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27 मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थी ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’

ऐसे अनेक साक्ष्य हैं, जो बताते हैं कि कुतुब मीनार ‘ध्रुव स्तंभ’ थी और उसके परिसर में मौजूद ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’ को 27 हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से बनाया गया था।

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Apr 20, 2022, 08:15 am IST
inभारत, दिल्ली
कुतुब मीनार परिसर स्थित ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’

कुतुब मीनार परिसर स्थित ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’

ऐसे अनेक साक्ष्य हैं, जो बताते हैं कि कुतुब मीनार ‘ध्रुव स्तंभ’ थी और उसके परिसर में मौजूद ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’ को 27 हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से बनाया गया था।

इतिहास गवाह है कि दुनिया में इस्लाम का प्रसार तलवार के बल पर हुआ। इस्लामी लुटेरे जहां भी गए, वहां उन्होेंने लोगों को मारा-काटा और इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया। यही नहीं, लोगों के मनोबल और स्वाभिमान को गिराने के लिए उनके पूजा-स्थलों को ध्वस्त किया और उनके मलबे से मस्जिदों का निर्माण किया। इस्लामी लुटेरों ने भारत मेें भी यही किया। अभी भी भारत में सैकड़ों ऐसी मस्जिदें हैं, जिनकी दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं के चित्र या सनातन धर्म के अन्य प्रतीक चिह्न दिखाई देते हैं।

इन दिनों ऐसी ही एक मस्जिद की चर्चा गर्म है। यह मस्जिद है ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’, जो नई दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में है। ‘कुव्वतुल इस्लाम’ का अर्थ है-इस्लाम की ताकत। यानी इस मस्जिद को बनाने का मकसद था हिंदुओं को इस्लाम की ताकत का अहसास कराना। कई देशी और विदेशी इतिहासकारों ने लिखा है कि इस मस्जिद का निर्माण 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। यही नहीं, भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) ने भी वहां पर जो सूचना पट लगाया है, उस पर लिखा है कि यह मस्जिद 27 मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थी। फिलहाल यह मस्जिद एएसआई की देखरेख में है। इसमें किसी को नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है।

अनेक पुस्तकों में मिले साक्ष्यों के आधार पर लगभग सवा साल पहले नई दिल्ली के साकेत स्थित सत्र न्यायालय में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें मांग की गई है कि इस मस्जिद में हिंदुओं को पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। यह याचिका तीन लोगों ने दाखिल की है। इनमें से दो हरिशंकर जैन और रंजना अग्निहोत्री अधिवक्ता हैं। तीसरे हैं सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह ‘बिशेन’। हरिशंकर जैन ने अपने को तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव का वाद मित्र और रंजना अग्निहोत्री ने भगवान श्रीविष्णु का वाद मित्र माना है। वहीं जितेंद्र सिंह ‘बिशेन’ एक भक्त के नाते इस याचिका में शामिल हैं।
याचिका में अदालत से मुख्य रूप से यह प्रार्थना की गई है कि यह उद्घोषित किया जाए कि पुरातत्व विभाग (नोटिफिकेशन नंबर डीएल 387, 16.01.1914) द्वारा दर्शाई गई जगह पर तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और भगवान विष्णु को भगवान गणेश, भगवान शिव, मां गौरी, सूर्य देवता, हनुमान जी के साथ 27 मंदिरों को पुन: प्रतिष्ठापित कराने का अधिकार है, जिसमें कि पूजा-दर्शन सारे अनुष्ठानों के साथ संपन्न की जा सके।

यह भी मांग की गई है कि भारत सरकार को एक न्यास स्थापित करने के लिए कहा जाए और उस न्यास को कुतुब परिसर में स्थित मंदिर परिसर के रखरखाव का अधिकार दिया जाए। यह भी कहा गया है कि जो भी न्यास बने, उसे 27 हिंदू जैन मंदिरों और ‘ध्रुव स्तंभ’ की देखरेख और प्रशासन का अधिकार दिया जाए। एएसआई एक्ट 1958 की धारा 16 और 19 के तहत पूजा करने का अधिकार भी मांगा गया है।

याचिका में वर्तमान परिसर को तोड़ने की बात नहीं कही गई है, बल्कि यह कहा गया है कि जो ढांचा खड़ा है, जिसमें कि पहले पूजा-पाठ होता था, वहां एएसआई के अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत धार्मिक अधिकार बहाल किया जाए। इस अधिनियम में यह स्पष्ट प्रावधान है कि पुरातत्व विभाग द्वारा कब्जे में ली गई संपत्ति में धार्मिक कार्य हो सकते हैं तथा आवश्यक निर्माण कार्य भी भवन को बिना क्षति पहुंचाए किया जा सकता है।

