सुनहरे धागों की खेती; पैसे से परे खुशी
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सुनहरे धागों की खेती; पैसे से परे खुशी

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 30, 2022, 12:02 am IST
inभारत, असम
मूगा रेशम उत्पादन नरम रेशम कीट पालक

मूगा रेशम उत्पादन नरम रेशम कीट पालक

मूगा रेशम उत्पादन असम की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा रहा है। बिहू के समय हाथों में नरम रेशम आना रेशम कीट पालकों के लिए मौद्रिक लाभ से इतर एक अलग खुशी का अवसर है। ऊपरी असम के हजारों किसान मूगा रेशम का उत्पादन करते हैं। देश के कुल मूगा उत्पादन में असम का योगदान 95 प्रतिशत है

दिब्य कमल बोरदोलोई

बिहू में ढोल-नगाड़े सुनते हुए हर असमिया की धड़कन तेज हो जाती है। यहां का सबसे आकर्षक त्योहार बिहू असम के प्रसिद्ध सुनहरे धागों, मूगा रेशम से बने मूगा ‘मेखला सदोर’ के बिना अधूरा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के जनक, कौटिल्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा है कि कामरूप या आधुनिक समय का असम, कोकून पालनकर्ताओं और मूगा रेशम की भूमि है।

असमिया संस्कृति का अभिन्न अंग
हां! यह सच है, मूगा रेशम असम के लिए स्थानिक है। मूगा रेशमकीट पालन, रेशम उत्पादन और बुनाई हजारों वर्षों से असमिया संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग रही है। पौराणिक ग्रंथों के साथ-साथ ऐतिहासिक लेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि अहोम शासकों के शासन काल 13वीं से 19वीं शताब्दी की शुरुआत में पारंपरिक रेशम उद्योग अपने चरम पर था।  आज भी, ऊपरी असम का जिला शिवसागर मूगा कीट की खेती और रेशम उत्पादन का केंद्र है, जो असम की अनूठी शान है।

हालांकि, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान पूरे मूगा उत्पादन व्यवसाय को मारक व्यापार नीति और मशीन से बुने हुए सिंथेटिक नकली कपड़ों की शुरूआत के कारण बड़ा झटका लगा।

असम के डिब्रूगढ़ जिले के एक मूगा किसान बिपुल बरुआ कहते हैं कि भले ही मूगा धागा उत्पादन की पूरी प्रक्रिया थकाऊ है, लेकिन यह हमारे खून में है, इसलिए हम इसे एक जुनून के तौर पर करते हैं।  हम रेशम कीट को साल में तीन बार पालते हैं।  रेशम के कीड़ों को रेशम निकालने के लिए तैयार होने में 40 दिन लगते हैं। उल्लेखनीय है कि ऊपरी असम में हजारों किसान मूगा रेशम की खेती करते हैं। असम देश के कुल मूगा और एरी उत्पादन में क्रमश: 95% और 65% योगदान देता है।

बरुआ ने बताया, ‘‘हमारे गांव में 8 लोग मूगा रेशमकीट की खेती करते हैं। हमारे गांव वाले अनादि काल से ऐसा करते आ रहे हैं। लेकिन नई पीढ़ी को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। फिर भी हममें से कुछ लोग परंपरा को जारी रखने के लिए ऐसा कर रहे हैं।’’

जिले के एक अन्य किसान प्रदीप लहन ने कहा, ‘‘हम इसे एक समूह के रूप में कर रहे हैं। हमारा तीन लोगों का समूह हर साल 42 से 45 किलोग्राम मूगा रेशम का उत्पादन करता है। हम इसे थोक बाजार में 25 हजार रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचते हैं। हम रेशम के कीड़ों को पालने के लिए भी बेचते हैं। इतनी कठिन और कड़ी मेहनत के बाद हम में से प्रत्येक साल में लगभग 2.50 लाख रुपये कमाता है। यह हम जैसे किसानों के लिए अब तक संतोषजनक है।’’

असम में प्राचीन काल से रेशम उत्पादन की परंपरा रही है, और राज्य को पारंपरिक रूप से मूगा, एरी और शहतूत रेशम का उत्पादन करने पर गर्व है।  मूगा संस्कृति दुनिया में मूगा रेशम के सबसे बड़े उत्पादक असम के लिए स्थानिक है। यद्यपि असम में रेशम की सभी 4 किस्मों का उत्पादन होता है, फिर भी मूगा और एरी रेशम के उत्पादन, जिसे आमतौर पर वान्या रेशम कहा जाता है, पर मुख्य जोर दिया गया है।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता उद्यमी कल्याणी गोगोई असम में एरी, मूगा और शहतूत रेशम उत्पादन को विकसित करने के लिए अथक प्रयास कर रही हैं। शिवसागर जिले के निताईपुखुरी क्षेत्र की इस युवा उद्यमी ने अब तक 800 से अधिक किसानों, बुनकरों को मूगा, एरी रेशम उत्पादन को पेशे के रूप में अपनाने के लिए प्रशिक्षित किया है। उनकी कंपनी ‘प्रतिला एरी, मूगा और पैट रेशम उत्पादन केंद्र’ ने लगभग 3000 किसानों को मूगा और एरी रेशम का उत्पादन करने के लिए संगठित किया। कल्याणी ने कहा, ‘‘हमें बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। फिर भी हम रेशम उत्पादन को जुनून के रूप में लेते हैं। अगले 15 दिनों में मेरी 800 कीड़ों की परत तैयार हो जाएगी। मेरी तरह, सैकड़ों स्थानीय किसान रेशम निकालना शुरू कर देंगे। रोंगाली बिहू के समय रेशम कीट, यह एक विशेष अवसर है। यह हमें अपार खुशी देता है। कड़ी मेहनत के बाद नरम रेशम हमारे हाथों में मिलता है। यह हमारे लिए बहुत खास है, यह सिर्फ मौद्रिक लाभ से परे है।’

कल्याणी और उनके साथी बुनकर आने वाले बिहू के समय अपने विशेष कपड़े (मेखला सदोर, गमूचा और एरी, मूगा रेशम से बने जैकेट) बाजार में ले जाएंगे। इन मेहनती किसानों और बुनकरों के लिए यह सबसे व्यस्त समय है।

रेशम के इलाके
मूगा संस्कृति मुख्य रूप से कामरूप, गोलपारा, उदलगुरी, कोकराझार, तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट, लखीमपुर और धेमाजी जिलों में है। एरी रेशम का उत्पादन राज्य भर में विशेष रूप से कामरूप, गोलपारा, उदलगुरी, दरंग, तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट, लखीमपुर, धेमाजी, नगांव, मोरीगांव, दरांग, कछार, कार्बी आंगलोंग, दीमा हसाओ, कोकराझार और धुबरी जिलों में होता है।  शहतूत रेशम के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में गिरावट आई है और यह जोरहाट, गोलाघाट, सिबसागर, दरांग आदि तक सीमित है। ओक तसर दीमा हसाओ और कार्बी आंगलोंग जिलों में यह बहुत सीमित है।                                   

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