों को समझे। परंतु कुछ चीजें सरकार को भी समझनी होंगी। अच्छी नीयत से लाई गई सुविचारित योजनाएं भी कई बार राजनीति के अखाड़े में पटखनी खा जाती हैं। भूमि सुधार कानून, नागरिकता संशोधन विधेयक, कृषि सुधार कानून-ये कुछ उदाहरण हैं कि जब दूरगामी परिणाम लाने वाली बड़ी योजनाओं के साथ सरकार आगे तो बढ़ी, परंतु अफवाह और अवसर पर पलने वाले तंत्र ने उपद्रव का एक अलग ही माहौल रच दिया, जिससे सरकार को कदम वापस खींचने पड़े।

किसान आंदोलन के तहत राजधानी दिल्ली को 375 दिन बंधक रखा गया। कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने 30 नवंबर, 2021 को दावा किया था कि इस आंदोलन के कारण 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबारी नुकसान हुआ। इसी तरह, सीएए कानून के विरुद्ध हिंसक आंदोलन से हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति की क्षति और कारोबारी नुकसान हुआ। अग्निपथ योजना के विरोध के दौरान 21 ट्रेनें जला दी गई जिससे रेलवे को अनुमानत: 1000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान झेलना पड़ा है।

पूर्व की इन घटनाओं से मिली सीख यह है कि बड़ी योजनाओं के लिए बड़ा जनमत और सकारात्मक माहौल बहुत आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है कि घोषणाओं से पूर्व उससे प्रभावित होने वाले पक्षों के मन टटोले जाएं, अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया जाए और सहमति के सूत्र पकड़ते हुए बड़े परिवर्तनों की राह पर आगे बढ़ा जाए। बड़े, गेमचेंजर फैसले, चाहे वह कितने ही अच्छे, सदिच्छाओं से परिपूर्ण और दूरगामी परिणाम लाने वाले क्यों न हों, यदि चौंकाने वाले ढंग से सामने रखे जाते हैं, तो उपद्रव की राजनीति को अचानक ताकत भी दे सकते हैं।

@hiteshshankar

Topics: अग्निपथ योजनादेश विरोधी राजनीतिसामाजिक बदलावराष्ट्रीय चिंताभूमि सुधार कानूननागरिकता संशोधन विधेयककृषि सुधार कानून
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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