याचिका के अनुसार दिल्ली का मूल नाम इंद्रप्रस्थ है। इसमें मिहिरावली, जिसे अब महरौली कहते हैं, एक मुख्य शहर था। इस स्थान का नामकरण गणितज्ञ वराहमिहिर के नाम पर हुआ है, जो चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के मंत्रिमंडल के मुख्य पदाधिकारी थे।
इस स्थान पर गणित और ज्योतिषीय ज्ञान व गणना के लिए नक्षत्रशाला का निर्माण किया गया था, जिसे ‘मेरु स्तंभ’ या ‘ध्रुव स्तंभ’ कहा जाता है। और इसी स्थान के साथ में 27 हिंदू और जैन मंदिरों तथा भगवान विष्णु के मंदिर का निर्माण उन नक्षत्रों के अध्ययन के लिए नक्षत्र देवताओं के साथ हुआ था। यह ‘मेरु स्तंभ’ देवताओं को समर्पित था। जब कुतुबुद्दीन के हाथ में सत्ता आई तब से इस ‘मेरु स्तंभ’ को ‘कुतुब मीनार’ कहा जाने लगा। अरबी में ‘कुतुब’ का मतलब किसी धुरी पर घूमना या संतुलित करने को कहा जाता है और ‘स्तंभ’ को ‘मीनार’ कहा जाता है। इसीलिए ‘कुतुब मीनार’ कहा जाता है। इतिहासकार गुंजन अग्रवाल के अनुसार, ‘‘मेरु स्तंभ पर 12वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुरान की आयतें उत्कीर्ण करवा दीं। उसके बाद से इसे कुतुब मीनार कहा जाने लगा।’’ कुतुब मीनार परिसर में 1,600 वर्ष पुराना लौह स्तंभ है जिसे ‘विष्णु स्तंभ’ या ‘गरुड़ ध्वज’ कहा जाता है।

हरिशंकर जैन कहते हैं, ‘‘1192 ई. तक दिल्ली हिंदू राजाओं के द्वारा शासित होती थी। तराइन की दूसरी लड़ाई में मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली। उन्हीं दिनों कुतुबुद्दीन ऐबक, जो मोहम्मद गोरी का सेनापति था, ने श्री विष्णु हरि मंदिर और अन्य 27 जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़कर उन्हीं के मलबे से एक ढांचा खड़ा किया, जिसे ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’ का नाम दिया गया।’’

27 मंदिर असल में 27 नक्षत्रशालाओं के मंदिर थे। यह जगह बहुत ही महत्वपूर्ण थी और ज्योतिषशास्त्र के शोध का बहुत बड़ा केंद्र था।

 

27 नक्षत्रों का अवलोकन किया जाता था

72.5 मीटर (238 फीट) ऊंचे ध्रुव स्तंभ (कुतुब मीनार) और उसके परिसर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित कर रखा है। ध्रुव स्तंभ में 27 झरोखे बने हुए हैं, जहां से वराहमिहिर 27 नक्षत्रों का अवलोकन किया करते थे। स्तंभ के शीर्ष पर जाने के लिए लगभग 380 सीढ़ियां और स्तंभ के प्रत्येक तल पर बालकनी बनी हुई है। हालांकि एक दुर्घटना के बाद इस मार्ग को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है और विशेष अनुमति लेकर पुरातत्ववेत्ता ही इसके भीतर जा सकते हैं। कुछ इतिहासकार इस स्तंभ को ‘मुअज्जिन मीनार’ बताने का प्रयास करते हैं जो किसी भी तरह तार्किक नहीं लगता। इतने ऊंचे स्तंभ पर चढ़ना ही अत्यंत कठिन है, और ऊपर से चिल्लाने पर नीचे खड़े-बैठे लोगों तक अजान की आवाज नहीं पहुंच सकती। इस परिसर में सैकड़ों स्तंभ स्पष्ट तौर पर प्राचीन हिंदू मंदिरों के हैं, जिन पर कमल, कलश, घंटियां आदि उत्कीर्ण हैं। ध्वस्त मंदिरों की मूर्तियां भी यहां यत्र-तत्र बिखरी हुई हैं। मंदिरों में की गई भारी तोड़-फोड़ स्पष्ट देखी जा सकती है। कुतुब मीनार एक हिंदूकालीन ‘ध्रुव स्तंभ’ थी, इस विषय पर पुरुषोत्तम नागेश ओक, गोपाल गोडसे, प्रो. हरवंशलाल ओबराय आदि इतिहासकारों ने काफी शोध किया है।

 

हरिशंकर जैन का कहना है कि ‘कुव्वतुल इस्लाम’ मस्जिद अपने आप में प्रमाण है कि वह एक हिंदू मंदिर थी। इसके प्रमाण हैं उस मस्जिद की दीवारों पर उकेरे गए अनेक देवी-देवताओं के खंडित और धूमिल चित्र। रंजना अग्निहोत्री कहती हैं, ‘‘कुतुब मीनार परिसर में स्थित लौह स्तंभ गरुड़ ध्वज है, जो हिंदू आस्था का प्रतीक और पूजनीय है। लौह स्तंभ पर आज भी विष्णु ध्वज अंकित है। यह लौह स्तंभ राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के समय में बनाया गया था।’’

याचिकाकर्ताओं के अनुसार ‘कुतुब मीनार’ असल में ‘ध्रुव स्तंभ’ है। इसको बनाने का उद्देश्य था तारामंडल की हलचल की देखरेख और शोध करना। याचिका में कुतुब मीनार परिसर में एएसआई द्वारा लगाए गए सूचना पट की भी चर्चा है। इस पट पर लिखा है, ‘‘इस मस्जिद (कुव्वतुल इस्लाम) का निर्माण गुलाम वंश के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1197 में 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर कराया था।’’ यही बात एएसआई द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘इन्वेंटरी आफ मॉन्यूमेंटस आफ साइट्स आफ नेशनल इंपोर्टेंस’ के भाग एक में भी मिलती है। (पृष्ठ सं. 141)

इस स्थान का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के विदेशी यात्री इब्ने बतूता ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में किया है। उसने अपने यात्रा-वृत्तांत में लिखा है, ‘‘दिल्ली पर कब्जा करने से पहले यह जगह जैन मंदिर थी और बाद में वह मस्जिद के लिए इस्तेमाल की जाने लगी। मस्जिद के पूर्वी द्वार पर तांबे की दो बड़ी मूर्तियां हैं, जो पत्थरों से जुड़ी हुई हैं और जो भी मस्जिद से निकलता है उसे कुचलते हुए बाहर जाता है।’’

याचिका में मुस्लिम इतिहासकार मौलाना हकीम सैयद अब्दुल हई, हसन निजामी ताल उल जमीर आदि की बातों को भी उद्धृत किया गया है। मौलाना हकीम सैयद अब्दुल हई के अनुसार, ‘‘कुतुबुद्दीन ऐबक मूर्ति पूजा का विरोधी था और मूर्तियों को तोड़ना उसके दौर में आम बात थी।’’ वहीं कुतुबुद्दीन ऐबक के कालखंड में इतिहासकार रहे हसन निजामी ताज उल मजीर ने लिखा है, ‘‘जब विजेता ने शहर पर कब्जा किया तब उसने शहर को मूर्ति पूजा से मुक्त कर दिया। और सालों से चली आ रहीं मूर्तियां तोड़ दी गईं और उस पर मस्जिद बना दी गई।’’ याचिका में एएसआई के पूर्व निदेशक जे.ए.पेज की पुस्तक ‘मेमोरिज आफ दी आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया’ को भी उद्धृत किया गया गया है। 1926 में प्रकाशित इस पुस्तक के पृष्ठ सं. 29 और 30 पर मस्जिद के अंदर लगे हुए शिलालेखों का अनुवाद छापा गया है और यह लिखा है, ‘‘यह जगह (मस्जिद) 27 मंदिरों के मलबे से बनाई गई है। हर एक मंदिर को 20,00000 देलीवाल (उस समय की मुद्रा) की लागत से बनाया गया था।’’
1906 में लंदन से प्रकाशित गोर्डन रिसले हर्न की पुस्तक ‘दी सेवन सिटी आफ दिल्ली’ में लिखा है,‘‘इस मस्जिद के अंदर मूर्तियों के चेहरे काटे गए और कुछ मूर्तियों को प्लास्टर से ढक दिया। यहां पर पाए गए खंभे 800 साल पुराने हैं और उनको उनकी असली जगह से मुसलमान कारीगरों द्वारा दूसरी जगह लगाया गया है।’’

जॉन एल. एस. पॉसिटो द्वारा संपादित पुस्तक ‘आक्सफोर्ड हिस्ट्री आफ इस्लाम’ में लिखा है, ‘‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद किसी शासक द्वारा बनाई गई हिन्दुस्थान की पहली मस्जिद है। इसका निर्माण 1191 में चालू हुआ, जिसमें मंदिर के अवशेषों को शामिल किया गया। यहां पर लौह स्तंभ है, जो भगवान विष्णु का प्रतीक है।’’  (पृष्ठ सं 399)

 

लौह स्तंभ
लौह स्तंभ

धातुकर्म का बेजोड़ नमूना लौह स्तंभ

कुतुब मीनार परिसर में लगभग 7 मीटर ऊंचा और लगभग 6,000 किलो भार का विश्वविख्यात लौह स्तंभ है, जो भारतीय धातुकर्म का बेजोड़ नमूना है। विगत 2,000 साल में इस स्तंभ पर जंग की परत नहीं चढ़ी है और न ही तोप की मार का कोई असर हुआ है। इस स्तंभ पर ब्राह्मी-लिपि और संस्कृत-भाषा में एक अभिलेख अंकित है, जिस पर किसी चंद्र नामक राजा का उल्लेख है।

Topics: qutub minar issueकुव्वतुल इस्लाम मस्जिदकुतुब मीनारQutub MinarDelhi Newsध्रुव स्तंभ
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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